..अब तो याद कर लो सतनाम सिंह को बनाने वाले को
जब तक सतनाम सिंह भारत में रहे उनके कोच डॉ. एस सुब्रमण्यम यही कहते रहे यह लड़का एक दिन जरूर एनबीए में खेलेगा। यहां तक दो साल पहले जब उन्होंने अंतिम सांस ली उस वक्त सतनाम अमेरिका में थे, लेकिन वह यही कहते रहे सतनाम एनबीए में खेलने वाला देश का पहला खिलाड़ी होगा।
आखिर ये शब्द उनके पीठ पीछे सच साबित हुए। सतनाम को भी अपने गुरू याद रहे। उन्होंने डॉ. सुब्रमण्यम का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह वही थे जिन्होंने आठ साल की उम्र में उनमें कुछ देखा और उन्हें तैयार किया। सतनाम तो अपना फर्ज निभा रहे हैं, लेकिन खेल मंत्रालय उनके त्याग को मान्यता नहीं दे पाया।
मंत्रालय जीते जी तो छोड़ें मरने के बाद भी उनका समर्पण याद नहीं रख पाया। बास्केटबाल फेडरेशन ऑफ इंडिया से लेकर उनका परिवार बीते छह सालों तक द्रोणाचार्य अवार्ड के लिए उनके नाम का आवेदन करता रहा, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। हारकर उनके परिवार ने इस बार अवार्ड के लिए आवेदन ही नहीं किया और सतनाम एनबीए ड्राफ्ट में चयनित हो गए।
पंजाब बास्केटबाल लगाएगा मंत्रालय से गुहार मरणोपरांत दें द्रोणाचार्य
बास्केटबाल फेडरेशन ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष और पंजाब बास्केटबाल एसोसिएशन के अध्यक्ष आरएस गिल का कहना है कि डॉ. सुब्रमण्यम के लिए वह एक बार फिर आवाज उठाएंगे। पीबीए और पंजाब ओलंपिक एसोसिएशन की ओर से गुहार लगाई जाएगी कि डॉ. सुब्रमण्यम को इस बार सतनाम के लिए द्रोणाचार्य अवार्ड दिया जाए।
पंजाब के पूर्व डीजीपी गिल खुलासा करते हैं कि उन्होंने डॉ. सुब्रमण्यम के लिए कई मौकों पर खेल मंत्रालय से गुहार लगाई। यहां तक उन्होंने पिछली बार खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल से भी कहा कि उनके योगदान को मान्यता देने की जरूरत है।
सिर्फ सतनाम ही नहीं सात फुट दो इंच लंबे आकाशदीप सिंह समेत उनके कई शिष्य उनका नाम रोशन करने की राह पर हैं। डॉ. सुब्रमण्यम की बेटी इंदिरा बाली को खुशी है कि उनके पिता के शिष्य ने उनके नाम की लाज रख ली, लेकिन दुख है कि उनके जीते जी उन्हें कभी उनका हक नहीं मिला।
उनकी मृत्यु के बाद भी द्रोणाचार्य के लिए दो बार गुहार लगाई। जब नहीं सुनी गई तो हार कर उन्होंने चुप रहना बेहतर समझा। अब सतनाम ने उम्मीद जगाई है,े शायद खेल मंत्रालय उन्हें याद कर ले।