तेरा हिज्र मेरा नसीब है
निदा फाजली की शायरी बड़ी सरलता के साथ अपनी बात कह जाती है। वह जमाने के शायर हैं। कबीर ने जिस रहस्यवाद और फक्कड़पन का तानाबाना बुना, निदा उसी परंपरा में खड़े नजर आते हैं। यह जरूर है कि दुनियावी रिश्तों में भी वे समरस हो जाने की कोशिश करते दिखते हैं, लेकिन उनके अंतर्मन में कोई ऐसी लहर उठती है कि वह फिर अपनी राह चल देते हैं। फिर लगने लगता है कि भले वह कहें कि "अपनी मर्जी से कहां, अपने सफर के हम हैं, हवाओं का रुख जिधर है उधर के हम हैं "लेकिन करीब से महसूस करने पर वे मतवाले ही लगते हैं। जिंदगी को अपनी तरह से जीने वाले। जिंदगी को जिस तरह जी लिया, उसी से वह अनगिनत मोती समेट लाए हैं। निदा यानी आवाज। उनका पुकारना कई तरह से सुना जाता है। कभी स्कूल जाते हुए बच्चों को देखकर, कभी मां की अनुभूतियों को याद कर,कभी अपनों की तलाश करते हुए उनकी भावुकता पन्नों पर उतर आती है।
वह कबीर की परंपरा से भी इसलिए जुड़ जाते हैं कि वह कह सकते हैं, "सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर, जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फकीर।" न जाने उनसे कितनी बार सुना गया..."जादू टोना रोज का, बच्चों का व्यवहार, छोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार। "बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, अल्ला तेरे एक को इतना ब़ड़ा मकान।" निदा आवाज देते हैं तो उसे गौर से सुना जाता है। उन्हें जब भी पाया, गहरी आत्मीयता से भरा हुआ पाया। जो उनसे छूटा, उसे उन्होंने अपनी जतन से जोड़ी हुई दुनिया से पाने की कोशिश की। जब भी मन भीगा, कोई पंक्ति निकल आई। वह न तो पूरी तरह सूफिया हैं, न पूरी तरह सांसारिक। मगर गूढ़ा खूब है। जीवन की संवेदनाओं को उन्होंने ऐसे शब्द दिए हैं कि उन्हें बार-बार पढ़ा और सुना जाता है।
जीवन को देखने का उनका तजुर्बा वाकई अलग है, तभी वह कह पाए हैं,"सीधा साधा डाकिया जादू करे महान, एक ही थैले में रखे आंसू और मुस्कान।" निदाजी तब खार में रहते थे। हम जब उनसे पहली बार मिलने जा रहे थे तो मन में ज्यादा कौतूहल नहीं था। सच कहूं तो तब उनके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। साहित्य की धूनी रमाने वाले तमाम साथी उनकी खूब चर्चा किया करते थे। तब इतना ही पता था कि कोई दिलचस्प व्यक्ति हैं, जिनसे मिलने के लिए साथी लोग आए दिन चल पड़ते हैं। ऐसे ही एक रोज मैं भी चल दिया। या कहिए कि मुझे साथ में ले जाया गया। मैं उनके बारे में कई तरह से सोच रहा था। न जाने उनका अपना जमावड़ा किस तरह का होगा। मेरे आने को किस तरह लेंगे। अगर उत्सुकता थी तो यही कि पहली बार एक शायर के मिजाज को बहुत करीब से देखने का अवसर होगा। निदाजी की शायरी, गजल गोई के बारे में तब भले न जाना हो, पर शायरों की फाकामस्ती, बिंदासपन को लेकर चर्चे, किस्से खूब सुने थे।
क्या निदा भी कुछ ऐसे ही होंगे, यह सोचते हुए कब दो मंजिल की सीढ़ियां चढ़ते हुए उनके घर में प्रवेश कर गए, पता नहीं चला। आइए, आज कुछ नए भी हैं। हमारी नमस्ते से पहले उन्होंने यह कहकर वातावरण को सहज बना दिया। परिचय और घुलने-मिलने में ज्यादा समय नहीं लगा। बातों का सिलसिला। यहां-वहां की बातें। मैंने भी कुछ कहा। अगली बार जब भी हमारे टोले को बुलाते तो यह कहना नहीं भूलते कि उसे जरूर ले आना। उनका स्नेह एक बार मिला तो फिर मिलता ही रहा। यह भी समझ में आ गया कि वे जितने बड़े शायर हैं, उतने ही बड़े महफिलबाज भी। बहुत प्यार से अगवानी करते हैं और जी भर कर दुलार उड़ेलते हैं। यह भी जान लिया कि उनकी महफिलों का मतलब है किस्से, चर्चे, साहित्य की बातें, कुछ गॉसिप, चुहुलबाजी, सामयिक विषयों पर चर्चाएं, राजनीति की भी बातें और घर में ही मशीन पर बनते सोडा के साथ कांच के सुंदर गिलासों में भरती शराब, उनकी खुद की तैयार की हुई कोई नानवेज डिश और रोटी बनाने की मशक्कत से बचने के लिए पास की ब्रेकरी से मंगाए हुए पाव।
उनके घर में निंदा रस की भी गुंजाइश रहती थी। इसकी चपेट में कवि, समीक्षक, साहित्यकार फिल्म जगत और अखबारी लोग ही आते थे। या फिर कथित सांप्रदायिक आचरण वाले लोगों पर उनका गुस्सा बरसता था। गीत संगीत
साथ-साथ चलता और जब उनकी इच्छा हो तो राजनीति पर भी बातें हो जाती थीं। निदाजी के घर पर देर शाम शुरू होने वाली महफिलें देर रात तक चलतीं। उधर कई बार चर्चगेट से विरार की आखिरी लोकल ट्रेन छूटती, इधर हम निदाजी से कभी पांव छूकर, कभी हाथ हिलाकर विदा ले रहे होते। निदाजी की आवाज गूंजती, “अच्छा जी, फिर आइएगा।" निदाजी के लिए तो अलग-अलग शामें रही होंगी, लेकिन उनमें कुछ शामें हमारे लिए होती थीं। अपनी तरह से सजी हुईं। कोई कह भर दे कि शायरे-आजम ने बुलाया है, सब कुछ भुला दिया जाता था। शाम फिर कहीं और नहीं होती थी। वह शामें याद करने लायक हैं। पर निदाजी केवल उन शामों से ही याद नहीं आते, उनका साथ बहुत-सी अनुभूतियों से भरा हुआ है।
इन्हें छोटी-बड़ी मुलाकातों में ही वह हमारे लिए अभिभावक की तरह हो गए थे। हम उनसे बहस भी कर सकते थे। उनकी किसी धारणा से संतुष्ट न हों तो बेबाक कह भी सकते थे। कभी आड़े-तिरछे बहस चलती तो कई बार हमसे सहमत न होते हुए भी वह कहते, “इसे कहने दो, रोको मत, उनका इशारा होता,बोल, बोल। हमें और कहने की छूट मिल जाती। निदाजी की बैठने की जगह खास होती। बाकी लोग अपनी-अपनी जगह चुन लेते। ये शामें साल दो साल नहीं, सालों चलती रहीं। निदाजी का बुलाना नहीं छूटा और हमारा जाना नहीं रुका। निदा फाजली के घर में अपनापन मिला। उनके पास जाना शुरू हुआ तो मुंबई को परदेस कहना भी छूटा। दूर पहुंच कर जब घर की याद सताती है तो ऐसे ठिकाने आपको वहां के माहौल से परिचित कराते हैं और आप धीरे-धीरे इसके अभ्यस्त हो जाते हैं। उनके पास यही अपनापन मिला। रिश्तों की समझ बढ़ी। उन्हें गौर से पढ़ना शुरू किया। उन्हें सुना भी। महसूस करता रहा कि विभाजन की त्रासदी का वह रह-रह कर जिक्र करते हैं। मां की छाया को याद कर मन ही मन सिसकते हैं।
बचपन को वे हमेशा अपने पास रखते हैं। ग्वालियर की यादों में तर-बतर रहते हैं तो लाहौर के प्रसंग उनकी आंखों में चमक ला देते हैं। शुरू के दिनों में एक दिन उन्होंने पूछा, “तुमने मीरा को पढ़ा है।” मैंने जितना पढ़ा था और जिस तरह पढ़ा था, उसके आधार पर जवाब में नहीं कहा। उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। पर वह शायद यही कहना चाह रहे होंगे कि कविता की समझ मीरा से शुरू होती है। उनकी संगत में यही पाया कि वे उपदेशक नहीं हैं, पर देर की बैठकों में बीच-बीच में कुछ ऐसा कह देते थे कि बात मन में गहरे उतर जाए। निदा का साहित्य जीवन का सार बताता हुआ चलता है। आप जितना अंजुर भर सकें, भर लें। और उनका जीवन, दुनिया को देखने, समझने की तहजीब देता है। आप तक पहुंचने के लिए वे आवरण नहीं बनाते, लेकिन अगर थोड़ी-सी परख हो तो निदा समझ में आने लगते हैं। मैंने देखा कि शायरी-गजल लिखने के लिए शायद ही कभी वह अपना खास मिजा़ज बनाते हों। कब लिखते हैं, पता नहीं चलता।
जब भी कुछ नया लेकर आते, उस दिन कुछ देर की संगत के बाद उसे धीरे-धीरे तर्ज में सुनाने लगते। हम वाह! वाह! ही करते। दूसरों को भी खूब सुनते हैं। उनके उसी कमरे में संजय मासूम की नई गजलों को भी सुना गया और धीरेंद्र अस्थाना के ताजा उपन्यास की कुछ पंक्तियों को भी। यहीं राकेश श्रीमाल, हरी मृदल भी होते। वह विजयशंकर से कहते, अपनी वो अयोध्या वाली कविता तो सुनाओ "अयोध्या नहीं, हम जा रहेथे दफ्तर"। और पूरण पंकज के गीत "पंख तो उड़ गए परिंदों के, फिर भी उड़ने की आस रखता है" को उन्होंने तरन्नुम में न जाने कितनी बार सुना। इसी आशियाने में कभी उन्होंने हम सबको जगजीत सिंह से भी मिलवाया था। क्षण भर की, मगर स्मृतियों में रहने वाली मुलाकात थी वह। युवाओं की कविता-कहानी, गीत,गजल वह बहुत दिलचस्पी से सुनते। यह आदत बनी रही। उन्होंने ही बताया कि हरी मृदल की नई किताब आई है। यहीं हमने मालतीजी के गायन को भी सुना। जमघट इस तरह लगता कि अगर साथी लोग प्रेस क्लब में एक साथ नजर न आएं तो दूसरे समझ लेते थे कि टोली शायरे आजम के यहां पहुंची होगी।
अक्सर हम देखते कि कमल शुक्ला पहले से ही पहुंचे हुए हैं। उनके लिए यह अपना ही आशियाना था। यहां आपस में भी उलझते रहे तो कभी रंग भी जमा। गीत-संगीत का दौर भी चलता। जिस दिन राकेश श्रीमाल आते तो भारतीय चित्रकला और भारत भवन पर चर्चा होती। कई शामों के अलग अलग चित्र उभरते हैं। कोई ऊंघ रहा है, कोई आपने में मस्त। कोई अंदर रसोई में बनते खाने की परख कर रहा है। जितने लोग उतनी भंगमाएं। कई बार निदा अपनी कार में हम सबको बांद्रा या खार रेलवे स्टेशन छोड़ने आते थे। वहीं एक दुकान में पान भी खाया जाता। कभी कभी सुबह उनका फोन आता, कथा सम्राट ठीक से पहुंच गए थे। धीरेंद्र अस्थाना के लिए उनका यही संबोधन होता था। बच्चे उनके प्रिय पात्र हैं और कई तरह से हैं। वे एक घटना बड़ी दिलचस्पी से बताया करते थे। खार-बांद्रा में वे सुबह घूमने जाया करते थे, तो वापसी में एक स्कूल जाती छोटी बच्ची से उनकी मुलाकात होती। वह कहती कुछ नहीं थी, पर उन्हें देखकर मुस्कराती थी। इस बच्ची के प्रति उन्हें बहुत दुलार था। अगर कभी न दिखे तो अजीब लगता। उनका कहना था, न जाने उस बच्ची ने उनसे कई पंक्तियां लिखवाई होंगी। तब उन्हें लगता था कि सबसे बड़ा सुख यही है कि छोटे-छोटे बच्चे स्कूलों में जाएं। कोई बिना पढ़े न रहे। वे बच्चों को अपनी आवारगी का सुख समझते हैं।
उनकी नादानी को भी चाहते हैं, "बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छू लेने दो, दो-चार किताबें पढ़कर ये भी हम तुम जैसे हो जाएंगे।" कुछ समय बाद निदाजी की दुनिया में एक छोटी गुड़िया, बिटिया बनकर आई तो उन्होंने एक कविता उस पर भी लिखी। - वो आई और उसने मुस्कराके मेरी बढ़ती उम्र के, सारे पुराने जाने पहचाने वर्ष पहले हवाओं में उड़ाए। फिर जुबां के सारे लफ्जों को, गजल को, गीत को, दोहों को खुली खिड़की से बाहर फेंककर यूं खिलखिलाई। जो बचपन का अभाव था, उसकी कसक बिटिया की झलक दूर करती रही। परिवार का बिछोह जितना रहा, उतनी ही पीड़ा विभाजन की उस रेखा को लेकर रही, जो है तो बहुत बारीक लेकिन उस पर कांटों की चुभन है। मुशायरों, शायरी की दुनिया कई बार उन्हें पड़ोसी मुल्क में ले गई। जब अपनी रौ में होते तो कहते, क्या फर्क दिखा यहां और वहां। "इंसान इंसान में हैवान यहां भी, वहां भी, अल्लाह निगाहबान यहां भी, वहां भी। उनसे हम अक्सर शिकायत करते,“आप मुशायरों में बार-बार कुछ खास दोहे, गजल ही क्यों पढ़ते हैं, जो नया लिखते हैं उसे क्यों नहीं पढ़ते वह अक्सर इस पर चुप रहते। एक दिन कहने लगे, इसके लिए कुछ सोचा-समझा नहीं जाता। कई बार मुशायरों में लगता है कि मैं कुछ सुना नहीं रहा, बस यूं ही कुछ कह रहा हूं। पर जब मैं कहने लगूं,"बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी
मां,"तो यह मेरे मन से निकलता है।
मैं मुशायरा सजाने के लिए यह नहीं कहता। ऐसे अवसर यदा-कदा आते हैं, जब आप भीग उठते हैं। मुझे वह क्षण याद आता है जब रफी साहब को गाते हुए देखा था "तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है" उन भावुकता के उस क्षण को कभी भुला नहीं पाया। ऐसे पल कभी-कभी आते हैं। जब आपका जो खोया हुआ हो, उसे याद करते हैं। अथाह दुःख के बाद, कुछ चीजें सहारा देती हैं, वह किसी के लिए कविता हो सकती है, किसी के लिए संगीत, कोई आकृतियों में रंगों को भरकर दिल बहला देता है, कोई खुदा को और याद करने लगता है। कभी यादों का सैलाब बहता है "मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार"। इतना जाना कि उनकी मुहब्बत गहरी है। इस कदर कि उस पर कुछ कहना या पूछना भी ठीक नहीं समझा। बस इतना ही जाना कि जिसे परिवार कह सकते हैं, वहां अब एक छत के नीचे तीन लोगों की संगत है। अपनी छोटी सुंदर-सी दुनिया है। निदा फाजली के आशियाने में जिंदगी अपने ढंग से इठलाती रही। उनसे सुन सकते थे, "धूप में निकलो, घटाओं में नहा कर देखो, जिंदगी क्या है, किताबों को हटा कर देखो। "यह उनका जिंदगी जीने का फलसफा है। मगर यह भी सोचा कि निदा, इस फिल्म नगरी में अपने लिए ज्यादा काम क्यों नहीं बटोर पाए। वह फिल्मों के मिजाज को बखूबी समझते हैं। बीते दौर में राजकपूर से उनकी ठीक-ठाक मुलाकात हुई थी। लेकिन फिल्मों में उनके गाने छिटके-छिटके ही रहे।
कई बार लगा, वह अपने खास मिजाज में, "बदन पे सितारे लपेटे हुए" जैसे गीत बखूबी लिख सकते थे। वह भी सोचते जरूर होंगे, लेकिन कभी ज्यादा अवसर न मिलने का अफसोस नहीं जताया। वे भी जानते हैं कि धारा बदल गई है। और जीने की उनकी अपनी शैली है, जो फिल्म की दुनिया में कई मामलों में फिट नहीं बैठती। उनका संतोष यही है कि फिल्मों के लिए लिखे उनके गीत सराहे गए। लोग उन्हें संजीदा होकर सुनते हैं। गद्य पर उनकी खासी पकड़ रही है। आत्मकथात्मक भी लिखा, और शब्द चित्र भी। रोचकता से भरे उनके आलेख पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। यह भी पाया कि उनके नाम भर से किसी भी मुशायरे की रौनक बढ़ जाती है। भले वह कुछ पुराना ही दोहरा दें। बात कह जाते हैं। शायरी और गजल से हटकर राजनीति और समसामयिक घटनाओं पर बहसों में वे खासी दिलचस्पी लेते रहे हैं। समय पर टिप्पणी भी करते रहे हैं। कभी-कभी वे फोन पर इतना कह कर बहस छेड़ते हुए मिल सकते हैं 'कि ये आसिफ जरदारी खाली हाथ आ रहा है, इसके आने से क्या होने वाला है।' या फिर किसी चुनाव या उसके नतीजों पर उनकी टिप्पणी सुनने को मिल सकती है। मैंने यही पाया कि वे घटना पर अपनी नजर बनाए रखते हैं। वह इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त रहते थे कि सांप्रदायिकता के खिलाफ असल लड़ाई लड़ने के लिए ऐसे ही तेवर चाहिए।
इनके पास इसके लिए अपने तर्क होते थे। मगर इसलिए राजनीति में घोटा किस तरह लगता है और बिसात किस तरह से बिछती है, इसके फेर में वह नहीं जाते थे। कह सकते हैं कि वे इन चीजों को कभी-कभी साहित्य, कविता और मंचीय भाषणों के उपादानों से देखने लगते थे। ऐसे समय में बहस की पर्याप्त गुंजाइश स्वाभाविक थी। मगर वह सुनते सब थे। आप उनसे किसी पहलू को लेकर असहमत हों तो उन्हें कभी गरजते-बरसते नहीं देखा। हां! कुछ फीका-सा मुंह बनाकर चुप हो जाते थे। फिर माहौल को सहज बनाने के लिए कुछ ऐसा कह देते थे, कि अगले क्षणों में फिर समा बंध जाता। वक्त काफी निकल गया पर निदा की आवाज आज भी सुनने को मिल जाती है, “उप्र में ऐसे नहीं जीत सकेगी कांग्रेस। पिछले दिनों में जाएं तो अयोध्या की बाबरी मस्जिद के टूटने का मसला हो या फिर मुंबई में दंगे या फिर पानी से तरबतर होता शहर, निदा हर बार मुखर होकर कुछ न कुछ बोले। बाबरी मस्जिद टूटी तो वह भी आहत थे। मगर जब कैफी आजमी 6 दिसंबर की कविता लिख रहे थे तो निदा ने उन स्थितियों से आगे की बात की। कहीं भी शहरे अमां नहीं है, अयोध्या अब कहां नहीं है।
इससे उन्हें यहां तक कि हिंदुओं में प्रगतिशीलों का भी विरोध सहना पडा। तंज भी हुआ। पर वह डिगे नहीं। वे यही कहते रहे कि पुराना जो हुआ उसे छोड़ अब आगे की सोचनी चाहिए। वह मुंबई में एक आवाज बनकर रहे। जब भी बोले, बहुत बेबाकी से बोले। पर राजनीति के गलियारे में कभी नहीं भटके। "हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना। "उन्होंने बखूबी कहा। निदाजी को भी कई तरह से देखा। कभी पिघलते, कभी उमड़ते। कभी-कभार विपरीत हवाओं में भी बहते। उनके आशियाने में कइयों पर प्यार उमड़ता देखा, तो हैरत से एक बार उनमें एक गोष्ठी में नीरज के मंच को बिगाड़ने का सुख भी देखा। फिर यही महसूस किया कि थोड़ा बहुत तुनुकमिजाजी चलती रहनी चाहिए। तभी निदा पूरे होते हैं। उनके व्यक्तित्व को समझने का पैमाना अलग है। वह कुछ बेपरवाह हैं। पर कहीं-कहीं इस तरह कि आपको रास न आए। एक बार कवि साहित्यकार लीलाधर जगूड़ी मुझे अपने साथ धर्मवीर भारती के घर ले गए। उनकी आपस की साहित्यिक चर्चाओं और कविता पाठ के बीच में रह- रह कर मेरी निगाह उनकी संपन्न लाइब्रेरी की तरफ चली जाती थी।
इसके विपरीत मैं निदाजी के घर पर किताबों को बिखरा हुआ पाता था। उनके घर की अस्तव्यस्ता यही है कि एक वह किताब, जिसे वह उन दिनों पढ़ रहे होते हैं, आपको सोफे या स्टूल पर रखी दिख सकती है। कुछ बेतरतीब-से बिखरे पन्ने। ऊपर कांच की अलमारी में धूल-सी खाती कुछ किताबें। "दीवारों के बीच" "खोया हुआ सा कुछ" भी वहां रखी होगी, लेकिन सलीके से नहीं, लगे जैसे बस उसे कहीं तो रखना था। हां! वहां किसी कोने पर आप गालिब का दीवान भी देख सकते हैं। वे पूछने पर आपको बता सकते हैं कि उर्दू की वह किताब "मीर" की है। निदा, इन नामों को बड़े अदब से लेते हैं। पर ललक किताबों को पढ़ लेने में तनी दिखी, उन्हें संजोने में नहीं। उन्होंने कभी प्यार भरे आग्रह को नहीं टाला। मुंबई भाइंदर वाले घर पर तो आए ही। एक बार देहरादून मुशायरे में आए तो मेरा उनसे घर चलने का आग्रह करना स्वाभाविक था। न जाने कहां-कहां के आमंत्रण छोड़कर वे आए, कुछ साथियों को भी लाए। मैं देहरादून से कुछ दूर विकास नगर से उनके लिए पहाड़ों में खास कही जाने वाली महाशीर मछली लाया। वह मेरी लिए एक अच्छी याद छोड़ गए।
उन्हें तब विचलित पाया जब जगजीत और उनका साथ नहीं रहा। जगजीत उस दुनिया के हो गए, जहां से कोई लौटकर नहीं आता। जिस रोज जगजीत को अग्नि दी जा रही थी, निदाजी से कुछ बातें करनी चाही थीं। पर जो कह रहे थे, उसमें कई बातें समझ में नहीं आ रही थीं। समझ रहा था कि निदाजी के यह शब्द, उस दुःख की प्रतिध्वनियां हैं। समझ रहा था कि वे जो कह रहे हैं उसे चुपचाप सुनना है। कुछ दिन बाद कहने लगे, “उस कमरे को बड़े करीने से सजा कर रखता था जगजीत। बेटे की तस्वीर पर फूल चढ़ाता था, धूप-दीप जलाता था। अब तो वो भी नहीं रहा। निदा की अभिव्यक्ति के लिए जगजीत की आवाज गूंजती रही है। निदाजी और जगजीत सिंह का यह मेल अजब है। इसमें रूहानियत है। देखा जाए तो यह एक तरह से लौकिक अहसास दिलाता है। न जाने निदाजी में क्या-क्या तलाशा। पर उनके पास आकर एक ठहराव मिला। ऐसा ठहराव जिसकी जिंदगी की रफ्तार में हमेशा जरूरत रहती है। शायरी ने उन्हें शोहरत दी। लोग मिले। रोशनी भी हुई। लेकिन वे यही महसूस करते रहे कि जिंदगी ने सब कुछ दिया मगर देर से मिला। सब होने पर भी अभी बहुत कुछ बचा है तभी निदा कह उठते हैं। सब कुछ है मेरे पास। फिर भी क्या ढूंढती हैं आंखें। क्या बात है मैं वक्त पर घर क्यों नहीं जाता। जो बीत गया वो गुजर क्यों नहीं जाता। बेनाम-सा यह दर्द ठहर क्यों नहीं जाता।
(ये आलेख वेदविलास उनियाल की किताब सुन मेरे बंधु (किताब घर) से लिया गया है, जो संस्मरणों पर आधारित है।)