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बिना सरकार के चाहे दंगे नहीं हो सकते?

Mon, 11 Aug 2014 07:19 PM IST
प्रोफेसर ज्योतिर्मय शर्मा/राजनीतिक विश्लेषक, लेखक
प्रोफेसर ज्योतिर्मय शर्मा/राजनीतिक विश्लेषक, लेखक Updated Mon, 11 Aug 2014 07:19 PM IST
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special story on communal riots

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वक्त में सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है और इसके साथ ही तेज हुई आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति।

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शनिवार को बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में बिना नाम लिए कांग्रेस पर समाज के ताने-बाने को तोड़ने का आरोप लगाया गया। इससे पहले राहुल गांधी ने कहा था कि उत्तर प्रदेश में सोच-समझकर सांप्रदायिक दंगे करवाए जा रहे हैं।
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राज्य की अखिलेश सरकार कांग्रेस, बीजेपी, बीएसपी सभी के निशाने पर रही है तो वह अपने बचाव में विपक्षी दलों पर आरोप लगाती रही है।

खासकर तब जब ये स्पष्ट हो कि कोई भी दंगा बिना सरकार की सहमति के न हो सकता हो।

सांप्रदायिक दंगे और सियासत

special story on communal riots

देश में कहीं भी कोई भी सांप्रदायिक दंगा तब तक नहीं हो सकता जब तक कि उसमें किसी सरकार की भागीदारी न हो।

हम लोग सांप्रदायिक दंगों के मामले को अक्सर उलझा देते हैं। वह इसलिए क्योंकि हमारे अपने वैचारिक बिंदु उलझे हुए हैं। कभी हम कहते हैं कि यह धर्मनिरेपक्षता का सवाल है, कभी कहते हैं कि कोई राजनैतिक पार्टी उकसाती है।

ये सारे कारण हो सकते हैं। लेकिन दंगे, जो पूरी तरह कानून-व्यवस्था का मामला है, तभी हो सकते हैं जब सरकार- चाहे वह केंद्र की हो या किसी राज्य की- उसमें शामिल हो।

जब तक सरकार चाहेगी तब तक सांप्रदायिक दंगे होंगे और जिस दिन सरकार कह देगी कि दंगा नहीं होगा, उस दिन दंगा नहीं होगा।

परखा हुआ तरीका

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हाल-फिलहाल में जो दंगे हुए हैं खास तौर पर उत्तर प्रदेश में, चाहे वो दलितों और मुसलमानों के बीच हो या फिर सिखों और मुसलमानों के बीच- ऐसा लगता है कि ये करवाए जा रहे हैं।

यह कोई बड़ी बात नहीं है। यह पुराना पैटर्न है। पुरानी रूपरेखा को वापस जीवित किया जा रहा है। पर दंगा केवल एक लक्षण है। दरअसल हमें हिंदुत्व को देखने का अपना नजरिया बदलना पड़ेगा।

अब तक हमने हिंदुत्व को लेकर जो भी बात की है वह सिर्फ़ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस,) वीएचपी, बजरंग दल, बीजेपी के बिंदु से की है।

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हिंदुत्व का प्रभाव

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आज एक हिंदुत्व नहीं है। आज इसके अनेक रूप हैं और एक रूप हिंदुत्व का ये भी है जो इस बात की कोशिश में है कि दलितों को, आदिवासियों को कैसे हिंदुत्व के प्रभाव में लिया जाए।

हमारी दिक्कत यह है कि सूक्ष्म स्तर पर जो सब हो रहा है, वह हम देखते नहीं हैं। हम सिर्फ़ यह देखते हैं कि सरसंघचालक मोहन भागवत, नरेंद्र मोदी या अमित शाह ने क्या कहा? हम उसी में फंसे हुए हैं।

जमीनी स्तर पर जो हिंदुत्व का प्रचार-प्रसार हो रहा है वह बहुत महीन और सुनियोजित ढंग से हो रहा है और उसे देखने की जरूरत है।

दंगों से ध्रुवीकरण

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सिखों-मुसलमानों या दलितों-मुसलमानों में जो दंगे हो रहे हैं, इसे लेकर चौंकने की ज़रूरत नहीं है। यह नई बात नहीं है, यही पुराना तरीका है।

1924 से ये तरीका चलता आ रहा है। 1924 में कोहट में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। वह मुसलमानों और सिखों के बीच हुआ था। कोहाट नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर में था।

यह सच है कि दंगों से ध्रुवीकरण होता है और उस पर राजनीति की रोटियां सिकती हैं जैसे मुज़फ़्फ़रनगर दंगों का भारतीय जनता पार्टी को फ़ायदा हुआ है।

शायद इसीलिए सरकारें दंगों में एक तरह से शामिल रहती हैं। हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति है कि अकेले ध्रुवीकरण से ही फ़ायदा होता है।

बहुत कम ऐसे चुनाव होते हैं जिनमें एक ही मुद्दे से चुनाव परिणाम तय हो जाते हैं। भारत में ऐसे कुछ ही चुनाव हुए हैं- जैसे कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव। लेकिन ऐसा अब कम होता जा रहा है।

बीजेपी सरकार और ध्रुवीकरण

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क्या बीजेपी की सरकार से ध्रुवीकरण ज्यादा हो रहा है? इसका जवाब साफ नहीं है। ये भारत की दूसरी दक्षिणपंथी सरकार है।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो सभी सरकारें, चाहे वो कांग्रेस की हो या बीजेपी की, दक्षिणपंथी रही हैं। आर्थिक उदारीकरण मनमोहन सिंह को मोदी से जोड़ता है।

तो हमें दक्षिणपंथों में भी फ़र्क समझना पड़ेगा। अभी की यह सरकार राजनीतिक रूप से दक्षिणपंथी है।

यह हौवा नहीं है लेकिन ये बिल्कुल तय है कि इसकी अपनी विचारधारा है और इनका अपना एजेंडा है। ये वही करेंगे जो इनके एजेंडे में होगा।

बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं इतनी कमज़ोर हैं कि यह एजेंडा चल जाएगा और पूरा हो जाएगा?

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