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पंचनामा: टीवी न्यूज रिपोर्टिंग की मौत का

Fri, 29 May 2015 03:00 PM IST
Updated Fri, 29 May 2015 03:00 PM IST
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Special report on tv news gathering.

कोई भी न्यूज चैनल देखिए, कोई भी अखबार उठाइए सब एक जैसे लगते हैं। उसी तरह की सुर्खियां, भाषा भी एक जैसी और कमोबेश एक सा नजरिया।

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अपवाद हैं, लेकिन बहुत कम। इतने कम कि परिदृश्य पर इकहरी तस्वीर ही दिखलाई देती है। दूसरे पक्ष दिखलाई क्यों नहीं देते? मीडिया के इस अभूतपूर्व विस्तार में हमें समाचारों और विचारों की विविधता वाली दुनिया क्यों नहीं दिखलाई देती?

इस सवाल के यूं तो बहुत से जवाब हैं। मसलन, एक मीडिया अपने लाभ-हानि को ध्यान में रखकर पूरे समाज को नहीं बल्कि उसके एक छोटे से हिस्से को कवर कर रहा है या मीडिया को चलाने वाले बाजार का एजेंडा उसे एक खास सांचे में ढाल चुका है।
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ये बड़ी सचाईयां हैं, मगर एक बड़ी वजह और भी है - मीडिया संस्थानों का खबरों और विचारों के लिए सीमित स्रोतों पर निर्भर हो जाना।

हर तरफ एक एजेंसी

Special report on tv news gathering.

चैनल कुछ चुनिंदा एजेंसियों से खबरें लेकर अपना कारोबार चला रहे हैं। मसलन, भारत में न्यूज चैनल एकमात्र न्यूज एजेंसी एएनआई पर पूरी तरह से निर्भर हैं।

लाइव कवरेज के मामले में तो इसका वर्चस्व कायम हो चुका है। साढ़े तीन सौ न्यूज चैनलों में से करीब दो सौ चैनलों पर एक साथ इसकी एक समान न्यूज फीड प्रसारित होती है।

ये शुरू कैसे हुआ?
टीवी न्यूज इंडस्ट्री में इस परिवर्तन की शुरूआत करीब साढ़े तीन साल पहले हुई थी। उस समय एएनआई औसत दर्जे की एजेंसी मानी जाती थी और चैनल उसे विकल्प न होने की वजह से ही लेते थे। यानी मजबूरी का नाम एएनआई था।

इसी दौरान कई नई न्यूज एजेंसियों ने दस्तक दी और उनमें से एकाध ने अच्छा कंटेंट देना भी शुरू किया, जिससे एक होड़ शुरू हुई। एएनआई को भी अपनी खबरों में सुधार करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

लेकिन दुर्भाग्य से नई एजेंसियां चल नहीं पाईं और न्यूज चैनलों में हो रही बढ़ोतरी के बीच एएनआई की लॉटरी लग गई। असली गेमचेंजर साबित हुईं एएनआई की लाइव कवरेज सेवाएं। घटनाओं के सीधे प्रसारण पर चैनलों को काफी खर्च करना होता था।

ऐसे में जब उसे कौड़ियों के मोल लाइव फीड मिलने लगी तो उसने उसे फौरन लपक लिया।

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चैनलों की मजबूरी

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यहां दो चीजों का जिक्र करना बहुत जरूरी है। पहली तो ये कि ठीक यही समय था, जब ऊपर के दो-तीन चैनलों को छोड़कर बाकी की माली हालत पस्त थी।

वे घाटे में चल रहे थे और सुधार की कोई उम्मीद ही नजर नहीं आ रही थी। ऐसे में एएनआई उन्हें मुंहमांगी मुराद जैसी लगी।

दूसरी उल्लेखनीय चीज ये रही कि एएनआई ने लाइव कवरेज के लिए सस्ती टेक्नालॉजी का इस्तेमाल किया।

इंटरनेट के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरणों (बैक पैक सॉल्यूशन) के मार्फत लाइव कवरेज का खर्च अपेक्षाकृत कम होता था, क्योंकि ओबी वैन के मुकाबले ये बेहद सस्ता था और इसमें कम कर्मचारियों से भी काम चल जाता था।

इससे लाइव पर होने वाले खर्च में भारी कटौती हो गई और बहुत सस्ती दरों पर सेवाएं मिलने लगीं।

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सुविधा क्यों बनी अभिशाप?

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लेकिन ये सुविधा पत्रकारिता के लिए अभिशाप बन गई। इसने चैनलों पर रिपोर्टिंग का काम लगभग खत्म कर दिया।

चैनल रिपोर्टिंग के बजाय डेस्क से संचालित होने लगे। यही वजह है कि अब हमें मौलिक रिपोर्ट बहुत कम या नहीं के बराबर देखने को मिलती हैं। सारे चैनल एएनआई से मिली खबरों को ही पैकेज, रीपैकेज करके दिखलाते रहते हैं।

भूकंप, बाढ़ या ऐसी ही किसी बड़ी घटना के मौके पर कुछ चैनल बेशक होड़ में आगे रहने के लिए अपने संसाधन झोंक देते हैं, मगर जमीनी रिपोर्टिंग के लिए वे कुछ भी खर्च करने के लिए राजी नहीं होते।

खबरों का बचा खुचा बंटाधार कैसे हुआ?

खबरों को तेज रफ्तार बनाने के चक्कर में चैनलों ने उनकी अवधि पहले ही कम कर दी थी। कभी वे तीन-चार मिनट की अच्छी रिपोर्ट भी दिखाते थे, मगर अब वे डेढ़ मिनट की अधिकतम समय सीमा निर्धारित कर चुके हैं।

इस बीच में कुछेक चैनलों ने पंद्रह सेकेंड के फुटेज पर तूफान खड़ा करके टीआरपी बटोरने का फंडा ईजाद कर लिया, जिससे रिपोर्टिंग का महत्व कम होता चला गया।

यही वह दौर भी था जब यूट्यूब पत्रकारिता ने मुफ्त के माल पर खेल करने की प्रवृत्ति पैदा की और चैनल रिपोर्टिंग से दूर हटते चले गए। ये मीडिया के मनोरंजनीकरण का भी दौर था, जो आज भी जारी है।

पर रिपोर्टरों के क्या हाल हैं?

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रिपोर्टिंग के प्रति चैनलों के रवैये की परख इससे भी की जा सकती है कि उन्होंने बहुत से ब्यूरो बंद कर दिए हैं या फिर वहां काम करने वाले लोगों की संख्या बहुत घटा दी है। जो रिपोर्टर हैं, वे या तो रिपोर्टिंग भूल चुके हैं या उन्हें रिपोर्टिंग का मौका ही नहीं दिया जाता।

तो न्यूज देखने वालों का क्या हुआ?

वास्तव में देखा जाए तो भारत में न्यूज रिपोर्टिंग की मौत हो चुकी है। आर्थिक रूप से दुर्बलता के शिकार न्यूज चैनल मानसिक रूप से भी दीवालिए हो गए हैं।

उन्होंने रिपोर्टिंग की कुर्बानी देकर अपनी साख तो गंवाई ही है, अपना आकर्षण भी कम कर लिया है। इसी का नतीजा है कि लोग अब नवीनता और विविधता को खोजने के लिए इंटरनेट का रुख कर रहे हैं।

बाकी दुनिया में क्या हुआ?

ये केवल भारत मे हो रहा हो ऐसा नहीं है। पश्चिमी देशों में भी यही प्रवृत्ति हावी है। वहां भी खर्चा कम करने के लिए बड़े अखबारों और टीवी चैनलों ने अपने रिपोर्टरों की तादाद कम की है, ब्यूरो बंद या छोटे किए हैं और अंशकालिक संवाददाताओं या सिंडिकेट सर्विस पर निर्भरता बढ़ा दी है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को हो रहा है। घटनाओं के भिन्न पहलुओं से अनजान रहने की वजह से लोग स्वतंत्र एवं निष्पक्ष राय नहीं बना पाते।

इससे लोकतंत्र को चलाने में उनकी भूमिका भी अधूरी रहती है। नतीजतन, वह चंद लोगों और बाज़ार की निरंकुशता का शिकार हो रहा है।

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