क्या सुषमा से 11 साल पुराना बदला ले रही हैं सोनिया?
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सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी ललितगेट पर शुरू से ही सुषमा स्वराज के खिलाफ हमलावर रुख अख्तियार किए हुए हैं। संसद में सुषमा की भावनात्मक सफाई को उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया है। मानवता की दुहाई देकर मदद की सफाई पर कांग्रेस ने ललित मोदी की मौज करतीं तस्वीरें मीडिया में तैरा दी हैं। यह सवाल भी पूछे जा रहे हैं कि जब यूपीए सरकार में मंत्री रहे संतोष बागरोडिया की पत्नी कैंसर से जूझ रही थीं तो यात्रा दस्तावेजों की गुहार पर सुषमा का दिल क्यों नहीं पसीजा। बेटे राहुल समेत सोनिया के सारे सिपहसालारों ने सुषमा स्वराज की चारों तरफ से घेराबंदी की हुई है। इस्तीफे से कम पर मानने को वो तैयार नहीं है।
किसी ने सोचा नहीं था कि ऐतिहासिक गिरावट वाली कांग्रेस को सुषमा, वसुंधरा और शिवराज नई ऊर्जा से लबरेज कर देंगे। मॉनसून के इस मौसम में कांग्रेस ने सुषमा पर आरोपों की ऐसी बौछार की है कि भगवा बिग्रेड में अपेक्षाकृत प्रगतिशील मानी जाने वाली सुषमा स्वराज को भी ग्रह-तारे नजर आने लगे। जिन सोनिया गांधी ने देश को पहली महिला राष्ट्रपति दी, जिन सोनिया गांधी ने देश को लोकसभा की पहली महिला स्पीकर दी वो सोनिया देश की पहली महिला विदेश मंत्री के खिलाफ अचानक इतनी हमलावर क्यों हो गईं?
क्या यह नरेंद्र मोदी से गुजरात दंगों के बाद सोनिया गांधी के मन में उपजी वितृष्णा है या फिर इसे कांग्रेस नरेंद्र मोदी सरकार से लोकसभा में मिली करारी हार का बदला लेने के एक मौके के रूप में देख रही है? या यह नेहरू-गांधी परिवार के लिए कही गई बातों के लिए नरेंद्र मोदी को सबक सिखाने की कोशिश है? हो सकता है यह सब भी हो। लेकिन ऐसा लगता है कि सोनिया के अंदर जरूर वो टीस है जिसने उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोका था। वो कोई और नहीं सुषमा स्वराज ही थीं।
2004 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद जब लगा कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन जाएंगीं तो एनडीए की मीटिंग में सुषमा ने कहा था कि वो किसी भी कीमत पर सोनिया को देश का प्रधानमंत्री स्वीकार नहीं करेंगीं। उन्होंने सोनिया के विदेशी होने को देश की अस्मिता से जोड़ दिया था।
सोनिया के विदेशी मूल पर सैद्धांतिक लड़ाई
विदेशी मूल के मुद्दे को सुषमा स्वराज सोनिया से व्यक्तिगत खुन्नस की वजह एक सैद्धांतिक लड़ाई बताती रही हैं। सितंबर, 2013 में सुषमा स्वराज ने एक बार फिर कहा 'देश 150 साल से अधिक समय तक विदेशी शासन के अधीन रहा था और आजादी के लिए कई लोगों ने अपने जीवन का बलिदान दिया था। उन्होंने कहा, अगर 60 साल की आजादी के बाद, हम किसी विदेशी को शीर्ष पद पर बिठाते हैं, तो इसका मतलब यह होगा कि 100 करोड़ लोग अक्षम हैं... इससे लोगों की संवेदनशीलता प्रभावित होगी। यही कारण था कि मैंने 1999 में बेल्लारी से चुनाव लड़ा और यह मेरे लिए एक मिशन था। बेल्लारी में मैं लड़ाई हार गई, लेकिन युद्ध जीत गई।'
2004 में जब बीबीसी के एक श्रोता ने सुषमा स्वराज से सवाल पूछा था कि वह महिला होकर ही एक महिला का इस हद तक विरोध क्यों कर रही हैं जबकि भारतीय संस्कृति में विवाह के बाद ससुराल ही किसी महिला का असली घर होता है।
जवाब में सुषमा स्वराज ने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से सोनिया गांधी के खिलाफ नहीं हैं और यह सिद्धांत रूप से विदेशी मूल के किसी व्यक्ति के प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठने का विरोध है।
क्या बदले की आग में जल रही हैं सोनिया?
'सुषमा जी ड्रामेबाजी में बड़ी माहिर हैं'। सोनिया गांधी की ये टिप्पणी बताती है कि सुषमा के खिलाफ उनके अंदर कितना गुस्सा है। कुल मिलाकर सोनिया किसी भी कीमत पर सुषमा को माफ करने को तैयार नहीं। राहुल गांधी भी सुषमा स्वराज से सवाल पूछ रहे हैं कि वो बताएं, ललित मोदी की मदद के बहाने उनके पति और बेटी को कितने पैसे दिए गए। सुषमा पर निशाना साध सोनिया एक तीर से कई निशाने साध रही हैं। एक तो वो सुषमा से अपना 11 साल पुराना बदला ले रही हैं तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के दूसरे साल में प्रवेश करते ही विपक्ष को एकजुट कर रही हैं। और तीसरा मृत प्राय मान ली गई कांग्रेस में एक नई जान भी फूंकती दिख रही हैं।
2004 के आम चुनाव में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की और सोनिया के पास देश का प्रधानमंत्री बनने का मौका आया। पार्टीजनों की तरफ से की गई तमाम मान-मनुहार को उन्होंने खारिज कर दिया और अपने 'अंदर की आवाज' को सुनते हुए प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया। ये 'अंदर की आवाज' ही क्या सोनिया के प्रधानमंत्री ना बनने की असल वजह थी, ये सवाल अब भी बना हुआ है।
एक समय तक यह चर्चा चलती रही कि राष्ट्रपति भवन में उन्हें संकेत दिए गए थे कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए संवैधानिक पीठ बनाकर सलाह लेनी होगी क्योंकि वे विदेशी मूल की हैं। यह भी चर्चा थी कि बोफोर्स मामले में उनके परिवार की कथित संलिप्तता की वजह से उन्हें रोका गया। लेकिन यह सब बातें अफवाह से आगे नहीं जा सकीं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी और खासकर सुषमा स्वराज की तरफ से किया गया सोनिया का जबरदस्त विरोध 'अंदर की आवाज' का उत्प्रेरक था।
2004 में एनडीए की करारी हार के बाद सुषमा स्वराज ने ही सोनिया के खिलाफ सबसे मुखर विरोध किया था। उन्होंने धमकी दी थी कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो वे संसद से इस्तीफा दे देंगी। इतना ही नहीं वे अपना सिर मुंडा लेंगी। सोनिया गांधी को इस बात का बखूबी आभास था उनके विदेशी मूल का मुद्दा पूरे देश में एक नया राजनीतिक भूचाल ला सकता है और बेवजह कांग्रेस को मिले सरकार बनाने के जनादेश का बंटाधार हो सकता है। इसलिए सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर चुना और जैसा कि बीजेपी आरोप लगाती है कि वे सत्ता की असल चाबी 10 -जनपथ पर ही टांगे रहीं।