...और अपनी चमक खोता जा रहा है सोनपुर मेला

चंदन जायसवाल/इंटरनेट डेस्क Updated Wed, 28 Nov 2012 09:34 AM IST
Sonepur Mela is losing its shine
बिहार का मशहूर सोनपुर मेला मंगलवार से शुरू हो गया। छपरा जिले के सोनपुर में लगने वाला यह मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला माना जाता है। यह हर साल कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) में लगता है। इस मेले को हरिहरक्षेत्र मेला के नाम से भी पुकारते है क्योंकि सोनपुर में प्रसिद्ध ऐतिहासिक हरिहरनाथ जी का मन्दिर है।

कार्तिक पूर्णिमा से शुरू होकर करीब एक महीने तक चलने वाले इस मेले की शुरुआत नदी स्नान के बाद हरिहरनाथ मंदिर में पूजा-पाठ से होती है। राजधानी पटना से लगभग 25 किमी तथा हाजीपुर से 3 किलोमीटर दूर सोनपुर में लगने वाले इस मेले ने देश में पशु मेलों को एक अलग पहचान दी है। यहां हाथियों व घोडों की खरीद हमेशा से सुर्खियों में रहती है। पहले यह मेला हाजीपुर में होता था और सिर्फ हरिहर नाथ जी की पूजा सोनपुर में होती थी लेकिन बाद में मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश से एतिहासिक मेला भी सोनपुर में ही लगने लगा।

इस मेले के साथ एक पौराणिक दंत कथा जुड़ी है। भगवान विष्णु के घोर भक्त राजा इंद्रयमुनि महर्षि अगस्त्य के शाप से हाथी बन गए और गंधर्वराज हुहू को देवाला मुनि ने शाप देकर मगरमच्छ बना दिया था। हाथी बनने के बाद भी इंद्रयमुनि विष्णु के उपासक रहे और प्रतिदिन की पूजा से पहले स्नान के लिए जब वह गंडक में उतरे तो मगरमच्छ बने हुहू ने पकड़ लिया और दोनों में युद्ध हुआ। हाथी ने भगवान को मदद के लिए पुकारा। विष्णु ने अपने चक्र से मगरमच्छ के टुकड़े कर दिए और हाथी के प्राण बचाए।

भगवान ने दोनों को शापमुक्त किया और अपने साथ बैकुंठ ले गए। मिथिला जाने के क्रम में भगवान राम ने इस स्थान पर शिव की आराधना की थी और एक मंदिर की स्थापना की। लोगों की आस्था है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां नदी में स्नान करने वाले को बैकुंठ मिलता है। चूंकि दो पशुओं के युद्ध के कारण भगवान प्रकट हुए इसलिए यहां पशुओं की खरीदी-बिक्री को शुभ माना जाता है।

सोनपुर में पशु मेले के आयोजन का इतिहास मौर्यकालीन है। चंद्रगुप्त मौर्य सेना के लिए हाथी खरीदने सोनपुर आते थे। देश में गोरक्षा अभियान की शुरुआत का श्रेय भी इसी मेला को जाता है। सर्वप्रथम 1888 में यहीं गोरक्षा पर विचारगोष्ठी का आयोजन हुआ था। स्वतंत्रता आंदोलन में भी सोनपुर मेला बिहार की क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहा है। वीर कुँअर सिंह लोगों में अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष के लिए जागरूक करने और अपनी सेना में बहाली के लिए यहीं आते थे।

बहरहाल, सोनपुर मेले की ख्याति पशु मेले के रूप में ही रही है। यहां हाथी, घोड़े, ऊंट, कुत्ते, बिल्लियां और पंछी बेचे जाते रहे हैं। सोनपुर मेले में पशुओं का कारोबार केवल व्यापार नहीं है बल्कि यह परंपरा और आस्था दोनों का मिलाजुला स्वरूप भी है। हालांकि सोनपुर मेले का पशु बाजार धीरे-धीरे अपनी चमक खोता जा रहा है।

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