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कुछ हटकर करोगे या विफल होगे?
रुचिर शर्मा
Updated Tue, 25 Nov 2014 07:14 PM IST
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नब्बे के दशक के शुरुआती वर्षों से तेज रफ्तार से विकास करते हुए भारत खुद को इस तरह देखने लगा, मानो वह लोकतांत्रिक विश्व का चीन को जवाब हो। भारत आज भी अपना यह सपना पूरा कर सकता है, मगर इसके लिए वह केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित विकास के उस मॉडल की ओर वापस नहीं लौट सकता, जो आजादी के बाद के प्रारंभिक दशकों में मजबूत आर्थिक विकास देने में विफल रहा।
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एक ‘ब्रेकआउट नेशन’ बनने के लिए भारत को आत्मतुष्ट होने और बहाने ढूंढने की प्रवृत्ति का त्याग करना होगा। ‘ब्रेकआउट नेशन’ से मेरा आशय ऐसे देश से है, जो समान प्रति व्यक्ति आय वाले देशों में अपनी प्रतिद्वंद्वी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले ज्यादा रफ्तार से विकास करता है और उस श्रेणी की अर्थव्यवस्थाओं से निवेशक जिस आर्थिक विकास दर की अपेक्षा करते हैं, उससे लगातार ऊंची दर दर्ज कराता है। दरअसल निचले आधार से तेज विकास करना आसान होता है। 1980 के दशक की शुरुआत से, जब से भारत ने ज्यादातर आयातों पर अपना एकाधिकार कम करना शुरू किया, तब से उसने हर दशक में उभरते बाजारों के औसत से एक या दो पॉइंट अधिक आर्थिक वृद्धि दर हासिल की।
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दो मजबूत दशकों के बाद भारत की अर्थव्यवस्था इस दशक में धीमी पड़ी है। लेकिन यह स्थिति अनिवार्य नहीं है। चीन, ताइवान, कोरिया और जापान दिखा चुके हैं कि किस तरह तीन या उससे ज्यादा दशकों तक लगभग दहाई अंकों वाली रफ्तार के साथ आर्थिक वृद्धि दर हासिल की जा सकती है। उन्होंने ऐसी नीतियां अपनाकर यह हासिल किया, जिनसे तेज शहरीकरण को बढ़ावा मिला और मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर बढ़ा। भारत को भी यही करना चाहिए।
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भारत ऐसे विकासशील देशों में से रहा है, जो संकट के दिनों में आर्थिक सुधार करते हैं, और जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तब विकास के लाभों को गंवा देते हैं। मनमोहन सिंह ने भारत में बढ़ते भ्रष्टाचार और मुद्रास्फीति की समस्या को तेज आर्थिक विकास का साइड इफेक्ट बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी, पर विकास के उसी स्तर पर खड़े दूसरे देशों के मुकाबले भारत में स्थिति ज्यादा खराब रही। कुछ अन्य नीति निर्माताओं ने आर्थिक सुधारों पर जोर देने की सरकार की विफलता के लिए यह व्याख्या दी कि एक तानाशाही के मुकाबले एक लोकतांत्रिक देश में सुधार लागू करना मुश्किल होता है। लेकिन पोलैंड और चेक रिपब्लिक जैसे कई देशों ने सोवियत खेमे से पिंड छुड़ाने के बाद सुधारों को सही तरीके से लागू किया है। दरअसल 1980 के बाद उन 124 देशों में से, जिन्होंने प्रतिवर्ष पांच प्रतिशत या उससे अधिक की दर से कम से कम एक दशक तक लगातार विकास किया है, आधे लोकतांत्रिक और आधे तानाशाही वाले देश रहे हैं।
भारत ने 2000 के दशक की मजबूत आर्थिक वृद्धि को आने वाली समृद्धि के एक संकेत के रूप में गलत पढ़ा। वह तो एक असाधारण दशक था, जिसमें सभी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं ने तेजी से बढ़ना शुरू किया। इतिहास दर्शाता है कि किसी भी दशक में सभी उभरते देशों में से सिर्फ एक तिहाई देश ही पांच प्रतिशत से ज्यादा की दर से विकास कर पाते हैं। आर्थिक तेजी जितनी देर तक बनी रहती है, उतने ही उसके खत्म होने की आशंका बढ़ जाती है।
पिछले दशक में उठाए गए नीतिगत कदमों ने भारत के लिए एक अच्छे दशक की संभावना कम कर दी है। लगातार आर्थिक विकास के बावजूद सरकारी घाटे और मुद्रास्फीति की दरों के कारण भारत की रैंकिंग नाटकीय रूप से गिरी है। क्रोनी कैपिटलिज्म (भाई-भतीजावादी पूंजीवाद) भी एक समस्या है, जिसे हमारे नेता विकास का स्वाभाविक परिणाम मानते हैं। आज भारतीय कंपनियां ग्लोबल हो रही हैं, पर इसका एक अर्थ यह भी है कि भ्रष्ट और स्थिर घरेलू बाजार की वजह से ये कंपनियां भाग रही हैं। सरकार को मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में ज्यादा पूंजी निवेश लाना चाहिए, क्योंकि इससे नौकरियां पैदा होती हैं।
पिछली केंद्र सरकार की तुलना में छह प्रदेशों में ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं, जो लगातार तीन कार्यकाल के लिए चुने गए। इन्होंने देश को उसकी स्वाभाविक स्थिति की ओर लौटाया। ओडिशा में नवीन पटनायक ने लौह अयस्क और बॉक्साइट की खानों के बल पर इस्पात उद्योग खड़ा करने की कोशिश की, तो बिहार में नीतीश कुमार ने अनाज उत्पादन से आगे फूड प्रोसेसिंग और पैकेज्ड फूड का मार्ग प्रशस्त किया। केंद्र सरकार का घाटा बढ़ने और राज्य सरकारों का घाटा कम होने के पीछे कारण यह है कि मजबूत राज्य सरकारें कड़े आर्थिक फैसले कर रही हैं। तेज आर्थिक विकास की गाड़ी अब दक्षिण और पश्चिम के समुद्र तटीय राज्यों से आगे उत्तर और मध्य भारत के पिछड़े राज्यों की तरफ बढ़ रही है। राज्यों का उदय भारत की परिपक्वता का संदेश है।