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टनों बर्फ के नीचे 6 दिन, फिर भी जिंदा कैसे?

Tue, 09 Feb 2016 07:12 PM IST
Updated Tue, 09 Feb 2016 07:12 PM IST
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soldier alive after 6 days in siachin

सियाचिन ग्लेशियर पर हिमस्खलन में छह दिन पहले दबे भारतीय सेना के एक जवान को जीवित बचाया गया है। लांस नायक हनमनथप्पा लगभग 6,000 मीटर की ऊंचाई पर सियाचिन ग्लेशियर में कई मीटर बर्फ़ के भीतर दबे थे जब बचावकर्मियों ने उन्हें जीवित निकाला।

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उनकी ताज़ा स्थिति अभी कैसी है इस बारे में जानकारी नहीं मिली है, लेकिन इतने लंबे समय तक बर्फ़ में दबे रहने के बाद जीवित बच जाने को कई लोग चमत्कार कह रहे हैं।
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लांस नायक हनमनथप्पा के अलावा भारतीय सेना के नौ अन्य जवान भी इस हादसे का शिकार हुए थे लेकिन उनकी मौत हो गई। बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने इस बारे में बात की दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में जोड़ों के डॉक्टर डॉ (लेफ़्टिनेंट जनरल) वेद चतुर्वेदी से, वो भारतीय सेना में डॉयरेक्टर जनरल मेडिकल सर्विसेज़ थे।

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विज्ञान में भी इस सवाल का कोई हल नहीं

soldier alive after 6 days in siachin

1. इसे (लांस नायक हनमनथप्पा के बच जाने को) विज्ञान का अचंभा ही कहा जाएगा। हालांकि विज्ञान के पास इसका साफ़ जवाब नहीं है। हो सकता है जवान को कहीं से ऑक्सीजन मिल रही हो, हो सकता है कि वो बहुत फ़िट हों। ये कहना बहुत मुश्किल है कि कोई व्यक्ति क्यों बच जाता है। यही वजह है कि राहतकर्मी कभी भी खोजबीन नहीं रोकते।

2. इस घटना से साबित होता है कि शून्य से नीचे के तापमान पर जीवित रहने पर शोध होना चाहिए। ये समझना ज़रूरी है कि क्या कम तामपान मात्र से मौत हो सकती है? ऐसी दूसरी घटनाओं की भी जांच होनी चाहिए, इससे ये भी सवाल उठ सकता है कि ऊंचाई पर अगर व्यक्ति बेहद कम तापमान में रहे तो क्या वो बच सकता है? हमें इस बारे में पता नहीं है।

3. लंबे समय तक शून्य से नीचे के तापमान में रहने से दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है, यानि दिल तेज़ी से काम करता है और दिल की धड़कन रुकने का ख़तरा उत्पन्न हो जाता है। आज भी ऊंचाई पर ज़्यातादर मौतें हापो यानि हाई एल्टीट्यूड पल्मनरी इडीमा से होती हैं। इसमें व्यक्ति के फेफड़ों में पानी भर जाता है, इसका एक ही इलाज है कि व्यक्ति को नीचे ले जाया जाए।

लेह में भारतीय सेना का एक आधुनिक अस्पताल है। अस्पताल में एक चैंबर है जहां आक्सीजन बहुत है, या तो हम पीड़ित व्यक्ति को वहीं रख देते हैं या उन्हें चंडीगढ़ भेज देते हैं। कई लोगों को हापो जल्दी हो जाता है, कुछ दवाइयां दी जाती हैं ताकि फेफड़ों में परिवर्तन न हो। जवानों की ट्रेनिंग होती है, इसके अलावा जवानों को बताया जाता है कि वो ख़ुद को ठंड के मुताबिक़ कैसे ढालें और क्या सावधानी बरतें। इस बारे में कई अध्ययन किए गए हैं।

फेफडों की बीमारियों से मरते हैं लोग

soldier alive after 6 days in siachin

4. इसके अलावा कई जवानों में एक्यूट माउंटेन सिकनेस की शिकायत होती है। आपने महसूस किया होगा कि पहाड़ों पर जाने के कारण कभी-कभी सिर में दर्द होता है, दरअसल ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होने के कारण मस्तिष्क पर दबाव बढ़ जाता है।

5. ठंड से एक और ख़तरनाक स्थिति पैदा हो सकती है - थ्रांबोसिस। दरअसल ज़्यादा ऊंचाई से शरीर में ख़ून का जमना बढ़ जाता है। ठंड से दिल में या मस्तिष्क में थक्का जम सकता है। उंचाई पर मृत्यु के कई कारण हो सकते हैं लेकिन व्यक्ति क्यों बच गया ये समझना मुश्किल होता है। इससे पता चलता है कि प्रकृति की 90 प्रतिशत बातें अभी भी हमें मालूम नहीं।

6. बहुत ठंड से ख़ून जम सकता है, उंगलियां गल जाती हैं, निमोनिया या इन्फ़ेक्शन हो जाता है। बहुत ठंड से गैंगरीन हो सकता है या शरीर का कोई हिस्सा सड़ जाता है।

7. इसी कारण सैनिकों के लिए लेह जैसी जगहों पर जाने के लिए निश्चित कार्यक्रम होता है। सैनिकों को आदेश होता है कि वो पहले दिन पूरा आराम करें। ज़्यादातर पर्यटक ऐसा नहीं करते। दूसरे दिन जवान मात्र लेह के भीतर उसी ऊंचाई पर घूम सकता है, लेह से ऊपर जाने के लिए अलग रूटीन तय होती है।

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