क्या कोई है, जिसकी जासूसी नहीं हो रही?
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अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान भारतीय विदेश मंत्री ने अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों द्वारा भारत की जासूसी का मुद्दा काफी सख्ती से उठाया था।
केरी इसका ठीक से जवाब भी नहीं दे पाए। लेकिन सुषमा स्वराज ने जो सख्ती दिखाई, संभवतः वह पर्याप्त नहीं। ब्राजील और जर्मनी जासूसी के मामले पर अमेरिका को और सख्त संदेश दे चुके हैं।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के घर से जासूसी उपकरण की ख़बर की सरकार ने विस्तृत जांच क्यों नहीं करवाई?
भारत के आम नागरिकों की निजता आज सबसे ज्यादा खतरे में है, क्योंकि इस पर सरकारों, गुप्तचर एजेंसियों और सोशल मीडिया कंपनियों सहित कइयों की नजरें हैं। और आम आदमी के पास निजता का अधिकार नहीं है।
अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की भारत यात्रा दोनों देशों के संबंधों में एक निर्णायक मोड़ हो सकती थी लेकिन यह जो भी रही हो, इसने नई राह तो नहीं ही बनाई।
जॉन केरी के सामने उठा मुद्दा
अमेरिकी विदेश मंत्री कुछ दिन पहले भारत इसलिए आए थे कि देवयानी खोबरागड़े और व्यापार मतभेद जैसे कई मुद्दों की वजह से तनावपूर्ण हो गए संबंधों की जमीन 'फिर तैयार' की जा सके।
यह यात्रा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सितंबर में बहुप्रतीक्षित अमेरिका यात्रा का कार्यक्रम तय करने में सफल हुई या नहीं यह अलग बात है।
भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अमेरिकी सुरक्षा संस्था (एनएसए) द्वारा भारत की जासूसी करवाने के मुद्दे पर जबरदस्त डांट लगाई, खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जासूसी के मामले पर, जब वह सत्ता में नहीं थी।
एक आधिकारिक मुलाकात में सुषमा ने केरी को कहा, "दोस्त एक-दूसरे की जासूसी नहीं करते।" केरी इसके अलावा कुछ और नहीं कह पाए कि अमेरिका 'गुप्तचरी के मामले पर कोई टिप्पणी नहीं करता'।
सिर्फ बीजेपी की चिंता
तो यह यात्रा जिसे कई अन्य सकारात्मक वजहों से चर्चा में रहना चाहिए था, एनएसए की ओर से हुई जासूसी के मुद्दे पर नई सरकार के 'सख़्त रुख' की वजह से खबरों में आई।
हालांकि सुषमा स्वराज ने अमेरिकी जासूसी की कड़ी आलोचना की लेकिन इसमें दो बातें उल्लेखनीय थीं।
पहली तो यह कि वह बीजेपी नेताओं की जासूसी को लेकर ज्यादा चिंतित थीं बनिस्बत पहले की रिपोर्ट्स के, जिनमें बताया गया था कि अमेरिका भारतीय नेताओं, अफ़सरों और देश के अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रम की जासूसी कर रहा है। (इसी पत्रकार द्वारा सितंबर, 2013 में हिंदू अखबार के लिए खबर की गई थी।)
दूसरी बात यह कि सुषमा स्वराज ने यह भी जता दिया कि पिछली यूपीए सरकार के मुकाबले नई सरकार से बात करना ज्यादा आसान है क्योंकि उन्होंने अमेरिका के साथ मित्र देशों के बीच जासूसी को लेकर कोई लक्ष्मण रेखा नहीं खींची।
यह ब्राजील और जर्मनी जैसे देशों द्वारा अपनाए गए रुख से काफी अलग है।
ब्राजीलियाई राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ ने सख़्त इंटरनेट कानून बनाने के साथ ही अमेरिका की अपनी आधिकारिक यात्रा भी रद्द कर दी तो जर्मनी ने हाल ही में अपनी सरकार की जासूसी के आरोप में एक सीआईए एजेंट को गिरफ्तार किया है।
कोई सुरक्षित नहीं
हालांकि नई सरकार से अमेरिका से सीधे भिड़ जाने की उम्मीद करना थोड़ा ज्यादा अपेक्षा करना हो सकता है, लेकिन इसी दौरान की एक घटना की अनदेखी करना आसान नहीं।
जब सुषमा स्वराज एनएसए की जासूसी को लेकर शोर मचा रही थीं तभी खबर आई कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के घर में किसी संस्था ने जासूसी उपकरण लगाए हुए हैं।
हालांकि सरकार ने इस घटना को ज्यादा तूल नहीं दिया लेकिन इससे कुछ साल पहले तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी (अब राष्ट्रपति) के ऑफिस में जासूसी उपकरण लगाने जाने की घटना की याद आ गई।
तब की यूपीए सरकार भी उम्मीद के विपरीत उस मामले को गंभीरता से लेने या जांच करवाने में नाकाम रही थी।
चूंकि इन दोनों मामलों की जांच मौजूदा सरकारों ने नहीं करवाई इसलिए यह कहना मुश्किल है कि कौन सा व्यक्ति या संस्था, जासूसी उपकरण लगाने के लिए जिम्मेदार था और उसका उद्देश्य क्या था?
लेकिन यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि ऐसी जासूसी सरकार और पार्टियों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और सत्ता संघर्ष के चलते होती है।
जासूसी वाले मामले पर एनएसए के दस्तावेज़ों से एक बेहद डरावनी बात पता चली थी, वह यह कि सरकार से लेकर राजनीतिक दल और व्यक्तियों तक, भारत में कोई भी- शक्तिशाली गुप्तचर संस्थाओं से सुरक्षित नहीं है।
भारतीयों की मुश्किल
भारतीय नागरिकों के लिए ये ज़्यादा डरावना क्यों है, इसकी वजह दो तथ्य हैं- पहला तो यह कि एक आम नागरिक के पास निजता की कोई वैधानिक गारंटी नहीं है। और दूसरा यह कि गुप्तचर एजेंसियां सरकार के अलावा किसी और के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, जो कभी भी इनका दुरुपयोग कर सकती हैं।
भारत में यह कोई गुप्त बात नहीं है कि एक के बाद एक सरकारें कैसे हर चुनाव के पहले 'सर्वेक्षण' करवाने के लिए गुप्तचर ब्यूरो (आईबी) का इस्तेमाल करती हैं।
यह भी कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है कि ज़िला या कस्बे स्तर पर पुलिस अधिकारी या स्थानीय गुप्तचर संस्थाएं आम लोगों के फ़ोन टैप करवा सकती हैं या चिट्ठियों को रोक सकती हैं। क्योंकि आम आदमी के पास सरकारी तंत्र को चुनौती देने के लिए कानूनी या आपराधिक संसाधन कम हैं।
क्या कहेंगे मोदी?
अगर सुषमा स्वराज ने केरी के सामने जासूसी का मुद्दा ज्यादा मजबूती और साफ तरीके से उठाया होता तो इससे लगता कि भारत की नई सरकार भारतीय नागरिकों की निजता को लेकर प्रतिबद्ध है।
मोदी के पास मौका है कि सितंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पास मुलाकात में इन कमियों को दूर कर लें। अभी तो बस अटकलें ही लगाई जा सकती हैं कि मोदी इस मामले पर हंगामा खड़ा करेंगे या नहीं।