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राहुल के आंगन में 'तुलसी' आने से दिलचस्प हुआ खेल

Wed, 02 Apr 2014 04:45 PM IST
रमाकांत तिवारी/अमर उजाला, सुल्तानपुर
रमाकांत तिवारी/अमर उजाला, सुल्तानपुर Updated Wed, 02 Apr 2014 04:45 PM IST
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Smriti is in Rahul's territory, gives flame to politics

हाई प्रोफाइल संसदीय सीट अमेठी के आंगन में भगवा खेमे से ‘तुलसी’ स्मृति ईरानी के आने से सियासत गरमा गई है। अभी तक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को ‘आप’ के कुमार विश्वास से ही चुनौती मिल रही थी।

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यह पहला मौका है जब अमेठी में त्रिकोणीय लड़ाई की स्थिति बन रही है, अभी तक संघर्ष एकतरफा हुआ करता था। हालांकि लंबे समय से टिकट की कतार में लगे स्थानीय दावेदारों को अपने पक्ष में एकजुट करने की चुनौती भी स्मृति के सामने होगी।
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80 के दशक में कांग्रेस नेता संजय गांधी के पदार्पण के बाद से कुछेक मौकों को छोड़ दिया जाए तो भाजपा ने अमेठी संसदीय क्षेत्र में गांधी-नेहरू फैमिली के खिलाफ चुनाव लड़ने के नाम पर महज खानापूरी ही की है। ऐसा ही अनुमान इस बार भी लगाया जा रहा था।
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जबरदस्त त्रिकोणीय मुकाबला

Smriti is in Rahul's territory, gives flame to politics

अमेठी के कुछ स्थानीय दावेदारों को छोड़ दिया जाए तो भगवा खेमे का कोई बड़ा नेता यहां से टिकट के लिए लालायित नहीं था, यह बात दीगर है कि बाकी जगह भाजपा में टिकट के लिए घमासान मचा है।

पहले के चुनावों की तरह सपा ने इस बार भी कांग्रेस को वॉकओवर दे दिया है। बसपा से धर्मेंद्र प्रताप सिंह मैदान में हैं लेकिन उनकी सियासी सक्रियता न के बराबर है। अब तक राहुल गांधी के मुकाबले अमेठी में महज आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास की ही हलचल थी।

भाजपा के प्रत्याशी चयन में विलंब से अमेठी में कांग्रेस और आप के बीच सीधी लड़ाई के आसार बन रहे थे। ऐसे में स्मृति ईरानी की एंट्री से पहली बार इस हाई प्रोफाइल सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार बन गए हैं।

इतिहास राहुल के पक्ष में

Smriti is in Rahul's territory, gives flame to politics

1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर के दौर को छोड़ दिया जाए तो गांधी परिवार ने हमेशा सीधी लड़ाई में यहां बड़ी जीत हासिल की। विपक्षी दलों की ओर से मैदान में नहीं उतरने या कमजोर प्रत्याशी उतारने का सीधा लाभ गांधी परिवार को मिलता रहा।

1977 में संजय गांधी के अमेठी पदार्पण के बाद से अब तक अमेठी में कुल 12 चुनाव (दो उपचुनाव समेत) हुए।

इन चुनावों में नौ बार गांधी-नेहरू फैमिली के उम्मीदवार रहे, जबकि तीन में परिवार के करीबियों में शुमार कैप्टन सतीश शर्मा मैदान में उतरे। सीमित विकल्प में लोग एकमुश्त कांग्रेस के पाले में चले जाते थे।

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