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स्मार्ट सिटी नहीं 'सिटी को स्मार्ट बनाएं

Tue, 16 Sep 2014 04:49 PM IST
Updated Tue, 16 Sep 2014 04:49 PM IST
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मोदी सरकार ने देश में सौ स्मार्ट सिटीज बनाने की घोषणा कर दी है लेकिन अपंग प्रशासन और रूढ़ नौकरशाही के सामने यह योजना सफल हो पाएगी?

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एक स्मार्ट शहर के लिए अधिक से अधिक निवेश, बुनियादी ढांचे पर अधिकाधिक खर्च, महानगरीय योजना बनाने वाली समितियों का दक्ष होना बेहद जरूरी है।

साल 2030 तक 77 शहरों की आबादी दस लाख से अधिक होगी और 30 शहर 40 लाख की आबादी के साथ मेगा सिटी बन चुके होंगे। क्या नए स्मार्ट शहरों के बनाए जाने से ज्यादा जरूरी नहीं है कि मौजूदा शहरों को ही स्मार्ट बनाया जाए?

सजग मतदाता

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पहले से ज्यादा सजग और सूचना संपन्न शहरी मतदाता को कहीं ये लुभावने नारे निराश तो नहीं कर देंगे?

शहरी मतदाताओं की बढ़ती संख्या, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शहरों की बढ़ती हिस्सेदारी, शहरी क्षेत्रों में बैकलॉग के कारण अपंग हो चुकी बुनियादी सुविधाएं और ढांचे और मतदाताओं को सीधे प्रभावित करने वाले कारक के बीच शहरों की काया पलट के लिए एक नया राजनीतिक मंत्र है 'स्मार्ट सिटीज' का जादुई शब्द।

यह विचार पूरे एशिया में एक सूनामी की तरह फैल रहा है और इसने अपने शहरी वोट बैंक को बचाए रखने के लिए नए विचारों की तलाश में रहने वाले राजनेताओं के मन-मस्तिष्क को भी डूबो दिया है।

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शहरी नीति

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शहरी नीति में इस शब्द के हाल ही में उभरने और इसके अबूझपने ने इसे आकर्षक मुहावरा बना दिया है, क्योंकि कोई भी नहीं जान सकता कि जो कुछ प्रस्तावित है, वह दरअसल है क्या। किसी हिंदी फ‌िल्म की तरह, जिसमें नायक को इस तरह दिखाया जाता है जैसे उसकी ज़िंदगी पर उसी की पकड़ है या फिर उसके हाथों में कोई काला जादू है।

स्मार्ट शहरों की अवधारणा हमेशा लालायित रहने वाले ऐसे सलाहकार दलों की जरूरत पर निर्भर है, जिन्हें हल करने के लिए एक संकट की जरूरत होती है और अपने सामान बेचने के लिए विशेष तरीकों की जरूरत होती है।

स्मार्ट शहर दूरदर्शी राजनेताओं की जरूरत पर निर्भर होता है, जो नए विचारों के लिए अपने सचिवों, शहरी योजनाकारों और सलाहकारों से पूछते रहते हैं, जो कि उनके पास होता ही नहीं।

ये दोनों कारक 'स्मार्ट सिटी बीमारी' में जा मिलते हैं, जहां टेक्नोलॉजी तुरंता समाधान का वादा करती है। यह नई सजावटी स्कीमों की विशाल रेंज बताने, पुरानी स्कीमों को ही नाम बदलकर लाने और स्मार्ट लगने वाली हाईटेक ख़बरों की सुर्खियों का रास्ता खोल देगी।

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हरेक को छत जरूरी

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दूरदर्शी नेताओं और स्मार्ट सलाहकारों के बीच इस मधुर संबंध से कुछ अच्छा भी निकल सकता है। यह शहरी संकट के प्रति हमारी आंख खोलने के लिए प्रेरित करता है; यह हमारे शहरों के बेकार होने के प्रधान कारणों के प्रति हमारा ध्यान खींचेगा, जो कि बेकार प्रशासनिक, योजना, वित्तीय और कानूनी संस्थाओं की देन है, जो हर उस अच्छे विचार को खारिज कर देते हैं जो आम लोगों के लिए बनाई जाने वाली नीति के के लिए आता है।

आप बेखबर नौकरशाहों और लचर संस्थागत तंत्र के दम पर स्मार्ट शहर नहीं बना सकते। कल्पित हाईटेक प्रतिभा से ज्यादा, स्मार्ट शहर हमारे शहरों की अक्षम व्यवस्था, अस्थाई विकास और पक्षपात जैसी मुख्य समस्याओं को चुनौती दे रहा है।

यदि संस्थाओं की इन पहेलियों के झुंड को तुरंत नहीं दूर किया गया तो कोई भी तकनीक, संचार तकनीक का समाधान, परिवहन में वेब आधारित सेवाएं या डेटा केंद्रों के जरिए डिजिटल सेवा प्रबंधन या नया स्थाई दृष्टिकोण हमें बचा नहीं सकेगा।

क्या है अपेक्षा

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वास्तव में हम इन स्मार्ट संस्थानों से क्या चाहते हैं? हमारे शहरों के लगभग 70 प्रतिशत नागरिक महानगरीय बाजार में किसी भी वाणिज्यिक आवासीय योजना की मासिक ईएमआई का खर्च भी नहीं उठा सकते।

सही मायने में एक स्मार्ट शहर वो होगा जो रिहाइश को सुलभ बनाए, जो कि हमारे लोकतांत्रिक शहरों को अधिक समावेशी बनाएगा।
यह असमानता हमारे नीतिगत ढांचे का परिणाम है न कि बिल्डरों के लालच का नतीजा।

हालांकि देश के कुल राजस्व का 80 प्रतिशत हिस्सा शहरों से आता है, लेकिन शहरों के बुनियादी ढांचे और मतदाताओं के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाली जरूरी सुविधाओं और सेवाओं पर खर्च करने के लिए इस राजस्व का मामूली हिस्सा ही इन्हें वापस मिल पाता है।

मौलिक ढांचा

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हमारे शहरों की कायापलट करने के लिए, अधिकाधिक राजस्व जुटाने के वास्ते उपभोक्ता सेवा शुल्क, भूमि के मुद्रीकरण, संयुक्त उद्यम, नगर निगम के बॉन्ड्स और तमाम अन्य तरीकों से स्मार्ट सिटी, निवेश को आकर्षित करने वाली व्यवस्थाएं लागू करेगी।

सबसे महत्वपूर्ण है, एक बार संस्थानों के लिए मौलिक ढांचा तैयार हो जाए, तो 'स्मार्ट' संभव होने के दायरे में आ जाएगा और तभी हम पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ शहर, स्थाई शहर, कुशल शहर, न्यायसंगत शहर, रोजगार पैदा करने वाले शहर, रचनात्मकता को बढ़ावा देने वाले शहर बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

अभी, संवाद के मौजूदा स्वरूप में 'स्मार्ट शहरों' से, बुनियादी बदलावों की अनदेखी का खतरा बना हुआ है, जो कि हमारे नेतृत्व द्वारा दशकों से नजअंदाज किया जाता रहा है।

क्या जरूरी हैँ यह कदम

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हमें अपने मौजूदा शहरों को स्मार्ट बनाने की जरूरत है न कि इससे भटकना। हमें सरकारी और निजी क्षेत्र में अंतर दिखाना बंद करने की जरूरत है और नए देश के निर्माण में उतर जाना चाहिए!

साल 2030 तक 77 शहरों की आबादी दस लाख से अधिक होगी और 30 शहर 40 लाख की आबादी के साथ मेगा सिटी बन चुके होंगे। जबकि झुग्गियों में रहने वालों की तादाद घटेगी और मध्यम वर्ग इसी अनुपात में बढ़ेगा। ये आबादी में नई आकांक्षा वाले बढ़ते एक हिस्से की मांग को भी बढ़ाएगा, जोकि सक्रिय मतदाता होगा।

इन नागरिकों को पता चल जाएगा कि "एक सौ नए स्मार्ट शहरों" के नारों के माध्यम से उनके जीवन पर खास असर नहीं पड़ा है। वे अपने शहर को स्मार्ट बनते देखना चाहते हैं!

बीस गुना खर्च बढ़ेगा

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दुनियाभर के शहरों में भारत प्रति व्यक्ति खुली जगह के मामले में सबसे निचले पायदान पर है, ऐसे में मनोरंजन के लिए घर से बाहर जाना और पार्क में घूमना यहां के लिए एक सपने जैसा है।

प्रति व्यक्ति पीने के लिए साफ पानी, शोधित सीवरेज का प्रतिशत, संशोधित ठोस अपशिष्ट का अनुपात और बारिश के पानी की निकासी व्यवस्था कम होती जा रही है। जबकि व्यस्ततम समय में यातायात का घनत्व और घंटों जाम की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा सुविधाओं तक पहुंच भी घट रही है।

क्या ऐसे देश में इन खामियों को दूर किया जा सकता है, जहां जुटाए गए टैक्स का उन शहरों पर सबसे कम खर्च होता है, जो आर्थिक विकास के इंजन हैं और जहां से और अधिक टैक्स उगाहा जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि एशिया के विकास के मानदंडों के बराबर पहुंचने के लिए भी हमें शहरों के ढांचागत विकास पर मौजूदा निवेश का लगभग 20 गुना खर्च करने की जरूरत होगी।

सही स्मार्ट शहर की बुनियाद मजबूत वित्तीय बैलेंसशीट पर ही खड़ी हो सकती है, जिससे ऐसी योजनाएं शुरू की जा सकें जो लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक सेवाएं दे सकें।

आकांक्षाएं

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संस्थागत अविश्वास को हटाने से लोग बढ़ी हुई सेवाओं के लिए टैक्स भरने वालों में शामिल हो जाएंगे। शहरी अराजकता, बढ़ता ट्रैफिक, बिजली की कटौती, पानी की कमी, लोगों का सुरक्षित और आरामदायक सार्वजनिक आवागमन, महंगे आवास और खस्ताहाल स्कूल, हर कोई ऐसी जादुई शख्सियत की तलाश में है जो शहरी जीवन को बेहतर बना सके, जिससे हमारे शहर और हमारा देश बचा रहे और आगे बढ़े।

यह समस्या बढ़ रही है और पूरी न होने वाली आकांक्षाओं से हताश और अच्छी ज‌िंदगी की तलाश में निराश अधिक ज्ञानवान और अधिक ताकतवर शहरी मतदाता इसमें घी का काम कर रहा है।

यह गरीबी का संकट नहीं है; यह आकांक्षाओं का संकट है! शहरों की 'स्मार्टनेस' का आकलन करने के लिए अगर कोई मानक है, तो यह शहर के सभी वर्गों और व्यवसायों से जुड़े लोगों की खुशी है!

हम बुनियादी ढांचे पर हो रहे कम निवेश, अक्षम प्रशासन, आधुनिक शहरी नियोजन की गैर मौजूदगी और शहरी डिजाइन के वर्तमान संदर्भ में इन हालात को नहीं बदल सकते।

नेहरू युग की संस्थाएं

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हम वहां नीतिगत माहौल में कभी बदलाव होता नहीं देख सकेंगे, जहां शहरों के लिए कोई दूरदर्शी आर्थिक, परिवहन या सामाजिक योजना नहीं है, जो हमें न्यूनतम जरूरतों के लिए भी बेहतरीन सेवा के साथ, आने वाले दशकों में ले जा सके।

नौकरशाहों से भरी कानूनी महानगरीय योजना समितियां, जिनकी बैठकें बिरले ही होती हैं, 74वें संशोधन के माध्यम से निर्वाचित अधिकारियों की राह में रोड़ा अटकाती हैं।

कानून कहता है कि शहरी विकास प्राधिकरण तकनीकी सचिवालयों की तरह काम करेंगे, लेकिन अब भी नेहरूवादी युग के डायनासोर या तो पुणे जैसे बड़े शहरों में नहीं हैं या मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगरों में दिखावे भर की हैं।

सपना ही रहेंगा

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इस तरह के निकायों को तकनीकी सचिवालयों के रूप में काम करना चाहिए जो नीतियों और नजरिए को लागू की जा सकने वाले कार्यक्रमों और परियोजनाओं में बदल सके।
स्मार्ट शहरों का प्रशासन चलाने वाले लोगों का भी स्मार्ट होना जरूरी है। इन शहरों को चलाने वाले स्मार्ट नेताओं के लिए संस्थागत तंत्र का भी स्मार्ट होना जरूरी है।

निजी उद्यमियों और सार्वजनिक क्षेत्र से आने वाले स्मार्ट शहर का सपना देखने वालों को अधिक स्मार्ट मुख्यमंत्रियों, चापलूस मुख्य सचिवों और आस-पास के 'चमचों' के जाल में नहीं फंसना चाहिए, जो चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, लुभावने शब्द पकड़ाते हैं और जादुई मुहावरे गढ़ते हैं।

लुभावने शब्द न रह जाएं

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मौलिक, संस्थागत बदलावों पर जब तक बहस नहीं हो जाती और इन्हें वास्तविक नहीं बना दिया जाता तब तक समावेशी, टिकाऊ और कार्यात्मक शहर भाषण लिखने वालों और संगोष्ठियों में हिस्सा लेने वालों के शब्द ही बने रहेंगे।

तो, जनता के बीच चर्चित 'स्मार्ट सिटी' कहलाने वाला यह जादू है क्या? क्या यह कानों को अच्छा लगने का एक शब्द मात्र है? क्या यह सभी संस्थागत बाधाओं और नौकरशाही रुकावटों से बाहर आ सकता है? असली स्मार्ट शहर वे होंगे जो बदली हुई संस्थागत रूपरेखा के भीतर काम करेंगे और हमें अभी ऐसा ही करने की जरूरत है।

हमें असली मुद्दों को अबूझ तकनीकी के दिखावे और चालाक वक्तृता वाले जादुई पुरुषों के पीछे दबा नहीं देना चाहिए। संगीतमय स्मार्ट सिटी के आख्यान का खतरा यह है कि यह उस महाकाव्यात्मक कहानी से ध्यान हटाता है, जिसे दोबारा लिखे जाने की जरूरत है।

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