सही साबित हो रहा है ‘मोदी सरकार’ का नारा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भाजपा ने इस बार का पूरा चुनाव एक बड़े नारे ‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नाम पर लड़ा। पार्टी के सत्ता में आने के बाद यह नारा बिल्कुल सही साबित हो रहा है।
पिछले दस दिनों के घटनाक्रमों को देखें तो साफ हो जाएगा कि केंद्र में एनडीए की नहीं बल्कि मोदी की सरकार है। हर चीज सत्ता के केंद्रीकरण की ओर इशारा कर रही है।
पूरी ताकत प्रधानमंत्री या पीएमओ के पास सिमटती जा रही है। पीएम की कुर्सी संभाले एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ है कि मोदी ने अपनी ताकत का पूरा इस्तेमाल शुरू कर दिया है।
न सिर्फ नौकरशाहों और मंत्रियों के बीच बल्कि पार्टी में भी उन्होंने इसे जताना शुरू कर दिया है। मोदी ने हाल में भाजपा के महासचिवों की बैठक कर पार्टी और इसके बाहर उनके आचरण पर नसीहत दे डाली। साफ है कि मोदी पार्टी पर पूरा नियंत्रण चाहते हैं और इसमें उन्हें संघ परिवार का पूरा समर्थन हासिल है।
स्मृति ईरानी पहले ही शुरू कर चुकी है काम
मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने हाल में भारतीय संस्कृति और परंपराओं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने का जो बयान दिया है उससे देश भर को संघ के एजेंडे की झलक मिल जानी चाहिए।
मोदी ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार के सभी शीर्ष सचिवों से कैबिनेट मंत्रियों की गैर मौजूदगी में बात की। यहां तक कि उन्होंने अफसरों से भी कहा कि अगर काम करने में कोई दिक्कत महसूस होती है तो सीधे उनसे बात करें।
इन कदमों से मोदी ने यह साफ कर दिया है कि पूरी कमान उनके हाथ में है। वह उन अफसरों का पूरा बचाव करेंगे, जो समस्याओं को खत्म करने की पहल करेंगे। लेकिन इस चक्कर में मोदी ने कैबिनेट मंत्रियों की भूमिका छोटी कर दी है और यह संदेश दिया है कि पूरी ताकत पीएमओ के पास है और हर किसी का साबका इसी से पड़ेगा। मंत्री बीच में नहीं आएंगे।
पीएमओ के पास है सारी पॉवर
एक वरिष्ठ नौकरशाह ने कहा कि इस तरह मोदी ने यह संदेश दिया है कि वही असली बॉस हैं और पीएमओ ही वह सुपर पावर है, जो चीजें तय करेगा। शासन में एनडीए की भूमिका को लेकर कोई बात नहीं की जा रही है।
बहरहाल, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और नृपेंद्र मिश्र को प्रधान सचिव नियुक्त करने के बाद अमेरिका में भारत के राजदूत जयशंकर को पीएम का विशेष विदेश नीति सलाहकार बनाने के लिए पीएमओ में कवायद शुरू हो चुकी है।
पीएमओ में जयशंकर की नियुक्ति होती है तो विदेश मंत्री और विदेश सचिव दोनों की अहमियत घट जाएगी। विदेश नीति पर सीधे पीएमओ फैसला लेगा। पेट्रोलियम जैसा अहम मंत्रालय अनुभवहीन धर्मेंद्र प्रधान को दिया गया है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमन और मानव संसाधन विकास मंत्रालय स्मृति ईरानी को दिया जाना यह साफ करता है कि अनुभव की कमी उन्हें पीएमओ पर निर्भर बना देगी।
मोदी करेंगे सारी नियुक्तियां
साफ है कि इन मंत्रालयों के नीतिगत मामलों पर मोदी ही फैसला लेंगे। आने वाले दिनों में पीएमओ में अहम नियुक्तियां सीधे मोदी ही करेंगे।
साथ ही डिप्टी एनएसए, नए आईबी चीफ और योजना आयोग के उपाध्यक्ष और उनके सदस्यों की नियुक्तियों पर भी उन्हीं की चलेगी। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक आने वाले दिनों में मोदी को ताकत का विकेंद्रीकरण करना होगा।
क्योंकि एक जगह सारी ताकत केंद्रित कर देने से पीएमओ का बोझ काफी बढ़ जाएगा। मोदी ऐसे कई टेक्नोक्रेट और एक्सपर्ट नियुक्त करेंगे जो उनकी सरकार की अहम परियोजनाओं पर निगरानी रखेंगे।
सत्ता का केंद्रीकरण
मोदी ने शीर्ष सचिवों और अफसरों से किसी भी समस्या पर सीधे उनसे बात करने का निर्देश देकर साफ कर दिया है कि पूरी कमान उनके हाथ में है।
लेकिन इस चक्कर में मोदी ने कैबिनेट मंत्रियों की भूमिका छोटी कर दी है और यह संदेश दिया है कि पूरी ताकत पीएमओ के पास है। अनुभवहीन मंत्रियों को महत्वपूर्ण मंत्रालय देने से भी यह तय हो गया है कि इन मंत्रालयों के नीतिगत मुद्दों पर मोदी ही फैसला लेंगे।