सियाचिन: जम जाते हैं आंसू, चली जाती हैं आंखों की रोशनी
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सियाचिन में हुए हिमस्खलन में छह दिन तक दबे रहे लांस नायक हनुमंथप्पा आखिर जिंदगी की जंग हार गए। लेकिन हम यहां आपको एक सेना के अधिकारी की जुबानी सियाचिन की चुनौतियों के अनुभव से रूबरू करा रहे हैं, जो खुद करीब छह-सात साल पहले सियाचिन में तैनात थे। ये चुनौतियां ऐसी हैं, जिन्हें जानकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे।
भारतीय सेना के एक अधिकारी बताते हैं कि सियाचिन में पाकिस्तान और चीन से बड़ा दुश्मन हम लोगों के लिए वहां का मौसम, अकेलापन और भूख है। जब कोई नया जवान वहां पहली बार पोस्टिंग के लिए आता है, तो ठंड के लिए के कारण उसे भूख लगना बंद हो जाती है।
दिमाग कहता है कि उसे भूख नहीं लगी है, लेकिन शरीर को अधिक ठंड के कारण किसी भी तरह की ऊर्जा लेनी होती है। हम लोगों को खाने के लिए सूखे आलू, करेला, सब्जी (डिहाइड्रेटेड वेजिटेबल) दी जाती है, जिन्हें उबालकर खाते हैं। ये खाना इतना स्वादहीन होता है कि तीन-चार दिन बाद भूख लगना बंद हो जाती है। जिससे कई बीमारियां पैदा होने लगती है। इसके अलावा अधिक थकावट होने के बावजूद नींद भी कम आती थी। अगर कोई जवान तीन-चार घंटे भी सो ले तो वह अच्छा माना जाता है।
छिल जाती है आंखे
अधिक ठंड, भूख न लगने और अकेलेपन के कारण भ्रांति पैदा होने वाली बीमारी
होने लगती है। जैसे उस जवान को लगता है कि उसके सामने कोई बैठा है जबकि
वास्तव में वहां कोई नहीं होता है। निगरानी के लिए निकलते समय हमें खाना
सप्लाई करने का एक मात्र जरिया होता है हेलीकॉप्टर।
ॉ
हेलीकॉप्टर सामान के
पैकेट को पैराशूट से फेंकते थे और अगर हवा ने साथ नहीं दिया, तो वह खाना भी
इधर-उधर बनी खाइयों में गिर जाता है। ऐसी स्थिति में मैं अपने साथ चिप्स
के पैकेट रखता था, जो दिल्ली से खरीदे गए थे। सीमित केरोसिन हमारे लिए लाइफ
लाइन का काम करती है। इसी कैरोसिन से वहां मौजूद बर्फ को गर्म करते हैं,
छानते हैं और उपयोग में लाते हैं।
खाना खाने के लिए हम लोग फूड परेड करते
हैं, जिसमें न चाहते हुए भी जबरन नाश्ता और खाना खाते हैं, ताकि शरीर को
सलामत रख सकें। हवा में उड़ने वाले बर्फ के छोटे-छोटे कण हम पर भारी
पड़ जाते हैं। अधिकारी ने बताया कि अगर हमने सांस लेते वक्त मुंह पर हाथ
नहीं रखा तो बर्फ के छोटे कण हमारे फेफड़ों में चले जाते हैं, जिनसे
फेफड़ों में पानी भर जाता है।
इसके अलावा ये छोटे कण हमारी पलकों पर जम
जाते हैं, अधिक ठंड होने के कारण आंखों से आंसू आते हैं। बर्फ के ये कण
आंसुओं को जमा देते हैं। अगर हमने इन्हें धोखे से रगड़ लिया तो आंखें छिल
जाती हैं, जिससे कई बार आंख जाने का भी खतरा रहता है। मैंने भी एक बार
आंखों की पलकों को रगड़ दिया था, जिससे मुझे बहुत तेज दर्द हुआ, हालांकि
मैं जल्दी ठीक भी हो गया।
(वर्तमान में संवेदनशील इलाके में तैनात
सैन्य अधिकारी से अमित कुमार निरंजन की बातचीत पर आधारित। सुरक्षा कारणों
से हम इनका नाम और रैंक नहीं दे रहे हैं)