फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   sikhs made gurdwara for muslims

भारत का वो शहर, जहां सिखों ने मुस्लिम के लिए बनाया गुरुद्वारा

Wed, 08 Jul 2015 03:38 PM IST
Updated Wed, 08 Jul 2015 03:38 PM IST
विज्ञापन
sikhs made gurdwara for muslims

भारतीय पंजाब में सिर्फ़ मलेर कोटला एक शहर है जहां आज भी मुसलमानों का बहुमत है और पूरे पंजाब में रमजान के दौरान इतनी रौनक कहीं और नहीं होती, जितनी इस शहर में होती है।

विज्ञापन


बाकी पंजाब में जगह-जगह पुरानी मस्जिदें वीरान पड़ी हैं लेकिन मलेर कोटला में दाख़िल होते ही तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है। यहां चारों ओर आलीशान मस्जिदें और ऐतिहासिक इमारतें हैं जो बीते दौर की याद दिलाती हैं।
विज्ञापन


आखिर ऐसा क्या और क्यों हुआ कि बंटवारे के समय मलेर कोटला सुरक्षित रहा और वहां के मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए? इसके पीछे एक रोचक कहानी है।

ख़ून-ख़राबे से बचा रहा

sikhs made gurdwara for muslims

पंजाब के शिक्षा विभाग में उप निदेशक प्रोफेसर मोहम्मद रफी स्थानीय इतिहास के जानकार हैं। वे कहते हैं, ''विभाजन के समय मलेर कोटला ख़ून-ख़राबे से बचा रहा और यहां के मुसलमानों ने कभी पलायन के बारे में नहीं सोचा क्योंकि सिख कौम मलेर कोटला के नवाब मोहम्मद शेर ख़ान की कद्र करती है।''

प्रोफेसर रफ़ी कहते हैं, "बात 1705 की है जब देश में मुगलों का शासन था और सरहिंद में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह के दो मासूम बेटों को दीवार में जिंदा चुनवाया जा रहा था। माना जाता है कि उस समय नवाब मोहम्मद शेर ख़ान ने इसका विरोध किया था और तब से ही सिख समुदाय उनका एहसान मानता है।''

उसी समय से ही मलेर कोटला धार्मिक सद्भाव की मिसाल बना हुआ है। सिखों ने नवाब शेर मोहम्मद ख़ान की याद में एक गुरुद्वारा भी बनाया है जिसे 'हा का नारा' या हक़ की आवाज़ का नाम दिया गया है। इस गुरुद्वारे की व्यवस्थापक समिति के प्रमुख और राज्य के मुख्य सूचना अधिकारी अजित सिंह कहते हैं कि सिख कौम नवाब शेर मोहम्मद ख़ान की आभारी है।

वे कहते हैं, ''उन्होंने हक़ के लिए आवाज़ उठाई थी, उन्होंने कहा कि बच्चों का क्या दोष है और यह गुरुद्वारा इस बात का प्रतीक है कि हमें वह बात अब भी याद है।''

किस्से अभी बाकी हैं

sikhs made gurdwara for muslims

मलेर कोटला के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक मोहम्मद ख़लील कहते हैं कि इतने बड़े राज्य में एक समुदाय के लिए यूं अकेले रहना आसान नहीं लेकिन अब अकेलेपन का वो अहसास भी बाकी नहीं रहा जो कभी विभाजन के बाद हुआ करता था।

वे कहते हैं, ''अब हम शिक्षा में भी आगे आए हैं, नौकरियों में भी अब कभी अकेलेपन का एहसास नहीं होता, पहले हमारे बुजुर्गों को लगता था कि हम पाकिस्तान क्यों नहीं चले गए लेकिन अब हम यहाँ खुश हैं।''

स्थानीय उद्योगपति मोहम्मद यासीन ख़ालिद कहते हैं कि ये शहर धार्मिक सद्भाव की मिसाल है, यहाँ कभी सांप्रदायिक तनाव नहीं हुआ। वे कहते हैं, ''हम मिलकर रहते हैं। पहले हमने खुद को मलेर कोटला तक सीमित कर रखा था लेकिन खुशहाली और शिक्षा के साथ ये दूरी भी ख़त्म हो गई हैं।''

प्रोफेसर रफी कहते हैं कि इतने बड़े राज्य में किसी भी धर्म की आबादी इतनी कम हो तो ये दिक्क़त की बात तो होती है लेकिन इसके अपने फ़ायदे भी हैं। वे कहते हैं, ''अब हमारे यहां जाति का अंतर ख़त्म हो गया है, अब जब यहां शादियां होती हैं तो हम जाति नहीं देखते।''

मलेर कोटला के शासकों का सुंदर मुबारक महल अब खंडहर का रूप ले चुका है। यहां के शाही परिवार की कहानी तो ख़त्म हो गई लेकिन नवाब शेर मोहम्मद ख़ान की न्यायप्रिय के किस्से अभी बाकी हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed