शव जलाने के लिए लकड़ी पड़ी कम, मजबूरी में गड्ढे में दफनाया
भूकंप एपीसेंटर के नजदीक स्थित झाला गांव में पनबिजली परियोजना में काम करने वाले कामगार सोमवार को सामूहिक कब्रगाह के लिए जमीन खोदने में जुटे रहे। पारंपरिक रीति-रिवाज से इन शवों का दाह संस्कार होना था, लेकिन गांव में इतनी लकड़ी तक नहीं थी कि शवदाह किया जा सके। परियोजना के प्रभारी इंजीनियर बिशेष प्रसाद ने बताया कि-‘‘हमारे पास इतने शवों को दफन करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है।’’
घाटी के इस गांव में नदी के दोनों तरफ मक्के की फसल लहलहा रही थी लेकिन रविवार को यहां 15 लोग जमीन में धंस गए थे, सोमवार को यहां के कामगार 14 और शवों को दफनाने की व्यवस्था में जुटे थे। इस बीच यहां का नजदीकी गोरखाओं का गांव ‘बारपक’ भी भूकंप में बुरी तरह प्रभावित हुआ है। वहां की पुलिस ने झाला गांव के इंजीनियर को बताया कि ‘बारपक’ में 97 शव मिले हैं। यहां रविवार को भू-स्खलन के चलते गांव जाने वाली सड़क भी क्षतिग्रस्त हो चुकी है, इसलिए शवों को पैदल ही लाना होगा।
नर बहादुर’ ने अपनी आंखों के सामने खत्म होते देखा परिवार
काफी खराब सड़कों से होते हुए काठमांडू से महज चार घंटे की दूरी पर स्थित गोरखाओं के गांव ‘धिस्का’ में भी भूकंप ने सब कुछ तबाह कर डाला। गांव के 37 वर्षीय नर बहादुर ने गांव के 75 घरों के अपनी आंखों के सामने जमींदोज होते देखा है।
नर बहादुर ने बताया कि-‘‘गांव में विवाह समारोह चल रहा था, इसलिए हम कुछ लोग बाहर खुले में बैठे थे। मैंने देखा कि अचानक पांडाल जमीन में समाने लगा, और उसके भीतर कम से कम 60 से 70 लोग उसी समय मारे गए। हमारे पास अब कुछ नहीं है, हमने जितना अनाज स्टोर करके रखा था सब खत्म हो चुका था। मैंने अपने परिवार को खिलाने के लिए पांच किलो चावल उधार लिए हैं। सरकार ने हमें कुछ नहीं दिया है, हम सड़क पर सो रहे हैं।’’नर बहादुर ने बताया कि काठमांडू हमारे गांव से नजदीक है लेकिन सरकार ने अब तक हमारी कोई सुध नहीं ली है।
लाखों बच्चों को मदद की जरूरत
संयुक्त राष्ट्र की चिल्ड्रन फंड रिपोर्ट के मुताबिक शनिवार के भूकंप के बाद से अब तक यहां के 9 लाख 40 हजार बच्चों को मदद की सख्त जरूरत है, क्योंकि बुरी तरह चरमराई सफाई व्यवस्था के कारण बीमारी का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
यूनीसेफ ने एक बयान में कहा कि-‘‘नेपाल में बढ़ती जरूरत के हिसाब से हम अपना स्टॉफ और आपूर्ति बढ़ाने के लिए तत्पर हैं।