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केंद्र में तेज होगी भाजपा विरोधी गोलबंदी

Mon, 09 Nov 2015 05:37 AM IST
Updated Mon, 09 Nov 2015 05:37 AM IST
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side effects of Bihar election will soon seen in Central politics

बिहार विधानसभा चुनावों में जिस तरह जनता दल(यू),राजद और कांग्रेस के महागठबंधन को जबर्दस्त जीत मिली है, उससे साफ हो गया है कि राष्ट्रीय राजनीति में अब भाजपा और सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों का ध्रुवीकरण तेज होगा। जहां नीतीश कुमार गैर भाजपा धर्मनिरपेक्ष दलों की राजनीति केएक नए नेता केरूप में उभरेंगे वहीं चुनाव नतीजों में जिस तरह राष्ट्रीय जनता दल को अप्रत्याशित सफलता मिली है, उससे जहां बिहार और महागठबंधन में लालू प्रसाद यादव का दबदबा बढ़ा है, वहीं नीतीश कुमार को भी यह साबित करना है कि उनकी सरकार के दौरान कथित जंगल राज की वापसी नहीं होगी।

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चुनाव नतीजों से साफ है कि बिहार की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल की बजाय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समावेशी विकास मॉडल को ज्यादा तरजीह दी और भाजपा के जंगल राज की वापसी के डर को अनसुना कर दिया। वहीं महागठबंधन का आरक्षण पर खतरा, बिहारी बनाम बाहरी का दांव सफल रहा। जबकि प्रधानमंत्री द्वारा बिहार के लिए घोषित 1.25 लाख करोड़ रुपए के बिहार पैकेज को एनडीए नहीं भुना सका। भाजपा और एनडीए की तरफ से किसी को मुख्यमंत्री केउम्मीदवार केरूप में भी पेश न करना भी महागठबंधन केलिए फायदेमंद रहा।
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इन चुनावों में जहां भाजपा ने पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और प्रचार शैली पर भरोसा किया, वहीं महागठबंधन ने नीतीश कुमार की लोकप्रियता और लालू यादव की जमीनी ताकत को चुनावी युद्ध में अपना हथियार बनाया। व्यूह रचना की दृष्टि से जहां एनडीए ने आठ से दस विधानसभा क्षेत्रों के बीच में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 26 से ज्यादा चुनावी रैलियां आयोजित कीं, जिनमें जमकर भीड़ भी जुटी। वहीं महागठबंधन के दोनों नेताओं नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने विधानसभा स्तर पर अपनी चुनावी सभाएं की। नीतीश कुमार ने 220 और लालू यादव ने 250 सभाओं को संबोधित किया।
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स्थानीय नेताओं को किया दरकिनार

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हालांकि दोनों खेमों ने चुनाव में प्रकट रूप विकास और सुशासन की बात कही, लेकिन दोनों का ही जोर सामाजिक समीकरणों और ध्रुवीकरण पर रहा। जहां भाजपा ने अपने सवर्ण जनाधार के साथ रामविलास पासवान,उपेंद्र कुशवाहा के साथ जीतन राम मांझी को जोड़कर दलित महादलित और पिछड़ों का के मजबूत समीकरण बनाने का दांव चला,वहीं नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने कांग्रेस को साथ लेकर यादव, कुर्मी, मुस्लिम और अति पिछड़ों का एक बड़ा सामाजिक आधार तैयार करने की कोशिश की। चुनाव प्रचार में जहां संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान को महागठबंधन ने अपना प्रमुख चुनावी हथियार बनाकर एनडीए को घेरा,वहीं भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले पिछडा और फिर अति पिछड़ा बताकर इसका जवाब दिया।

दादरी की घटना और गोमांस को लेकर लालू प्रसाद यादव केबयानों पर भी दोनों पक्षों के बीच जमकर बयानबाजी हुई और चुनाव केआखिरी दौर तक आते आते मुसलमानों को आरक्षण देने और गो माता की रक्षा का विज्ञापन देकर भाजपा ने हिंदू ध्रुवीकरण का अस्त्र भी चला। लेकिन हिंदू ध्रुवीकरण की भाजपा की कोशिश इसलिए कामयाब नहीं हो सकी क्योंकि जमीन पर लोगों केबीच नीतीश कुमार की छवि, उनके सरकार केदस साल के दौरान हुए विकास और दाल व अन्य जरूरी चीजों की महंगाई, काले धन की वापसी और सबके खातों में 15 लाख रुपए जमा कराने में केंद्र सरकार की वादा खिलाफी, किसानों की तबाही जैसे मुद्दे ज्यादा कारगर रहे। इसके अलावा भाजपा द्वारा किसी को मुख्यमंत्री पद के लिए पेश न करना भी एनडीए को भारी पड़ा। भाजपा के प्रचार अभियान में स्थानीय भाजपा नेताओं की तुलना में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को जरूरत से ज्यादा तरजीह मिलने से नीतीश और लालू को बिहारी बनाम बाहरी का मुद्दा उठाने का मौका भी मिल गया।

इसकी शुरुआत मुजफ्परपुर की पहली रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नीतीश कुमार के डीएनए को लेकर दिए गए बयान से ही हो गई थी। पूरे चुनाव में नीतीश लालू ने इसे बिहार केलोगों के डीएनए पर सवाल उठाने केरूप में प्रचारित किया गया। इन नतीजों से साफ है कि भाजपा बिहार में कोई एक ऐसा मुद्दा नहीं उठा सकी जिस पर वह नीतीश कुमार और लालू यादव को घेर पाती। जंगल राज के उसके नारे ने यादवों को महागठबंधन के साथ और मजबूती से गोलबंद कर दिया। जबकि प्रधानमंत्री के 1.25 लाख करोड़ रुपए केबिहार पैकेज को भी भाजपा व एनडीए मुद्दा नहीं बना सके।

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