फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   shivsena rajan vichare issue in maharashtra sadan

इतने बेचारे नहीं हैं शिवसेना के विचारे!

Fri, 25 Jul 2014 04:02 PM IST
मधुकर उपाध्याय/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मधुकर उपाध्याय/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए Updated Fri, 25 Jul 2014 04:02 PM IST
विज्ञापन
shivsena rajan vichare issue in maharashtra sadan

महाराष्ट्र सदन में एक रोज़ेदार कर्मचारी के मुंह में शिवसेना सांसदों के जबरन रोटी ठूंसने की घटना राजनीतिक बवाल का सबब बनी हुई है।

विज्ञापन


शिवसेना इसे विपक्षियों द्वारा सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश बता रही है तो बीजेपी बगले झांक रही है।

क्या इतनी सनसनीखेज खबर या वीडियो फुटेज को कोई संपादक रोककर रख सकता था? यह संभव नहीं लगता। तो फिर किसके आदेश पर इस फुटेज को पांच दिन रोका गया और फिर जारी किया गया?

क्या यह नई तरह के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, बारीक हिंदुत्व, का इस्तेमाल है?

रोज़ेदार को ठूंसी गई रोटी

shivsena rajan vichare issue in maharashtra sadan

इस घटनाक्रम में, एक बेहद मामूली सवाल यह है कि अगर सांसद उस कर्मचारी का नाम अफरा-तफरी में पढ़ नहीं पाए तो वे उसे सुन क्यों नहीं पाए कि वह रोजे से है, जो वह बार-बार कह रहा था।

17 जुलाई को दिल्ली के नवमहाराष्ट्र सदन में हुई घटना असामाजिक, असभ्य और गैरकानूनी है क्योंकि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि राजन विचारे ने एक सरकारी कर्मचारी के मुंह में जबरन रोटी ठूंसने की कोशिश की, जैसा टीवी चैनलों ने दिखाया।

यह घटना निंदनीय और घृणित हो जाती है जब उस कर्मचारी का नाम अरशद जुबैर होता है, और चल रहे रमजान के महीने में वह रोजा रखे हुए होता है।

उसका नाम सरकारी वर्दी पर लिखा होता है लेकिन वहां मौजूद 11 सांसदों में से एक भी उसे पढ़ नहीं पाता, पढ़ना नहीं चाहता।

इसे ख़राब खाने और घटिया व्यवस्था के विरोध का सामान्य मामला मानने और एक सतही माफी के साथ रफा-दफा करने का तर्क सहज नजर नहीं आता, जैसा शिवसेना के सांसद और बगले झांकते भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता उसे बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

घटना से उठे सवाल

shivsena rajan vichare issue in maharashtra sadan

यह पूरी घटना इतनी सीधी होती तो विपक्षी दलों पर लगाए गए आरोप लग और चिपक गए होते कि वे इसे सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं, जबरन इसे हिंदु-मुस्लिम मामला बनाया जा रहा है।

इस घटनाक्रम में, एक बेहद मामूली सवाल यह है कि अगर सांसद उस कर्मचारी का नाम अफरा-तफरी में पढ़ नहीं पाए तो वे उसे सुन क्यों नहीं पाए कि वह रोज़े से है, जो वह बार-बार कह रहा था?

इन सवालों के जवाब भी आने होंगे कि यदि इस घटना को तूल नहीं देना होता तो टेलीविजन कैमरे वहां क्यों बुलाए गए थे या फिर यह कि किसने बुलाए थे?

एक सवाल यह भी होगा कि वह कौन था जिसके कहने पर फुटेज को पांच दिन तक रोक कर रखा गया? यह भी कि पांच दिन बाद उसे दिखाने का निर्णय कैसे लिया गया और किसने लिया?

विज्ञापन

संसद में जमकर हंगामा

shivsena rajan vichare issue in maharashtra sadan

कथित सामान्य घटना की सामान्य रिपोर्टिंग का यह मामला पत्रकारिता के सबसे सहज और पहले सिद्धांत को अनदेखा करता है और पहली नज़र में ही लगता है कि बात संपादकीय उत्तरदायित्व के दायरे से बाहर चली गई है।

घटना राजधानी दिल्ली की थी किसी दूरदराज इलाके की नहीं कि तस्वीरें मुख्यालय पहुंचने में वक्त लग गया हो। फुटेज सामग्री भी इतनी विस्फोटक कि उसे समाचारों की अहमियत समझने वाला कोई भी व्यक्ति कभी न रोकता।

यह तथ्य भी इसी ओर इशारा करते हैं कि मामला गैर संपादकीय हस्तक्षेप का हो सकता है। केवल इसी आधार पर इसकी पृष्ठभूमि में राजनीति ढूंढना उचित न होता अगर शिवसेना की ओर से लीपापोती न शुरू हो गई होती।

पहले पूरी तरह खंडन, फिर रोटी ठूंसने को केवल शाब्दिक करार देना, उसे सांसदों की सुविधा की अनदेखी से जोड़ना और अंत में यह कहना कि महाराष्ट्र सदन की घटना गोधरा जैसी है। मतलब यह कि लोगों को गुजरात के दंगे याद हैं, गोधरा की रेल नहीं।

परोक्ष रूप से ही सही, यह शिवसेना की ओर से घटना को सांप्रदायिक रंग देना ही लगता है। वरना उनके शब्दों में रोटी ठूंसने की मामूली घटना को समझाने के लिए उसे दंगों और हत्याओं से क्यों जोड़ा जाता?

बारीक हिंदुत्व

shivsena rajan vichare issue in maharashtra sadan

महाराष्ट्र की घटना को शिवसेना का षड्यंत्र, राजनीतिक ध्रुवीकरण का प्रयास और उसे राज्य विधानसभा के चुनावों से जोड़ने वाले, हो सकता है कि हड़बड़ी में कूदकर नतीजे तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हों।

लेकिन इसे पूरी तरह ख़ारिज करने के पर्याप्त आधार भी उपलब्ध नहीं हैं। यह यकीनन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का महीन खेल है जो पहले के कट्टर हिंदुत्व से सर्वथा अलग है। यह अयोध्या के सीधे टकराव और बाबरी मस्जिद के ध्वंस से अलग बारीक हिंदुत्व का खेल बन गया है।

गुजरात और उत्तर प्रदेश इस प्रयोग और उसकी कामयाबी के नमूने हैं। कांग्रेस पर नरम हिंदुत्व का आरोप लगाने वाली सियासी जमातों ने पुराने तौर तरीकों की विफलता को देखते हुए शायद यह महीन खेल उसी से सीखा है।

कांग्रेस अब बहुत पीछे छूट गई है जबकि भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों ने इसमें महारथ हासिल कर ली है। उनका जादू मुंह में रोटी ठूंस कर बोलता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed