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फैसलों में देरी से क्या उद्धव करा रहे अपनी फजीहत?

Mon, 10 Nov 2014 02:51 PM IST
Updated Mon, 10 Nov 2014 02:51 PM IST
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Special Report - Shivsena and BJP Controversy in Maharashtra

उद्धव ठाकरे का कहना है कि उन्हें किसी बात की जल्दी नहीं है। जल्दी में वे तब भी नहीं थे जब भाजपा ने 22 दिनों तक सीटों के बंटवारे की नोंकझोंक के बाद 25 सितंबर को शिवसेना से नाता तोड़ महाराष्ट्र में अकेले विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की थी।

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चुनाव में हार के बाद भी उद्धव ने पार्टी की भूमिका पर फैसले में जल्दी नहीं दिखाई और एनसीपी ने कह दिया कि हम सरकार बनाने के लिए भाजपा को बिना शर्त समर्थन देंगे। शरद पवार की इस चाल से उद्धव की मोलभाव करने की ताकत खत्म हो गई।
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मुंबई में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के शपथ ग्रहण समारोह पर भी शिवसेना प्रमुख को जल्दी नहीं थी। वे भाजपा से अपने मंत्रियों के नामों तथा विभागों की आस लगाए बैठे थे। समारोह के बहिष्कार तक की धमकी दी थी। मगर अंतिम क्षणों में फडणवीस और लालकृष्ण आडवाणी द्वारा फोन करने पर गए माने और समारोह में पहुंचे।

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पवार ने छिनी उद्धव की मोलभाव की ताकत

Special Report - Shivsena and BJP Controversy in Maharashtra

उद्धव के फैसलों में आरामतलबी का आलम यह है कि दिल्ली में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए उनसे शिवसेना के दो नेताओं के नाम मांगे गए, लेकिन आखिरी मौके पर रविवार सुबह अनिल देसाई को दिल्ली भेजने का फैसला हुआ और वह राजधानी के हवाईअड्डे को छूकर मुंबई लौट आए। उन्होंने मंत्री पद की शपथ नहीं ली।

अब महाराष्ट्र में सोमवार से विधानसभा सत्र शुरू होना है और उद्धव तय नहीं कर सके हैं कि उनकी पार्टी विपक्ष में बैठेगी या नहीं। उद्धव कह रहे हैं कि अगर एनसीपी से भाजपा ने समर्थन लिया तो शिवसेना विपक्ष में बैठेगी। यानी अब भी वह फैसला नहीं लेंगे। उद्धव के इस अंदाज से उनकी पार्टी की फजीहत हो रही है।

सूत्रों के अनुसार चुनाव के दौरान शिवसेना की तरफ से हुए हमलों से भाजपा नेतृत्व नाराज है। वह चाहता है कि शिवसेना कुछ विनम्रता दिखाए और सदन में बहुमत के लिए पहले उसके पक्ष में वोट दे, तभी कुछ हो सकता है।

चर्चा यह भी है कि उद्धव इसलिए हर हाल में सत्ता में शामिल होना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें विपक्ष में बैठने पर पार्टी के कुछ नेताओं के टूटने का डर है।

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