शिवसेना ने कहा, ये गोधरा वाले 'नमो' का बयान नहीं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पाक गजल गायक गुलाम अली का कार्यक्रम रद्द होने को दुर्भाग्यपूर्ण कहना शिवसेना को रास नहीं आया है। पार्टी ने पीएम को याद दिलाया है कि वह गोधरा और अहमदाबाद के कारण ही जाने जाते हैं। उन्हें इसी वजह से सम्मान मिला है।
मोदी ने एक साक्षात्कार में पहली बार दादरी घटना पर टिप्पणी करते हुए इसे खेदजनक बताया था। उन्होंने गुलाम अली विवाद पर भी टिप्पणी की थी। पाकिस्तान के पूर्व मंत्री खुर्शीद कसूरी के कारण सहयोगी दल भाजपा से तनी बैठी शिवसेना को पीएम का बयान पसंद नहीं आया।
पार्टी के सांसद संजय राउत ने बुधवार को प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पूरी दुनिया मोदी को गोधरा और अहमदाबाद के कारण जानती है। यदि उन्हीं मोदी ने गुलाम अली और कसूरी विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण कहा है तो यह वास्तव में हमारे लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि उन्होंने दादरी प्रकरण पर मोदी के विचारों से सहमति जताई। राउत ने कहा कि यह घटना दुखद है और ऐसा नहीं होना चाहिए था।
वहीं संघ विचारक एमजी वैद्य ने सुधींद्र कुलकर्णी पर हुई स्याही डालने की घटना पर शिवसैनिकों पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में अपनी बात कहने और विरोध करने का हक सभी को है,लेकिन इसके लिए वे कानून को ताक पर नहीं रख सकते। विरोध करने के कई तरीके हैं लेकिन उसके लिए किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।
'आपातकाल और मुजफ्फरनगर दंगों के समय क्यों नहीं किया विरोध'
केंद्रीय मंत्री ने कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या और दादरी घटना के विरोध में जाने-माने लेखकों द्वारा पुरस्कार लौटाए जाने पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि आपातकाल और मुजफ्फरनगर दंगे के बाद विरोध के ऐसे स्वर मुखर क्यों नहीं हुए।
उन्होंने कहा, ‘एक बात कभी-कभी मुझे दुख पहुंचाती है। इससे पहले भी देश में बड़ी-बड़ी घटनाएं हुई हैं लेकिन उस समय किसी ने भी पुरस्कार नहीं लौटाए।’ प्रसाद ने कहा कि आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता सहित लोकतांत्रिक अधिकारों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया गया था। लेकिन उस समय ऐसी आवाज नहीं उठाई गई।
मुजफ्फरनगर में डेढ़ साल पहले दंगे की भयानक घटना हुई और राज्य सरकार ने जिस तरह से वहां काम किया वह निहायत ही भेद-भाव वाला था। ऐसे समय में भी लेखकों का विरोध नहीं देखा गया। हालांकि, प्रसाद ने कहा कि हम विद्वानों का सम्मान करते हैं लेकिन पूरी विनम्रता के साथ उनसे कहना चाहते हैं कि अगर उन्हें पुरस्कार मिलता है तो उसका आधार उनकी क्षमता और ज्ञान होता है जिन पर सभी को गर्व होता है।
उन्होंने इस विषय पर ज्यादा कुछ नहीं कहा लेकिन यह जरूर कहा कि संस्कृति मंत्री इस पर पहले ही अपना बयान दे चुके हैं। यह पूछे जाने पर कि विपक्ष दादरी घटना पर आलोचना कर रहा है कि उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और अमित शाह दोनों इस मसले पर अपने बयान दे चुके हैं।
उन्होंने कहा कि दादरी की घटना की जिम्मेदारी प्राथमिक तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार की है। उन्हें इस पर कार्रवाई करनी चाहिए। हम इसकी निंदा करते हैं। इस घटना में जो भी दोषी हैं उन पर कार्रवाई होनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि दादरी प्रकरण के विरोध में अब तक 27 लेखक, कवि, नाट्य लेखक और अनुवादक साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा चुके हैं। पंजाबी लेखिका दलीप कौर तिवाना ने भी पद्म श्री पुरस्कार लौटा दिया है।हालांकि, प्रसाद ने सुधींद्र कुलकर्णी पर शिवसेना द्दारा पेंट फेंके जाने के किसी सवाल का जवाब नहीं दिया।
दादरी पर पीएम ने दी कमजोर प्रतिक्रिया : देशपांडे
वरिष्ठ साहित्यकार और हाल ही में साहित्य अकादमी की जनरल काउंसिल से इस्तीफा देने वाली शशि देशपांडे को लगता है कि प्रधानमंत्री ने दादरी घटना को लेकर बहुत ही कमजोर प्रतिक्रिया दी है। पूरी घटना के लिए ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ शब्द सही नहीं है और पीएम नरेंद्र मोदी को आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी।
उन्होंने कन्नड़ साहित्यकार कालबुर्गी की हत्या पर मोदी की चुप्पी पर भी खेद जताया है। देशपांडे ने कहा कि पीएम ने दादरी घटना और गुलाम अली विवाद को दुर्भाग्यपूर्ण कहा है। यह एक बहुत ही कमजोर शब्द है। देश के नेता को देश में घट रही घटनाओं के प्रति नैतिक रूप से जिम्मेदार होना चाहिए। आपको जनता ने चुना है और आपके कुछ शब्द बहुत अंतर पैदा कर सकते हैं।
देशपांडे ने मोदी के उस वक्तव्य से भी असहमति जताई, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा हमेशा से छद्म धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ रही है। इस समय असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी के मसले पर साहित्यकारों के पुरस्कार लौटाने और इस्तीफा देने का सिलसिला चल पड़ा है।
देशपांडे ने भी साहित्य अकादमी से नाता तोड़ लिया है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह अपने पुरस्कार नहीं वापस करेंगी।