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शीना हत्याकांड पर बोले शशि थरूर, मीडिया को कहा जल्लाद

Thu, 03 Sep 2015 05:28 PM IST
Updated Thu, 03 Sep 2015 05:28 PM IST
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shashi slam media over trial in sheena case

देश के हाई-प्रोफाइल शीना हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में जहां पुलिस जुटी है वहीं इस पर पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने हो रहे मीडिया ट्रायल पर निशाना साधा है।

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भारतीय मीडिया पिछले कुछ दिनों से एक रहस्यमय हत्याकांड के पीछे पड़ा हुआ है, लेकिन यह अंधाधुंध कवरेज अनुमानों और संकेतों पर आधारित है जो परेशान करने वाला है। एक जले हुए कंकाल को खोदकर निकाला गया है। माना जा रहा है कि यह कंकाल एक युवती का है जिसे उसकी माँ ने ही तीन साल पहले गला दबाकर मार दिया था।
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इस रईस माँ की तीन बार शादी हुई थी और वो एक टीवी चैनल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी थीं। इस महिला ने अपने वर्तमान पति से अपनी बेटी का परिचय बहन बताकर कराया था। इस कहानी ने 24 घंटे चलने वाले चैनलों पर परोसी जा रही अफवाहों को और मसालेदार बना दिया। लेकिन क्या यह हत्या रहस्य भी है? अगर आप मीडिया पर भरोसा करें तो बिल्कुल नहीं।
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पुलिस की ओर से लीक हुई सूचनाओं और 'भौंचक्के बेवफा' दोस्तों से मिली जानकारियों को आधार बनाकर कथित हत्यारे को पहले ही हत्या का दोषी करार दे दिया गया है।

मीडिया ट्रायल

shashi slam media over trial in sheena case

भारतीय अखबारों और टीवी चैनलों पर जारी इस कवरेज से आप शायद ही विश्वास करें कि जले हुए अवशेष में इस बात के सबूत नहीं है कि वे उस गायब महिला के हैं। ये है भारत का असाधारण मीडिया, जिसमें लोकतंत्र का यह चौथा खंभा गवाह, अभियोजक, न्यायाधीश, ज्यूरी और जल्लाद की भूमिका में लगातार बना हुआ है।

भारत में प्राचीन काल में अभियुक्त को एक अग्नि परीक्षा देनी पड़ती थी। आजकल ये काम मीडिया के जरिए किया जाता है। भारत में अधिकांश टीवी न्यूज चैनल दर्शक और रेटिंग पाने के लिए दिन-रात प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

सही चीजों की जगह ब्रेकिंग न्यूज़ से सनसनी फैलाकर इन चैनलों ने सार्वजनिक सेवा का दिखावा करना तो बहुत पहले ही छोड़ दिया था। दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि प्रिंट मीडिया का भी हाल बहुत अच्छा नहीं है।

उनके पास टीवी से अलग किसी मामले का परिप्रेक्ष्य, गहराई और उसका विश्लेषण करने की क्षमता है और वो इसके दम पर उस कमी को पूरा कर सकते थे।

रेटिंग की लड़ाई

shashi slam media over trial in sheena case

लेकिन अखबार भी मीडिया के कठिन वातावरण में प्रतिस्पर्धा करते दिखते हैं, जहाँ अखबार नहीं बल्कि टीवी चैनल रफ्तार तय करते हैं, हर सुबह उस व्यक्ति के पास अखबार जरूर पहुंच जाना चाहिए, जिसने पिछले दिन टीवी देखा था।

लगता है कि कुछ अखबार अपने प्रतिस्पर्धी टीवी चैनलों से आगे बढ़ने के प्रयास में खबर ब्रेक करना चाहते हैं। अधिकांश टीवी चैनल साल भर चलने वाले रेटिंग युद्ध में लगे रहते हैं। अखबार प्रतिदिन जागरुकता की जगह कामुकता और अराजकता बढ़ाने वाले बैनर हेडलाइन के जरिए टीवी से बने पाठकों तक पहुंचना चाहते हैं।

अगर नरम शब्दों में कहें तो नतीजे परेशान करने वाले हैं। खबर को प्रसारित करने के प्रयास में हमारा मीडिया फैसला करने की जल्दबाजी में है।

यह अक्सर किसी खास वजह से किए गए लीक और दुर्भावनापूर्ण आरोपों में जानबूझकर साझीदार बन जाता है, पत्रकारों के पास आज न तो समय है और न ही खबर को पुष्ट करने की इच्छा।

बेबुनियाद आरोप

shashi slam media over trial in sheena case

तथ्यों, अनुमानों, अटकलों, रिपोर्ट, अफवाहों, सूचना के स्रोतों और निराधार आरोपों में अंतर होता है। इसे दुनियाभर में पत्रकारिता के छात्रों को सिखाया जाता है। आज की भारतीय मीडिया में यह बहुत धुंधला दिखाई देता है। मेरी पत्नी की असमय मौत के बाद पिछले डेढ़ साल में बार-बार अटकलें लगाई गईं, गॉसिप लिखे गए और दोषारोपण किया गया।

इसके बाद से मैं भारतीय मीडिया की इन सीमाओं से परिचित हो गया हूं। जिन मामलों में किसी की जिंदगी और मौत जुड़ी हुई है, उन मामलों में कोई व्यक्ति जिम्मेदार मीडिया से नियंत्रण और रोकथाम की उम्मीद कर सकता है। लेकिन ऐसा होता नहीं है और आप पर हत्या-आत्महत्या जैसे आरोपों की बौछार हो जाती है। हमारे पास अवास्तविक और लंबे समय तक खिंचे मीडिया ट्रायल का तमाशा है, जो कि जानबूझकर किए गए 'खुलासों' पर आधारित हैं।

इससे टीवी चैनलों पर बिना किसी सबूत या प्राथमिक जांच-पड़ताल के होने वाली परिचर्चा और अधिक भड़कती है। पक्षपातपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण दावों को प्रामाणिकता पर सवाल उठाए बिना प्रसारित किया जा रहा है।

इस समस्या का एक हिस्सा यह है कि कोई किसी खबर को पुष्ट करने या उस पर शोध करने का जोखिम नहीं ले रहा है, ऐसे समय में जबकि बहुत से लोग कहानी का अपना संस्करण दिखाना चाहते हैं।

शेखीबाज एंकर

shashi slam media over trial in sheena case

तथ्यों को दुरुस्त करने को लेकर अनिच्छा की प्रवृत्ति है, जिससे मीडिया वर्ग पूर्णत: अनजान बना हुआ है। ख्यालों को प्रसारित करना प्रसारण के घंटों को पूरा करने का सबसे सस्ता रास्ता है, इससे शेखी बघारने वाले एंकर सर्वोच्च रेटिंग हासिल करते हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि मीडिया में विश्वास खत्म हो रहा है।

मेरे एक दोस्त ने इस समस्या को सारगर्भित रूप से संक्षेप में बताया, ''जब मैं युवा था तो मेरे पिता किसी बात पर तब तक विश्वास नहीं करते थे, जब तक कि वह खबर एक विशेष अखबार में प्रकाशित न हो जाए। लेकिन अगर आज कोई खबर उसी अखबार में छपती है तो वे उस पर विश्वास नहीं करते हैं।''

यह सही सोच वाले सभी भारतीयों के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र के लिए जीवन का आधार है। वो ऐसी सूचनाएं उपलब्ध कराता है, जो लोगों को यह विकल्प बनाने के लिए सक्षम करता है कि उस पर कौन राज करेगा और कैसे। यह सत्ता में बैठे लोगों को उन लोगों के प्रति जवाबदेह बनाता है जिन्होंने उन्हें वहां बैठाया है।

यह मीडिया का काम है कि वह चुने हुए लोगों के कामकाज (या अकर्मण्यता) पर नजर रखे, ना कि छोटी-छोटी बातों पर जिसका जनकल्याण पर कोई असर नहीं होता है। कुंद कुल्हाड़ी नहीं आइना और छुरी मीडिया सतही और सनसनीखेज महत्वहीन सार्वजनिक बहसों में लगा हुआ है और उसने सजग प्रहरी की भूमिका को स्वेच्छा से त्याग दिया है।

लोकतंत्र में मीडिया को सजग प्रहरी की भूमिका निभानी चाहिए। इसने लोगों का ध्यान जवाबदेही के उन सवालों से भी हटा दिया है, जिसे जनता को अपने शासकों से करना चाहिए।

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