भाजपा में बुजुर्गों को दरकिनार करने का यह कारण तो नहीं?
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भाजपा में बुजुर्ग नेताओं के टिकट काटने का एक स्पष्ट कारण तो यही है कि नरेंद्र मोदी भविष्य में ऐसे नेताओं को अपने साथ संसद में नहीं ले जाना चाहते, जो उनकी राह में रोड़ा बनें। वह अपनी योजनाओं पर निर्विरोध काम करना चाहते हैं।
दूसरा कारण ऐसा है, जिसे उनके रणनीतिकारों की टीम अमली जामा पहना रही है। वह कारण है, नौजवानों में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता।
रणनीतिकारों की यह टीम इन प्रशंसक नौजवानों के सामने 75-80 साल के नेताओं को नहीं उतारना चाहती।
उम्र का गणित
सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक पहली बार वोट देने वालों में नरेंद्र मोदी और भाजपा सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।
सर्वे के आंकड़ों पर गौर करें तो 18 से 25 साल की उम्र वाले नौजवानों की सबसे ज्यादा पसंदीदा पार्टी भाजपा है। इस आयु वर्ग के करीब 38 फीसदी नौजवानों ने भाजपा को पसंदीदा पार्टी कहा, जबकि कांग्रेस के पक्ष में केवल 23 फीसदी नौजवान थे।
उसके बाद 27 से 35 साल के नौजवानों के बीच भाजपा को पसंद करने वालों की संख्या 35 फीसदी है। कांग्रेस को पसंद करने वालों की संख्या 27 फीसदी है। 36 से 45 वर्ष के आयु वर्ग में भाजपा को 35 फीसदी लोगों ने पसंद किया लेकिन कांग्रेस का समर्थन और घटकर 26 फीसदी पर आ गया।
उम्र बढने पर अंतर कम
सर्वे के अनुसार उम्र जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, भाजपा और कांग्रेस को पसंद करने वालों का अंतर कम होने लगता है।
जैसे 46 से 55 साल के आयु वर्ग में भाजपा को पसंद करने वालों की संख्या घटकर 32 फीसदी पर आ गई, वहीं कांग्रेस को पसंद करने वालों की संख्या 28 फीसदी हो गई।
अब 56 साल से अधिक वालों में भाजपा का आंकड़ा 31 फीसदी और कांग्रेस का 29 फीसदी हो गया। यानी दोनों कमोबेश एक ही स्तर पर आ गए।
रणनीति का आधार
साफ जाहिर है कि 45 वर्ष से ज्यादा के लोगों में भाजपा उतनी लोकप्रिय नहीं है। यही आयु वर्ग सोशल मीडिया और आधुनिक प्रचार माध्यमों का नेटिव (यानी उसके साथ सहज उपयोगकर्ता) है।
यूपीए के दस साल के शासनकाल में आर्थिक विकास की दर घटने से सबसे ज्यादा निराश लोगों की संख्या भी इसी आयु समूह है। जो लोग पहली बार वोट देने जा रहे हैं, उन्होंने पिछले पांच सालों में घटते हुए रोजगार की संख्या देखी है। वे अपने भविष्य को लेकर आशंकित हैं। वे भारत को तेजी से विकास करते देखना चाहते हैं।
इसी तरह अब जो लोग 40-45 वर्ष के हैं, वे यूपीए सरकार के आने के पहले 30-35 वर्ष के थे। दस साल बाद वे भारत में रोजगार के घटते अवसरों को देख रहे हैं। असुरक्षा की यही भावना उन्हें तेजी से नरेंद्र मोदी की ओर ले जा रही है, जो उदारवाद के एजेंडे पर काम करते हुए दिखाई देते हैं।