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'वैज्ञानिक शोध के मामले में हमारा देश फिसड्डी'

Thu, 21 Nov 2013 04:52 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र/अमर उजाला, दिल्ली
हेमेन्द्र मिश्र/अमर उजाला, दिल्ली Updated Thu, 21 Nov 2013 04:52 PM IST
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scientific research in india is not getting required attention

भारत रत्न से नवाजे गए रसायनशास्त्री प्रो सीएनआर राव भले ही नेताओं को 'इडियट' कहने वाले अपने बयान से पीछे हट गए हैं, लेकिन वैज्ञानिक शोध के मामले में हमारा देश फिसड्डी ही साबित हुआ है।

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सरकारी बेरुखी का हाल यह है कि देश में वैज्ञानिक शोधों पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का एक फीसदी से भी कम हिस्सा खर्च होता है!

नए आंकड़ों के मुताबिक, ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत का सहयोगी चीन जहां वैज्ञानिक शोधों पर जीडीपी का 1.97 फीसदी खर्च करता है, वहीं रूस 1.16 फीसदी।

उल्लेखनीय है कि सीएनआर राव ने सचिन तेंदुलकर के साथ उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किए जाने के तुरंत बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि वैज्ञानिक शोध सरकारों की प्राथमिकता में नहीं है। उन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में शोध को बढ़ाने के लिए संसाधनों की आवश्यकता बताई थी।
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अमर उजाला ने वैज्ञानिक शोध की स्थिति पर कई जाने माने वैज्ञानिकों से बात की, तो निराशाजनक तस्वीर सामने आई।

वैज्ञानिक शोधो की ओर बेरुखी
मसलन, द इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस, नई दिल्ली से जुड़े वैज्ञानिक जी बालाचंद्रन कहते हैं कि इस समस्या की वजह नए देसी वैज्ञानिक शोधों की तरफ हमारी बेरुखी है। दवाई और सूचना-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों को अपवाद मानें, तो प्राइवेट सेक्टर देश में वैज्ञानिक शोध और विकास को बढ़ावा देने के बजाय विदेशों से लाइसेंस हासिल करना पसंद करते हैं।
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बालचंद्रन के मुताबिक सरकार की भी मानसिकता अब उसी प्रोजेक्ट को हरी झंडी देने में रही है, जो तुरंत मुनाफा दे। जबकि नए वैज्ञानिक शोध करोड़ों के निवेश करने के बाद भी बेनतीजा हो सकते हैं।

स्पष्ट विज्ञान नीति की आवश्यकता
अलबत्ता साइंस पत्रिका में दक्षिण एशिया प्रमुख रह चुके पल्लव वाघला इससे इत्तफाक नहीं रखते। वह कहते हैं , विज्ञान मंत्रालय जिस तरह हर वर्ष के अंत में बजट का कुछ हिस्सा बिना खर्च किए वापस करता है, उससे यही पता चलता है कि वैज्ञानिक शोधों की दिशा में रकम की नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल करने की सोच की कमी है।

मालूम रहे कि शोध एवं विकास के लिए संप्रग-एक के दौरान हर वर्ष 25 से 30 प्रतिशत की दर से बजट में वृद्धि की गई, जबकि संप्रग-दो में भी तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद पांच से सात प्रतिशत से वृद्धि होती रही है। हालांकि तब भी स्पष्ट विज्ञान नीति का अभाव हमारे देश में है।


जाने-माने परमाणु वैज्ञानिक धीरेंद्र शर्मा कहते हैं कि सुरक्षा के लिहाज से कैग भले ही वैज्ञानिक शोध और विकास को आवंटित होने वाले रकमों की ऑडिट न करे, लेकिन संसद में कम से कम विज्ञान मंत्रालय को लेकर बहस तो हो। सत्ता पक्ष और विपक्ष के विज्ञान पृष्ठभूमि वाले सदस्यों की संयुक्त कमेटी बनाकर वह देश में विज्ञान नीति संचालित करने का सुझाव देते हैं।

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