बाहर आया घोटालों का भूत, रेल डिब्बों की खरीद में घपला!
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भारतीय रेलवे में घोटाले की सुगबुगाहट शुरु हो चुकी है। 2013-14 में रेलवे के अधिकारियों ने आवश्यकता से अधिक रेल कोच की मांग की थी। निर्माण का जिम्मा सरकारी कंपनियों के बजाय एक निजी कंपनी को सौंपने के लिए नियमों में भी फेरबदल किए गए थे।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, 2013-14 में कोच निर्माण कार्यक्रम के तहत 500 सामान्य श्रेणी के कोचों के निर्माण की आवश्यकता बताई गई थी।
इन्हें सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीईएमएल और एक अन्य 'श्रोत' से खरीदा जाना था। रेलवे के कारखानों-इंटिग्रल कोच फैक्ट्री, कपूरथला और रेल कोच फैक्ट्री, रायबरेली में प्रतिवर्ष 1150 से 1200 कोच का निर्माण किया जाता है। रेलवे के अधिकारियों ने जो कोच मांगे थे, वह इन कोचों के अतिरिक्त थे।
250 करोड़ रुपए खर्च होना था कोचों को निर्माण पर
जून, 2013 में रेलवे ने 500 कोचों को निर्माण करने के निए निजी कंपनियों से टेंडर मंगाए थे, जिन पर लगभग 250 करोड़ रुपए खर्च होना था। टेंडरों पर अंतिम फैसला अब तक नहीं हो पाया है।
हालांकि, रेलवे के कई अधिकारी ही टेंडर के विरोध में हैं। उनका मानना है कि सामान्य कोच के निर्माण का ठेका निजी कंपनियों को सौंपना, जिन्हें निर्माण का अनुभव भी नहीं है, कतई ठीक नहीं है।
अधिकारियों का कहना है कि उन कोचों का निर्माण कपूरथला और रायबरेली के कारखानों में भी किया जा सकता है।
सदानंद गौड़ा को लिखा गया पत्र
रेलवे के एक अधिकारी का कहना है कि रायबरेली में हाल ही बनी फैक्ट्री के पास कोच निर्माण के पर्याप्त आर्डर ही नहीं है, जिसकी वजह से फैक्ट्री में पूरी तरह से काम भी शुरू नहीं हो पाया है।
रेलवे ने जिन 500 कोचों के निर्माण का प्रस्ताव दिया है, उसके टेंडर की शर्तों को कोलकाता की एक निजी कंपनी की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया गया। उस कंपनी ने कभी सामान्य कोच का निर्माण भी नहीं किया है।
कोचों की खरीद में घोटाले की आशंका जताते हुए बसपा के एक सांसद ने रेल मंत्री सदानंद गौड़ा को पत्र लिखा है।