लिंग निर्धारण सामग्रियों पर बैन चाहता है सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र को यह दिशानिर्देश दिए हैं कि वह सर्च इंजनों द्वारा इंटरनेट पर लिंग निर्धारण के संबध में उपलब्ध कराई जा रहीं सामग्रियों को परोसे जाने से रोकने के लिए तुरंत कोई कदम उठाए। कोर्ट ने कहा है कि भारत में इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाता है।
कुछ सर्च इंजन जैसे कि गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट ऐसी सामग्रियां मुहैया करा रहे हैं जिसके जरिए आप लिंग निर्धारण ( पैदा होने वाले बच्चे के लिंग के बारे में सुनिश्चित होना) कर सकते हैं। इतना ही नहीं इन साइटों पर कुछ ऐसे क्लीनिकों के पते भी उपलब्ध हैं जो इस प्रकार के कामों में क्लीनिकल सहायता उपलब्ध कराने का काम करते हैं।
एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपना यह फैसला सुनाया है। इस तरह के मुद्दों की देख-रेख के लिए बनाई गई एक समिति के सदस्य साबू मैथ्यू जॉर्ज ने यह याचिका दायर की थी। इस याचिका में कहा गया है कि इस तरह के विज्ञापनों ने इंटरनेट को अपना रास्ता बनाया है, जबकि साल 1994 में ही भारत में प्री-नेटल डाइग्नोस्टिक टेक्नीक एक्ट प्रभावी हो चुका है जो जन्म पूर्व लिंग निर्धारण को रोकता है और इसके साथ ही प्रिंट मीडिया में भी इस तरह के विज्ञापनों को छापे जाने की मनाही है।
समस्या का वैधानिक हल निकालना होगा
न्यायधीश दीपक मिश्रा की बेंच ने कहा कि कुछ ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए जिससे कि इस तरह का कोई भी विज्ञापन वेबसाइटों पर प्रकाशित न हो जिससे भारतीय कानून का उल्लंघन होता हो। उन्होंने कहा कि इसके लिए हमें सूचना एवं तकनीक विभाग की तरफ से मदद चाहिए होगी और हमें कोई वैधानिक हल निकालना होगा।
कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार को भी यह निर्देश दिए हैं कि वो इस तकनीकी मुद्दे से संबंधित योग्य अधिकारियों के साथ 15 दिसंबर को कोर्ट के समक्ष उपस्थित रहें।
सूचना एवं तकनीक विभाग के प्रवर्तन विभाग और साइबर लॉ फॉर्म्यूलेशन के संगठन संयोजक ने अपने हलफनामे में कहा है कि इस तरह की वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाना आसान नहीं है क्योंकि ये भारत के बाहर से संचालित होती हैं और चिकित्सा शिक्षा को लेकर बेहतर सामग्री उपलब्ध कराती हैं।
कई देशों में बैन हैं इस तरह के विज्ञापन
बेंच ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि हलफनामे में जो तर्क दिए गए हैं वो असहायता को दर्शाते हैं। केंद्र के इस विरोध पर सवाल उठाते हुए जॉर्ज के वकील ने कहा कि काफी सारे देशों में कुछ करारों के तहत ऐसे विज्ञापनों को अपने देश में दिखाए जाने पर पाबंदी लगा रखी है जो उस देश देश के कानून का उल्लंघन करते हैं।
वहीं वेबसाइटों का अपना तर्क यह है कि उन्होंने भारत के किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं किया है। उनका कहना है कि हमने केवल एक मंच उपलब्ध कराया है।
आंकड़ों के मुताबिक तकरीबन 5 लाख गर्भवती महिलाएं सालाना गर्भपात कराती हैं। वहीं यूनीसेफ के आंकड़ों के मुताबिक भारत सिर्फ गर्भपात के कारण साल 2007 से एक करोड़ लड़कियों की जिंदगी को खत्म कर चुका है। साल 1991 से भारत के 80 फीसदी जिलों में महिलाओं के मुकाबले पुरूषों का अनुपात तेजी से बढ़ते हुए देखा गया है।