फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   SC refuses to reduce age of juvenile from 18 to 16 years

कोर्ट का फरमान, नहीं बदलेगी बालिग होने की उम्र

Wed, 17 Jul 2013 07:47 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Wed, 17 Jul 2013 07:47 PM IST
विज्ञापन
SC refuses to reduce age of juvenile from 18 to 16 years

सुप्रीम कोर्ट ने किशोर माने-जाने की उम्र 18 साल से घटाकर 16 करने से इंकार कर दिया है।

विज्ञापन


सर्वोच्च अदालत ने गंभीर अपराधों में लिप्त नाबालिगों को किशोर न्याय अधिनियम (जेजे एक्ट) के तहत प्रदान किए गए संरक्षण से वंचित करने की मांगों को खारिज कर दिया है।

इस मसले पर बुधवार को अदालत ने जेजे एक्ट को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने का फैसला दिया।

चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने दिल्ली में बिटिया सामूहिक बलात्कार और हत्या की घटना के बाद दायर तमाम जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए फैसले में कहा कि जेजे एक्ट में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
विज्ञापन


पीठ ने कहा कि अदालत कानून के प्रावधानों को सही ठहराती है। इस कानून में अदालत की दखल की कोई जरूरत नहीं है।

याद रहे कि राजधानी में गतवर्ष 16 दिसंबर को चलती बस में एक छात्रा से बलात्कार और उसकी हत्या की वारदात में एक नाबालिग के घिनौने तौर पर लिप्त होने का तथ्य सामने आने के बाद जेजे एक्ट को शीर्षस्थ अदालत में चुनौती दी गई थी।
विज्ञापन
विज्ञापन


जेजे एक्ट के खिलाफ दायर याचिकाओं में कहा गया था कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में शामिल नाबालिग बच्चों को किशोर न्याय कानून के तहत संरक्षण नहीं मिलना चाहिए।

हालांकि इन याचिकाओं का दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष अमोद कंठ सहित कई लोगों ने विरोध किया था। पिछले साल दिसंबर में हुई बलात्कार की सनसनीखेज वारदात में छह लोग शामिल थे।

इनमें एक नाबालिग था जिसके खिलाफ किशोर न्याय बोर्ड में कार्यवाही चल रही थी। बोर्ड 25 जुलाई को उस पर अपना निर्णय घोषित करेगा।

इस वारदात की शिकार लड़की की सिंगापुर के अस्पताल में 29 दिसंबर को मौत हो गई थी।

सर्वोच्च अदालत ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) कानून 2000 में किशोर को परिभाषित करने वाले प्रावधान की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ताओं की दलीलों को नकार दिया है।

इस प्रावधान के मुताबिक 18 साल की आयु पूरी होने तक व्यक्ति नाबालिग माना जाएगा। एक याचिका में कहा गया था कि इस कानून की धाराएं 2 (के), 10 और 17 तर्कसंगत नहीं है और असंवैधानिक हैं।


अदालत से इस कानून में बदलाव के लिए हस्तक्षेप करने की मांग की गई थी। क्योंकि इसमें किशोर की शारीरिक या मानसिक परिपक्वता का जिक्र नहीं है।

जबकि दूसरी याचिका में आपराधिक मनोवैज्ञानिक की नियुक्ति का अनुरोध किया गया था। ताकि चिकित्सकीयय परीक्षण से यह तय हो सके कि कहीं आरोपी किशोर समाज के लिए खतरा तो नहीं बनेगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed