शिक्षा नीति में संस्कृत को अनिवार्य बनाने के पक्ष में संघ
माध्यमिक स्तर की शिक्षा में संस्कृत की पढ़ाई अनिवार्य हो। वह इसलिए कि इससे न केवल विदेशी भाषा (खास कर उर्दू) से पीछा छूटेगा, बल्कि वर्तनी और उच्चारण के दोष भी दूर होंगे। पंजाबी भाषी आतम प्रकाश की जगह आत्मप्रकाश बोल सकेंगे तो बिस्कुट का स्थान संस्कृत का सुपिष्टक ले सकेगा। यह विचार है संघ की इकाई विद्या भारती का। विद्याभारतीय ने नई राष्ट्रीय नीति से संदर्भ में जो सुझाव तैयार किए हैं, उसमें सह शिक्षा को खत्म करने, स्कूलों का समय 6 घंटे से बढ़ा कर 8 और 12 घंटे करने, डीएड, बीएड, एमएड जैसे पाठ्यक्रम की जगह भाषाई विश्वविद्यालय की स्थापना कर एक वर्ष का प्रमाण पत्र, दो वर्ष का पदविका, तीन वर्ष का स्नातक और चार वर्ष का स्तानकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने का सुझाव है।
स्कूलों का समय बढ़ाने की पीछे संघ का तर्क है कि जब कर्मचारी और श्रमिक से 8 घंटे काम करने की अपेक्षा है तो फिर छात्रों और अध्यापकों से क्यों नहीं? नई शिक्षा नीति के लिए सुझाव तैयार करने केलिए विद्या भारती की जुलाई के अंतिम सप्ताह में बैठक हुई थी। इसमें शिक्षाविद दीनानाथ बत्रा सहित दक्षिणपंथी विचारधारा के कई अन्य हस्तियां शामिल हुई थी। संघ प्राथमिक शिक्षा में तो नहीं मगर माध्यमिक शिक्षा में संस्कृत को अनिवार्य रूप से शामिल कराना चाहता है।
उसका मानना है कि इससे उच्चारण में शुद्घता केआएगी और उर्दू सहित अन्य विदेशी भाषाओं की जगह संस्कृत के शब्द स्थान ले सकेंगे। इस संदर्भ में उदाहरण देते हुए समझाया गया है कि संस्कृत के आने से किताब की जगह पुस्तक, मकान की जगह गृह, चाकू की जगह छूरी, तारीख की जगह दिनांक, शादी की जगह विवाह और बिस्कुट की जगह सुपिष्टक ले सकेगा। इसी क्रम में यह भी कहा गया है कि पंजाबी भाषी व्यक्ति भी आतमप्रकाश की जगह आत्मप्रकाश बोलना सीखेगा।
स्कूलों का समय बढ़े
बच्चों को बाल्यकाल में अधिक ज्ञान देने और माता पिता की अनुपस्थिति में अकेले रहने की जगह स्कूल में ही समय बिताने का तर्कदेते हुए संघ ने इसका समय 6 घंटे से बढ़ा कर 12 घंटे करने का सुझाव दिया है। संघ का मानना है कि इससे पढ़ने के अलावा छात्रों को योग, खेल, संगीत, नैतिक शिक्षा जैसे विषयों को पढ़ाने का मौका मिलेगा।
संघ का मानना है कि अधिक समय तक चलने वाले स्कूलों में सह शिक्षा संभव नहीं है। बतौर संघ वर्तमान के 6 घंटे के स्कूलों में ही समस्याएं पैदा हो रही हैं। हालांकि समस्या का विस्तार से उल्लेख नहीं किया गया है।
शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम केलिए प्रवेश परीक्षा अनिवार्य बनाने, न्यूनतम 50 फीसदी अंक हासिल करने वालों को ही प्रवेश देने और आरक्षित वर्ग को सामान्य वर्ग के मुकाबले 5 फीसदी कम अंक लाने की छूट का सुझाव दिया गया है।