RTI हीरो केजरी के मुंह पर लगा ताला!
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सुशासन और पारदर्शिता की कसमें खाकर चुनावों में शानदार जीत दर्ज करने वाली आम आदमी पार्टी इन दिनों दिल्ली की सत्ता पर काबिज है और पानी-बिजली जैसे मुद्दों के बाद अब भ्रष्टाचार के मोर्चे पर कदम उठा रही है।
अरविंद केजरीवाल नेता बनने से पहले सूचना के अधिकार (आरटीआई) के प्रचार-प्रसार के लिए काम करते थे और उन्हें आरटीआई का चैम्पियन भी माना जाता था। लेकिन अब शायद रोल बदल गए है।
दिल्ली की केजरीवाल सरकार से अब जब इसी कानून के तहत कुछ जानकारी मांगी जाती है, तो वह उसका जवाब देने में कोई खास दिलचस्प नहीं दिखाती। हां, यह जरूर है कि सवाल पूछने वाले को ही घुमा दिया जाता है।
22 विभागों में घुमाई अर्जी, पर जवाब नहीं दिया
एचटी की खबर के मुताबिक केजरीवाल सरकार के कुछ अहम फैसलों को लेकर अगर जानकारी मांगी जा रही है, तो ऐसे आग्रह पूरे नहीं किए जा रहे। नोएडा में रहने वाले देवाशीष भट्टाचार्य से ज्यादा इस बारे में कौन जानता होगा।
भट्टाचार्य ने पारदर्शिता की गारंटी देने वाले आरटीआई के कानून के तहत दो अर्जी दाखिल कराई थी। हैरानी की बात यह है कि ये सवाल अब तक 22 विभागों में घूम चुके हैं, लेकिन अब तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
यह बात और है कि जिन विभागों में यह आरटीआई एप्लिकेशन अब तक घूमी है, उनमें से कई का इससे कोई लेना-देना ही नहीं था। जवाब मांगने के लिए अर्जी करीब एक महीने पहले डाली गई थी, लेकिन जवाब अब तक नहीं आए।
पूछा था शपथ ग्रहण और मकान का खर्च
2 जनवरी को अपनी पहली अर्जी में भट्टाचार्य ने उन दो अहम फैसलों से जुड़ी फाइल नोटिंग्स मांगी थीं, जो अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभालने के तुरंत बाद किए।
दिल्ली की कुर्सी संभालने के बाद आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने ऐलान किया था कि दिल्ली में हर परिवार को सालाना 20 हजार लीटर मुफ्त दिया जाएगा और साथ ही सब्सिडी के जरिए बिजली के बिल भी आधे करने की बात कही गई।
दूसरी आरटीआई अर्जी 4 जनवरी की है, जिसमें पूछा गया है कि रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण समारोह और मुख्यमंत्री को आवंटित भगवान दास रोड स्थित आवास पर कितना पैसा खर्च हुआ। हालांकि, डुप्ले केजरीवाल ने बाद में लौटा दिए थे।
उन विभागों को भेजी अर्जी, जिनसे कोई लेना-देना नहीं
इन अर्जियों पर दिल्ली सरकार के ज्यादातर विभागों का कहना है कि जो जानकारी मांगी गई है, उसे देना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। भट्टाचार्य ने कहा, "जो जानकारी मैंने मांगी, उसे देना काफी आसान है और चीफ सेक्रेटरी ऑफिस के पास जवाब होने चाहिए थे।"
उन्होंने कहा, "लेकिन मुझे जानकारी देने के बजाय मेरी अर्जियों को उन विभागों के पास भेजा जाता रहा, जिनसे इन सवालों का कोई लेना-देना नहीं था।" जाहिर है, उन्हें इस पर हैरत हो रही है।
पहली अर्जी अग्निशमन विभाग, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन और दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड को भेजी गई। इसके बाद दूसरी अर्जी भी इन विभागों के पास रवाना कर दी गई।
खुद आरटीआई एक्टिविस्ट रहे केजरीवाल
पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त शैलेष गांधी का कहना है कि सरकार आम तौर पर इसी तरह जानकारी मांगने वाले लोगों को प्रताड़ित करती हैं। उन्होंने कहा, "यह बकवास है कि चीफ सेक्रेटरी का ऑफिस कैबिनेट के फैसलों से जुड़ी फाइल नोटिंग्स के बारे में नहीं जानता।"
यहां तक कि अरविंद केजरीवाल के दफ्तर के एक अधिकारी का भी यह कहना था, "आरटीआई के जरिए यह पूछा गया बेहद सरल सवाल था, जिसका जवाब दिया जाना चाहिए था।"
केजरीवाल ने दिल्ली के एनजीओर 'परिवर्तन' के साथ अपना सिविल सोसाइटी करियर शुरू किया था। यह एनजीओ आरटीआई का इस्तेमाल कर पारदर्शिता तय करने का प्रचार करता था। 2006 में केजरीवाल को आरटीआई पर जागरुकता फैलाने के लिए मैगसेसे अवॉर्ड से नवाजा गया था।