छह महीने में बदल सकता है संघ का निकर, पतलून
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समय के साथ खुद को बदलने की तैयारी में जुटा हुआ है। केंद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत) आरएसएस से जुड़ा हुआ है और इसीलिए संघ की गतिविधियों पर सबकी नजर रहती है।
संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय के सूत्रों की मानें तो संघ जल्दी ही अपना चोला बदलेगा। इस बारे में अंतिम फैसला राजस्थान के नागौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सर्वोच्च समिति ‘प्रतिनिधि सभा’ की 11 से 13 मार्च तक चलने वाली बैठक में हो सकता है। संघ की ड्रेस में बदलाव का फैसला अहम है क्योंकि संभवत: संघ अपनी अब तक की पहचान रही खाकी निकर को अलविदा कह सकता है।
पिछले एक साल से चल रही ये तैयारी
इस बदलाव के लिए संघ की राष्ट्रीय कार्य़कारिणी ने वरिष्ठ विचारकों की एक समिति बनाई है जो इस बाबत ड्रेस डिज़ाइनरों के संपर्क में हैं। पिछले एक साल से चल रही ये तैयारी अब अपने अंतिम दौर में है।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक संघ के ड्रेस में एक बड़ा बदलाव तो यही होगा कि निकर, पतलून में बदल जाएगी। इसके लिए फ़िलहाल तीन रंगों के विकल्प पर विचार किया जा रहा है- रेमंड ब्लू, ब्राउन या फिर ग्रे। इससे साफ है कि खाकी रंग को नहीं रखने पर एक तरह से सहमति बन चुकी है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने बीबीसी हिंदी से इसकी पुष्टि करते हुए कहा, “ग्रे, ब्राउन और ब्लू जैसे कुछ शेड्स पर चर्चा चल रही है। यदि इस पर अंतिम फैसला हुआ तो करीब 6 महीनों के बाद, मान कर चलिए की विजायदशमी या फिर अगले शिक्षा वर्ग से यह लागू हो सकता है।”
स्वयंसेवक संघ की तरह दिखने वाला ड्रेस कोड
वैसे तो ब्लैक ट्राउजर विकल्प में शामिल नहीं है लेकिन ये चर्चा भी होती रही है कि संघ काले रंग को चुनकर दुनिया के अन्य देशों में स्थित अपने अंतरराष्ट्रीय संगठन हिंदू स्वयंसेवक संघ की तरह दिखने वाला ड्रेस कोड अपना सकता है।
लेकिन मनमोहन वैद्य इस चर्चा को बेबुनियाद बताते हुए कहते हैं, “हर देश का संघ अलग है, स्वतंत्र है और भारतीय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भाग नहीं है। इसलिए उन सबमें एकरूपता जरूरी नहीं है। एक जैसा करने की जरूरत नहीं है।”
वैसे इस बार ड्रेस कोड को डिज़ाइन करते वक्त ये ख्याल रखा जा रहा है कि वह आधुनिक भी हो और ट्रेंड के मुताबिक हो। इसके साथ साथ व्यायाम, मार्शल आर्ट्स या फिर ड्रिल करने के दौरान भी आरामदेह रहे, इसका ध्यान रखा जा रहा है। इसके लिए ड्रेस डिज़ाइनरों की सेवा ली जा रही है। इसमें संघ से जुड़े लोगों और गारमेंट इंडस्ट्री के दिग्गजों से भी सलाह चर्चा की जा रही है।
ठंड और युवाओं को आकर्षित करना है वजह
संघ निकर के बदले ट्राउजर को क्यों तरजीह दे रहा है, इस बारे में तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, जिसमें एक तो उत्तर भारत की ठंड को जिम्मेदार माना जा रहा है। इसके अलावा युवाओं को आकर्षित करने की जरूरत भी एक वजह मानी जा रही है।
लेकिन मनमोहन वैद्य इन सबको खारिज करते हुए कहते हैं, “कहीं का मौसम ड्रेस बदलने का एकमात्र कारण नहीं हो सकता। हमें लगता है कि गणवेश में उचित बदलाव करें तो सबको साथ लेने में आसानी होगी।”
मनमोहन वैद्या इस बात का दावा भी करते हैं कि संघ में आने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। उन्होंने हाल ही में पुणे में हुए सम्मेलन का हवाला देते हुए बताया कि उसमें शामिल 80 फ़ीसदी स्वयंसेवक 40 साल के कम उम्र के थे।
वैद्य ने ये भी बताया कि ये ड्रेस स्वयंसेवकों को न्यूनतम मूल्य पर मुहैया कराई जाएगी।ये संघ के इतिहास में बड़ा बदलाव होगा। इससे पहले 2010 में संघ ने चमड़े की बेल्ट की जगह कैनवस की बेल्ट को अपनाया था।
तब कहा भले गया था कि सब जगह चमड़े की उपलब्धता नहीं होने के चलते ऐसा किया गया है, लेकिन उस बदलाव के पीछे जैन मुनि तरुण सागर की सलाह का अहम योगदान था।
उन्होंने संघ नेतृत्व के सामने चमड़े का इस्तेमाल और अहिंसा के संदेश के बीच विरोधाभास बताया था। उससे पहले भी गम बूट्स की जगह आम चमड़े या फिर रेक्सीन जूते पहले से ही अपनाए जा चुके हैं।
मनमोहन वैद्य बताते हैं, “गणवेश में पहली बार बदलाव नहीं हो रहा है। सबसे पहला बदलाव 1939 में हुआ था, तब शर्ट का रंग बदला था। खाकी शर्ट तब सफ़ेद हुई थी।
इसके बाद 1973 में पदवेश बदले गए। पहले मिलिट्री शूज़ थे, फिर सामान्य शूज़ आए। 2010 में बेल्ट बदली। उसी समय भी निकर के बदले ट्राउजर्स लाने की चर्चा थी, पर सहमति नहीं बनी।”
90 साल के इतिहास में जो एक चीज नहीं बदली
संघ के बीते 90 साल के इतिहास में जो एक चीज नहीं बदली है वो है काली टोपी। वैसे सूत्रों के मुताबिक संघ केवल अपनी ड्रेस नहीं बदल रहा है, बल्कि बदली हुई परिस्थितियों में संगठन को नए परिवेश में ढालने की बड़ी नीति का हिस्सा है।
दरअसल, संघ 2004 के बाद से ही नई पीढ़ी के नेताओं को कमान सौंपने के साथ बदलाव की राह पर है। माना जाता है कि सरसंघ चालक डॉ। मोहन भागवत और सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी बदलाव के समर्थक हैं।
ऐसे में संघ अपना चोला बदलने के साथ बदलाव की नई बयार की तरफ बढ़ रहा है। क्या ये प्रासंगिक और आधुनिक होने की कोशिश है?डॉक्टर वैद्य साफ कहते हैं, “संघ को आधुनिक दिखाने की आवश्यकता नहीं है, वह पहले से ही आधुनिक है।”
वैद्य बताते हैं, “हिंदू समाज में किसी तरह के गणवेश की परंपरा नहीं थी, लेकिन डॉ। हेडगेवार ने एकता और समानता के लिए इसे लागू किया। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे आधुनिक थे, इसलिए उन्होंने धोती, कुर्ता, टोपी को गणवेश नहीं बनाया। बैंड पर मार्च की परंपरा भी नहीं थी, लेकिन अनुशासन के लिए संघ के परेड में विदेशी वाद्यों को भी शामिल किया गया।”
संघ मुख्यालय के सूत्रों के मुताबिक संघ अपनी प्रचार शैली में आधुनिकता का बड़ा इस्तेमाल करने जा रहा है। इसके लिए बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया एक्टिविस्ट तैयार किए जा रहे हैं।
चाहे वह गौ मांस का मुद्दा हो या फिर रामजन्म भूमि का, असहिष्णुता का या फिर भारतीयता, कोशिश ये की जा रही है कि स्वयंसेवक हर मोर्चे पर लेख लिखकर, कमेंट्स कर, पोस्ट करके अपनी राय रख सके।
इस मसले पर मनमोहन वैद्य ने माना कि संघ के प्रचार विभाग ने सोशल मीडिया में सक्रिय स्वयंसेवकों की टीम बनाई है, जिनकी अखिल भारतीय स्तर पर बैठकें होती हैं। कोशिश हो रही है जिलास्तर पर सक्षम टीम तैयार की जा सके।
संघ का प्रशिक्षण
इन सबके प्रशिक्षण के बारे में वैद्य कहते हैं, “अच्छा टीम वर्क, सही जानकारी और तथ्यों पर आधारित पोस्ट के बारे में बताया जाता है। इसके अलावा भद्र भाषा में स्पष्टता से अपनी बात रखने का प्रशिक्षण भी हम लोगों को दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर अशालीन नहीं होना है, ये भी बताते हैं।”
भारत से बाहर विदेशों में कई जगहों पर ई-शाखाएं भी खुली हैं। वैद्य कहते हैं, “बार बार एकत्र नहीं हो पाने की सूरत में ऐसा प्रयोग विदेश में हुआ है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। सामूहिक गुणों की उपासना कर संगठन निर्माण पर हम अधिक बल देते हैं। एकत्र आने में अलग आनंद आता है।”
इसके अलावा डिजिटल दुनिया में संघ अपने मुख्य कार्यक्रमों को टेलीकास्टिंग और वेबकास्टिंग के जरिए भी प्रचारित कर रहा है। टीवी चैनलों पर विजयादशमी उत्सव के दौरान सरसंघ चालक के संबोधन के लाइव प्रसारण पर वैद्य कहते हैं, “संघ के प्रति उत्सुकतावश लोगों ने स्वयं ये करना शुरू किया।
चैनल्स स्वंय ऐसा कर रहे हैं। संघ ने कभी कोई अनुरोध नहीं किया। वे आते हैं, हम उन्हें केवल अनुमति और कुछ तकनीकी सहायता उपलब्ध कराते हैं।”