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आदिवासियों की 'घर वापसी' में जुटा संघ

Thu, 16 Oct 2014 09:16 PM IST
Updated Thu, 16 Oct 2014 09:16 PM IST
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चौदहवीं शताब्दी में बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव जब पुरी की तीर्थयात्रा से लौटे तो उनके साथ गए आदिवासी पवित्र घोषित कर दिए गए और उन्हें हिंदू समाज में शामिल कर लिया गया।

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पिछले शनिवार को जब बस्तर के भाजपा सांसद दिनेश कश्यप कुनगुडा गांव में 33 आदिवासी परिवारों के पैर धोकर उनकी ‘घर वापसी’ कर रहे थे, तो पुरुषोत्तम देव की याद अनायास आ गई।
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छत्तीसगढ में आदिवासियों के कथित जबरन धर्म परिवर्तन और 'घर वापसी' को लेकर सडक से लेकर संसद तक बहस लगातार जारी है। इस बहस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इससे जुडे अन्य हिंदू संगठन कहां हैं?
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विस्तार से पढें आलोक पुतुल का विश्लेषण

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दो शक्तियाँ आमने-सामने हैं जिनके बीच लंबे समय से आदिवासी खडे हैं, एक ओर चर्च के पादरी उन्हें प्रभु यीशु की शरण में आने के लिए कह रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव की पंचायत, आमसभा करके इलाके में हिंदू धर्म के अलावा किसी भी अन्य धर्म के प्रचार को प्रतिबंधित करने का फैसला सुना रही है।

कोंडागांव में ढलती हुई सांझ में बुजुर्ग मंसाराम सोरी याद करते हैं साठ का दशक, जब बस्तर के अंतिम राजा प्रवीर चंद भंजदेव की हत्या हुई थी।

प्रवीर की लोकप्रियता ऐसी थी कि आदिवासी घरों में उन्हें देवता की तरह पूजा जाता था।

मंसाराम कहते हैं- “राजा की हत्या के चार-पांच साल बाद बाबा बिहारीदास आया। कहता था कि वह प्रवीर का अवतार है। हमारे जैसे लोगों ने मान लिया।”

इसके बाद जो कुछ हुआ, वह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। बाबा बिहारीदास ऊर्फ कंठीवाले बाबा ने आदिवासियों को तुलसी की कंठीमाला पहनानी शुरू कर दी। मांसाहार और शराब से आदिवासियों को दूर रहने की सलाह दी। गांव के गांव बाबा बिहारीदास के अनुयायी बनने लगे।

आज के भारत जन आंदोलन के नेता ब्रह्मदेव शर्मा तब बस्तर के कलेक्टर थे।

बाबा बिहारीदास के इस ‘सांस्कृतिक हस्तक्षेप’ से नाराज ब्रह्मदेव शर्मा ने बिहारीदास को जिला बदर कर दिया लेकिन बिहारीदास ऊंची राजनीतिक पहुंच के बल पर बस्तर लौटे और ब्रह्मदेव शर्मा का बस्तर से तबादला हो गया।

बस्तर में बाबा बिहारीदास की तूती बोलने लगी। सात-सात रुपए में आदिवासियों को जनेऊ देकर उन्हें हिंदू यहां तक कि ब्राह्मण बनाने की शुरुआत भी हुई।

1972 के चुनाव में बिहारीदास ने बस्तर की सात सीटों पर कांग्रेस का प्रचार किया और सभी सीटें कांग्रेस को मिलीं। ये और बात है कि 1981 में एक आदिवासी युवती से बलात्कार के आरोप में बिहारीदास उलझे और फिर उनका आधार कमजोर पडता चला गया।

संघ का जिम्मा

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बिहारीदास के बाद आदिवासियों के उत्थान और उन्हें हिंदू समाज में शामिल करने का जिम्मा संघ परिवार ने संभाला।

गायत्री परिवार, सदाफल आश्रम और ऐसे ही कई संगठन इलाके में सक्रिय हो गए। आज की तारीख में आरएसएस और उससे जुडे हुए कम से कम 27 संगठन बस्तर में सक्रिय हैं।

पिछले 50 साल से आदिवासी समाज और संस्कृति का अध्ययन कर रहे निरंजन महावर कहते हैं, “प्रत्येक आदिवासी समाज का अपना धर्म है और वे जीववादी हैं लेकिन उनका हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। बस्तर में संघ और उससे जुडे संगठनों ने उन्हें हिंदू बनाने की लगातार कोशिश की और वे उसमें एक तरह से सफल भी हुए।”

संघ की पाठशाला

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लेकिन छत्तीसगढ में आरएसएस के कई किस्म के प्रकल्पों में से एक निर्माण प्रकल्प चलाने वाले ब्रजेंद्र शुक्ला का मानना है कि आरएसएस ने मूल रुप से आदिवासियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के लिये काम किया है। इनमें धर्म कहीं मुद्दा ही नहीं है।

ब्रजेंद्र निर्माण प्रकल्प में लगभग 400 बच्चों की प्रतियोगी परीक्षा की पाठशाला चला रहे हैं। लेकिन क्या यह आदिवासियों के लिये संघ की पाठशाला तो नहीं है?

रजेंद्र कहते हैं, “आदिवासी हिंदू हैं और हमें ऐसा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। यह तो दूसरे धर्म के लोग हैं, जो उन्हें भडका रहे हैं। ऐसे में बस्तर जैसे इलाकों में हमारे लिए जरूरी है कि हम उन्हें अपने घर में वापस लाएँ।”

इस ‘घर लाने’ की पूरी प्रक्रिया का असर कोंटा से लेकर केशकाल तक देखा जा सकता है। आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, गायत्री परिवार जैसे हिंदू संगठनों के स्कूलों में पढने वाले बच्चे सुबह से लेकर शाम तक आधा दर्जन बार हिंदू देवी-देवताओं की प्रार्थना करते हैं। उनके नाम अब संस्कृतनिष्ठ होने लगे हैं। गणेश पूजा से लेकर रक्षाबंधन तक का त्यौहार अब गांव-गांव में धूम-धाम से मनाया जाता है।

दंतेवाडा के पत्रकार हेमंत कश्यप कहते हैं, “इलाके के आदिवासियों में किसी भी कट्टर हिंदू से भी कहीं अधिक धूम हिंदू त्यौहारों की बनी रहती है। त्यौहार मनाने और दिखाने का चलन बढा है। हिंदू त्यौहारों पर फोटो खिंचवाने के लिये दंतेवाडा शहर आने वाले आदिवासियों की संख्या हर साल बढती जा रही है।”

लेकिन सिरिसगुडा ग्राम पंचायत की सरपंच जमुना बघेल इससे सहमत नहीं हैं।

हालाँकि जमुना के बजाय सवालों के जवाब उनके पति दलपत बघेल देते हैं, “विश्व हिंदू परिषद या आरएसएस वाले न हों तो ईसाई लोग सारे आदिवासियों को ईसाई बना देंगे। वे लोग तेजी से भोले-भाले आदिवासियों को लोभ-लालच दे कर फंसा रहे हैं और उन्हें ईसाई बना रहे हैं।”

प्रतिबंध

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इससे बचने के लिए सिरिसगुडा पंचायत ने फैसला किया कि गांव में हिंदू धर्म के अलावा दूसरे धर्मों का प्रचार, प्रार्थना सभा एवं धर्म उपदेश देना प्रतिबंधित रहेगा। इस फैसले पर अब छत्तीसगढ हाई कोर्ट में बहस हो रही है।

ईसाई धर्म प्रचार करने वाले इवेंजेलिकल फैलोशिप ऑफ इंडिया के मध्यभारत के सचिव अखिलेश एडगर कहते हैं, “हमारी जानकारी के अनुसार बस्तर में 52 ग्राम पंचायतों ने इस तरह का फैसला लिया। ईसाई धर्म को मानने वाले आदिवासियों को सस्ता राशन देना बंद किया गया और उनके साथ मारपीट की गई। इन सब बातों की रिपोर्ट भी थाने में दर्ज है।”

जरूरत क्यों

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लेकिन जब ईसाई धर्मावलंबी बस्तर में शिक्षा और स्वास्थ्य का काम कर रहे हैं तो भला आदिवासियों को ईसाई धर्म में शामिल करने की जरूरत क्यों पडी ?

सिरिसगुडा ग्राम पंचायत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने वाले छत्तीसगढ क्रिश्चियन फोरम के महासचिव अरुण पन्ना लाल भोलेपन से कहते हैं, “अगर वो ईसाई धर्म में आते हैं तो भी हम आदिवासियों को उनके अपने धर्म से कभी भी अलग होने के लिये नहीं कहते। हम आरएसएस की तरह नहीं हैं, जो आदिवासियों का धर्म बदल रहे हैं।”

हालाँकि आरएसएस के एक वरिष्ठ अधिकारी आदिवासियों के धर्म बदलने को सिरे से नकारते हैं। उनका दावा है कि वे तो उन्हें केवल अपने घर वापस ला रहे हैं। उनका घर यानी हिंदू धर्म।

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