बदलेगी संघ की पहचान, खाकी निक्कर की होगी छुट्टी
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संघ के स्वयं सेवकों को जल्द ही खाकी निक्कर (हाफ पैंट) से निजात मिल सकती है। इसके बदले स्वयंसेवकों की वेशभूषा में नीले या स्लेटी (ग्रे) रंग के फुल पैंट या ट्राउजर को शामिल किया जा सकता है। हालांकि,लंबे समय से स्वयंसेवकों की पहचान बने निक्कर को बदलने का फैसला थोड़ा कठिन जरूर रहेगा।
मगर सूत्र बताते हैं कि खाकी निक्कर के बदले नीले और स्लेटी रंग के पैंट को अपनाने पर संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच मंथन चल रहा है। 11 मार्च से राजस्थान के नागौर में आयोजित होने वाली संघ के अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में खाकी निक्कर के बदले फुल पैंट लागू करने पर अंतिम निर्णय हो सकता है।
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि नागौर की बैठक में खाकी निक्कर के बदले पैंट या ट्राउजर अपनाने के मामले पर चर्चा होगी। इसके बाद ही इस पर कोई अंतिम निर्णय होगा।
91 वर्षों से संघ स्वयं सेवकों की पहचान है खाकी निक्कर
खाकी निक्कर बीते 91 वर्षों से संघ स्वयं सेवकों की पहचान बना हुआ है। मगर इसके और लंबे बने रहने के आसार बेहद कम हैं। नए जमाने के युवाओं को साथ जोड़ने की कवायद में संघ नेतृत्व इसे अहम कदम मान रहा है।
संघ की ड्रेस में पहले भी कई अहम बदलाव हुए हैं। मगर खाकी निक्कर वर्ष 1925 में स्थापना के समय से ही स्वयंसेवकों के ड्रेस की पहचान बना हुआ है। स्थापना के समय स्वयंसेवकों की ड्रेस राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) के छात्रों की तरह रही।
स्थापना के वक्त स्वयंसेवकों को अलग एवं अनुशासन प्रिय पहचान देने के लिए सेना या पुलिस बल की तरह खाकी कमीज, खाकी निक्कर, चमडे़ की भूरी बेल्ट, काली टोपी, और सेना के जवानों जैसे चमडे़ के काले बूट (जूते) दिए जाते थे जिस पर ब्रिटिश स्ट्रिप और पट्टी लगी रहती थी। यही नहीं शुरुआत में अधिकारियों के कंधों पर दायित्व का बैच भी लगाया जाता था। मगर समय-समय पर इसमें संघ की ओर से बदलाव होते रहे।