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संघ का मजदूर संगठन तय करेगा मोदी के नंबर

Mon, 11 May 2015 05:56 PM IST
Updated Mon, 11 May 2015 05:56 PM IST
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RSS's trade unions will decide Modi's number.

नरेंद्र मोदी सरकार का एक साल पूरे होने का जश्न मजदूर संगठनों की तैयारी फीका कर सकती है। संघ की मजदूर इकाई बीएमएस मजदूरों की अनदेखी और इससे उपजे असंतोष को आधार बनाकर सरकार के खिलाफ रिपोर्ट कार्ड तैयार कर रही है। इसे 26 मई को मजदूर संगठनों के राष्ट्रीय अधिवेशन में जारी किया जाएगा।

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खास बात यह है कि इसी दिन सरकार के मंत्री सत्ता में एक साल पूरा होने का जश्न मनाते नजर आएंगे। संघ ने सरकार को उसके एक साल के कामकाज के बदले में मजदूरों का विरोध झेलने का संकेत भी दे दिया है।
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संभव है कि सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों का हवाला देते हुए 26 मई को ही देशव्यापी हड़ताल पर जाने की घोषणा की जाए। श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा के साथ हुई बातचीत में भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) ने उन्हें इसके प्रति आगाह कर दिया है।
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26 मई को मजदूर संगठन का राष्ट्रीय अधिवेशन

RSS's trade unions will decide Modi's number.

बीएमएस के महामंत्री बृजेश उपाध्याय का कहना है कि सरकार के मजदूर विरोधी इरादों और उनकी अनदेखी को लेकर केंद्र की आलोचना होना तय है। सरकार ने एक साल में मजदूरों के हक में एक भी निर्णय नहीं लिया।

उन्होंने कहा कि बेशक चुनाव के दौरान कई लोक लुभावन वादे किए गए लेकिन अब सरकार इन्हें पूरा करने से कन्नी काटती दिख रही है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में मजदूर संगठनों की ओर से एक दस सूत्रीय मांग पत्र सरकार को सौंपा गया था।

इसमें महंगाई नियंत्रण, ठेका मजदूरी के नियमों में सुधार, श्रम सुधारों में मजदूरों के हितों का ध्यान, ट्रेड यूनियनों का पंजीकरण, बोनस और ग्रेच्युटी का दायरा बढ़ाने जैसे मुद्दों को शामिल किया गया था। जिस पर मंत्रियों के समूह (जीओएम) का गठन कर दिया गया था। लेकिन इससे आगे बात नहीं बढ़ी। एक साल पहले जब नई सरकार बनी तो मजदूरों की उम्मीदें बढ़ी। लेकिन मोदी सरकार ने जीओएम भंग करने के बाद इस मामले में ध्यान देने के लिए समूह का गठन तक नहीं किया।

मजदूरों की अनदेखी को बनाएगा आधार

RSS's trade unions will decide Modi's number.

वहीं वरिष्ठ वामपंथी नेता और अखिल भारतीय मजदूर संगठन के महासचिव गुरूदास दासगुप्ता का कहना है कि श्रम सुधार की दिशा में उठाए गए कदम मजदूरों के घाव पर चोट करने जैसा है। इसलिए श्रम कानून में सुधार और भूमि अधिग्रहण बिल जैसे मुद्दे पर मजदूर देशव्यापी विरोध करेंगे।

इस दिशा में उठाये जा रहे कदमों से श्रमिकों को कोई लाभ मिलने की गुंजाइश नहीं है। वहीं कांट्रेक्ट लेबर लॉ में जहां सरकार को नियमों पर निगरानी रखनी चाहिए, सरकार खुद नियम तोड़ रही है।

इससे संगठित क्षेत्र के तीन चौथाई कामगारों की सामाजिक सुरक्षा हाशिए पर हैं। जिनपर सरकार की नजर नहीं है। गौरतलब है कि देश में पंजीकृत ट्रेड यूनियनों के सदस्यों की संख्या करीब 15 करोड़ है।

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