फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   rss-global-similarities

क्या आरएसएस फ़ासिस्ट संगठन है?

Tue, 14 Oct 2014 07:32 PM IST
Updated Tue, 14 Oct 2014 07:32 PM IST
विज्ञापन
rss-global-similarities

भारतीय जनता पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के 90 साल पूरे हो रहे हैं। दुनिया के दूसरे हिस्सों में ऐसा कोई संगठन देखने को नहीं मिलता जो बुनियादी ढांचे और कार्यशैली में आरएसएस यानी संघ जैसा हो।

विज्ञापन


सांस्कृतिक संगठन के बतौर शुरू हुए संघ का दर्शन हिंदू राष्ट्रवाद है। संघ के मुताबिक़ हिंदू कोई जातिसूचक शब्द नहीं बल्कि भारत में रहने वालों को हिंदू कहा जाना चाहिए। संघ के दूसरे प्रमुख गोलवलकर का मानना था कि भारत को मज़बूत राष्ट्र में बदलने के लिए हिंदू एकीकरण और पुनरुत्थान की ज़रूरत है ताकि वो दुनिया के कल्याण में अपना योगदान दे सकें। ग़ैर हिंदुओं को गोलवलकर समान नागरिक अधिकार देने के ख़िलाफ़ थे।
विज्ञापन


हालांकि बाद में संघ के राजनीतिक धड़े भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने इससे दूरी बना ली थी। संघ का यक़ीन राजनीति या सत्ता हासिल करने में भी नहीं था। बाद में सत्ता को लेकर विचार भी बदल गए।

विज्ञापन
विज्ञापन

राष्ट्रवाद का आधार

rss-global-similarities

मगर धर्म संघ के मन में विराजता रहा और वही उनके राष्ट्रवाद का आधार रहा है। धार्मिक आधार पर उग्र राष्ट्रवादी कई संगठन दुनिया के दूसरे हिस्सों में हैं। कुछ राजनीतिक सत्ता के ज़रिए अपना मक़सद पाना चाहते हैं तो कई चरमपंथ के रास्ते से।

इस्लाम को आधार बताने वाली कई राजनीतिक पार्टियां इस्लामी राष्ट्र की वकालत करती हैं, तो यूरोप में हिटलर की नस्लीय शुद्धतावादी विचारधारा से प्रेरित कई पार्टियां नव नाज़ीवाद समर्थक हैं।

कई प्रवासियों को देश में घुसने देने, ग़ैर नस्ली या ग़ैर धर्म के लिए सख़्त रवैया अपनाने की हिमायत करती हैं। यहां तक कि अमरीका में भी कुछ पार्टियां ईसाइयत की स्थापना की कोशिश करती रही हैं।

संघ और फ़ासीवाद-नाज़ीवाद के बीच पुराने रिश्ते

rss-global-similarities

दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर शम्सुल इस्लाम के मुताबिक़ ''संघ और फ़ासीवाद-नाज़ीवाद के बीच पुराने रिश्ते रहे हैं।'' वह इतालवी शोधकर्ता मार्ज़िया कासोलारी का हवाला देते हैं, जिन्होंने संघ नेताओं की मुसोलिनी से मुलाक़ात का ज़िक्र किया था।

हालांकि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर ज्योतिर्मय शर्मा आरएसएस पर किसी तरह की लेबलिंग या उसे किसी श्रेणी में रखने को 'बौद्धिक आलस्य' की संज्ञा देते हैं।

उनके मुताबिक़ ''हमारे सेक्युलरिस्ट या बुद्धिजीवियों ने आरएसएस को गाली के तौर पर फ़ासिस्ट कहा है न कि गंभीर वैचारिक या बौद्धिक मापदंड पर। यह तो महज़ वैचारिक आलस्य है। दुनियाभर में ऐसे कई संगठन हैं, जो धर्म और राजनीति का मिश्रण करके उग्रराष्ट्रवाद की परिकल्पना करते हैं। पूर्वी यूरोप के कुछ देशों में मिसाल के लिए हंगरी में ऐसी ही एक मुहिम चल रही है। वो एंटी सेमेटिज़्म में यक़ीन रखते हैं। इस तुलना को अंग्रेज़ी में मॉर्फ़ोलॉजी कहते हैं।''

संघ के दर्शन की ख़ासियत उग्र राष्ट्रवाद

rss-global-similarities

ज्योतिर्मय शर्मा के मुताबिक़ संघ के दर्शन की ख़ासियत उग्र राष्ट्रवाद ही है। वह इसकी तुलना मैज़िनी की सोच से करते हैं।

''धर्म और राजनीति के मेल की यह सोच मैज़िनी में भी थी। जब इटली का एकीकरण हुआ तो उन्होंने कहा कि बिना धर्म के राष्ट्रवाद और राजनीति विफल हो जाएगी। आरएसएस में कोई एक भी ऐसा विचार नहीं है, जो हमारी ज़मीन से उपजा हो। वो हर संदर्भ और मायने में पाश्चात्य है।''

अगर संघ का कलेवर भारतीय नहीं है तो क्या है? क्या उसे कुछ धर्मनिरपेक्षवादियों की भाषा में दक्षिणपंथी कहना सही होगा?

संघ की तुलना किसी और संगठन से मुश्किल

rss-global-similarities

'द ब्रदरहुड इन सैफ़्रन' के लेखक और संघ पर लंबे समय से शोध कर रहे वॉल्टर एंडरसन ने पिछले दिनों बीबीसी से बातचीत में कहा था, ''दुनिया में संघ की तुलना किसी और संगठन से करना मुश्किल है। हालांकि जापान का बौद्ध संगठन "साका गाकाई" काफ़ी हद तक आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी का मिला-जुला स्वरूप है।''

एंडरसन 2003 तक अमरीकी विदेश विभाग से जुड़े रहे हैं। फ़िलहाल वह वाशिंगटन की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया प्रोग्राम के निदेशक हैं।

एंडरसन के मुताबिक़ ''दुनिया में शायद ही कोई संस्था हो, जिसका संगठन इतना सशक्त हो। ये शिक्षा से जुड़े हैं, आदिवासियों के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं, महिलाओं के बीच काम कर रहे हैं और भारत का सबसे बड़ा मज़दूर संगठन और छात्र संगठन भी इन्हीं का है।''

लेफ़्ट ऑफ़ सेंटर...

rss-global-similarities

मगर ज्योतिर्मय शर्मा कहते हैं समानताएं ढूंढना आसान है और वो मिल भी जाती हैं। उनके मुताबिक़ आरएसएस के लिए ''हमें नई श्रेणी या लेबल ढूंढने के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।''

''राजनीतिक दृष्टि से आरएसएस लेफ़्ट ऑफ़ सेंटर हैं। भारत में विदेशी निवेश न होने देने और स्वदेशी जैसे मुद्दे देखें तो वह सीपीएम के साथ हैं। इसलिए जो लेबल हैं, मसलन लेफ़्ट ऑफ़ सेंटर, राइट ऑफ़ सेंटर, फ़ार राइट, रिलीजियस राइट, वह काम नहीं करेंगे..वो पॉलिटिकल राइट तो हैं, लेकिन इकोनॉमिकली राइट नहीं हैं। प्रकाश करात और मोहन भागवत आर्थिक नीति पर एक दूसरे से सौ फ़ीसदी सहमत होंगे। मैं उग्र राष्ट्रवाद के आगे नहीं जाऊंगा।''

आरएसएस को बाकियों से अलग मानता

rss-global-similarities

ज़्यादातर लोगों की राय में संघ को किसी अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय संगठन के बराबर रखकर नहीं देख सकते।

मिसाल के लिए राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर के मुताबिक़, ''उनमें उग्रता और आक्रामकता देखने को मिलेगी। मैं आरएसएस को उनसे अलग मानता हूं।। संघ हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीतिक विचारधारा को लेकर चल रहा है। उनका सोचना है कि लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में आएं और यह एजेंडा आगे बढ़ाएं। मुझे नहीं लगता कि दुनिया के दूसरे संगठन चुनाव लड़कर सत्ता में आने के बाद ऐसा करते हों।''

मिसाल के लिए राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर के मुताबिक़, ''उनमें उग्रता और आक्रामकता देखने को मिलेगी। मैं आरएसएस को उनसे अलग मानता हूं।। संघ हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीतिक विचारधारा को लेकर चल रहा है। उनका सोचना है कि लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में आएं और यह एजेंडा आगे बढ़ाएं। मुझे नहीं लगता कि दुनिया के दूसरे संगठन चुनाव लड़कर सत्ता में आने के बाद ऐसा करते हों।''

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed