संघ के पैसे से विस्तार कर रही है औवैसी की पार्टी?
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क्या आरएसएस हैदराबाद की पार्टी एमआईएम को पैसे दे रहा है? राजनीतिक हलकों में इन दिनों ये सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है। मजलिस-ए-इत्तहादुल-मुसलमीन यानी एमआईएम दिल्ली और उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में पहली बार एमआईएम दो सीटें जीतने में कामयाब रही, जिसके बाद से उसके मंसूबे सातवें आसमान पर है। एमआईएम सुप्रीमो असदुद्दीन औवैसी ने हैदाराबाद के दायरे से बाहर आकर राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिमों की रहनुमाई का ख्वाब देख रहे हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि एमआईएम के विस्तार से उन पार्टियों में खलबली मची हुई है, जो अब तक मुस्लिमपरस्त होने का दम भरती रही हैं। राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव ने आरोप लगाया है कि आरएसएस आवैसी की पार्टी एमआईएम को फंड और बढ़ावा दे रही है। उन्होंने कहा है कि देश तोड़ने की साजिश की जा रही है।
भिड़़ चुके हैं परिणिति और असदुद्दीन
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष शरद पवार ने कहा है कि भाजपा एमआईएम का समर्थन कर रही है। उन्होंने कहा है कि महाराष्ट्र के लिए एमआईएम खतरनाक साबित हो सकती है।
उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों पूर्व गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे की बेटी और महाराष्ट्र की शोलापुर सेंट्रल सीट से विधायक परिणिति शिंदे ने भी एमआईएम के खिलाफ तीखी टिप्पणी की थी। उन्होंने एमआईएम को देशद्रोही पार्टी कहा था और उसे प्रतिबंधित करने की मांग की थी।
असदुद्दीन औवैसी ने परिणिति के आरोपों के जवाब में पूछा था कि अगर उनकी पार्टी देशद्रोही है तो कांग्रेस ने केंद्र में उनका समर्थन क्यों किया था? आवैसी ने धमकी दी थी कि अगर परिणिति आरोपो के लिए माफी नहीं मांगती वे उनके खिलाफ मानहानी का मुकदमा कर देंगे।
एमआईएम और भाजपा में अंतर क्या है?
महाराष्ट्र में एमआईएम के प्रवेश से कांग्रेस, राजद या एनसीपी क्यों परेशान है? राजनीतिक विश्लेषकों का इस बावत मानना है कि एमआईएम के विस्तार से हिंदू और मुस्लिम वोटों को ध्रूवीकरण होना तय है और उन स्थितियों में भाजपा को ही फायदा होना है।
जानकारों का कहना है कि एमआईएम की कट्टरपंथी म़ुस्लिमपरस्त राजनीति हूबहू वैसी ही है, जैसी भाजपा की हिंदूत्ववादी राजनीति। लोकसभा चुनावों के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं ने हिंदूत्ववादी राजनीति के पक्ष में खुलकर बयानबाजी भी की है।
सरसंघ चालक मोहन भागवत कई मंचों से ये कह चुके हैं, भारत हिंदुओं का देश है। संघ के सहयोगी संगठनों ने भी लव जेहाद और धर्म परिवर्तन के मसले पर मुस्लिम समुदाय पर निशाना साधा है।
आखिर फायदा होगा किसको?
माना जा रहा है कि केंद्र में मोदी सरकार के काबिज होने के बाद से लव जेहाद और धर्म परिवर्तन जैसे मसलों पर भाजपा के सहयोगी संगठनों की बयानों में मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है। एमआईएम मुस्लिम समुदाय की भावना को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर सकती है।
महाराष्ट्र में बाद एमआईएम का अगला संभावित पड़ाव दिल्ली है। पिछली बार दिल्ली विधानसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल अधिकांश सीटें कांग्रेस ने जीती थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एमआईएम दिल्ली में चुनाव लड़ेगी तो मुस्लिम वोटों का बंटवार होगा। उस हालात में भाजपा और आम आदमी पार्टी को फायदा हो सकता है, जबकि कांग्रेस को नुकसान।