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संघ के किनारा करने से परवान नहीं चढ़ी बुजुर्गों की मुहिम

Fri, 20 Nov 2015 06:48 AM IST
Updated Fri, 20 Nov 2015 06:48 AM IST
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अमित शाह की बतौर भाजपा अध्यक्ष नई पारी पर किंतु-परंतु की गुंजाइश करीब-करीब खत्म हो गई है। उनके खिलाफ पार्टी की बुजुर्ग सेना की ओर से छेड़ी गई मुहिम को न तो पार्टी में बड़ा समर्थन मिला और न ही संघ साथ में खड़ा हुआ। बुजुर्गों को उम्मीद थी कि उनके इस अभियान को दूसरी पंक्ति के कुछ ताकतवर नेताओं का साथ मिलेगा लेकिन समर्थन तो दूर, ये नेता उल्टे शाह के बचाव में खड़े हो गए।

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दरअसल बुजुर्ग सेना की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शाह की ताकतवर जोड़ी के खिलाफ अभियान का सारा दारोमदार दूसरी पीढ़ी के नेताओं और संघ के भावी रुख पर निर्भर था। संघ ने मुहिम शुरू होने के लंबे समय तक चुप्पी साधे रखी मगर पार्टी की दूसरी कतार के नेता मोदी-शाह के बचाव में मुखर हो गए।
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वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू ने बुजुर्गों को पार्टी फोरम पर बात रखने की नसीहत दी तो नितिन गडकरी ने अनुशासन की सीमा रेखा पार करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग कर डाली। मोदी-शाह के बचाव में जारी बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में गृह मंत्री राजनाथ सिंह और अरुण जेटली भी शामिल थे।
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शाह की दूसरी पारी लगभग तय

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वहीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और अनंत कुमार लगातार चुप्पी साधे रहे। इनमें से एक भी नेता के बुजुर्गों के साथ खड़े न होने का कारण पार्टी अध्यक्ष के सामने आने वाली भावी चुनौतियां हैं।

अगले दो सालों में असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन सभी जगहों पर पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की संभावना धूमिल हुई है।

असम में भले ही पार्टी का ग्राफ बढ़ा हो और कांग्रेस कमजोर हुई हो मगर स्थितियां इतनी भी अनुकूल नहीं हैं। अगर चुनाव से पहले कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल एक मंच पर आए तो भाजपा के सामने कभी पार न पाने वाली चुनौती आ सकती है। पश्चिम बंगाल में निकाय चुनाव के परिणाम ने नींद उड़ाई है तो पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन की स्थिति मजबूत नहीं है।

वहीं उत्तरप्रदेश में पार्टी के सामने बिहार की तरह मजबूत चेहरे की कमी है। ऐसे में दूसरी पंक्ति के नेताओं को लगा कि शाह के हटने की स्थिति में अगर उनमें से किसी को अध्यक्ष बनाया गया तो इन चुनावों के परिणाम की चुनौतियों से भी पार पाना होगा।

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