आरएसएस को भी सता रहा मोदी का डर, आखिर क्यों?
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा सरकार बनवाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
हालांकि संघ को मोदी के नेतृत्व में बनने वाली भावी सरकार और पार्टी संगठन के बीच संतुलन की कमी का भी भय सता रहा है।
संघ की चिंता इस बात को लेकर है कि मोदी के सत्ता में आने के बाद कहीं भाजपा का केंद्रीय संगठन भी गुजरात की तरह मोदी केंद्रित होकर न रह जाए। अपनी इसी चिंता के मद्देनजर संघ केंद्रीय संगठन को अपने नियंत्रण में रखने का ब्लू प्रिंट तैयार कर रहा है।
संघ ने मोदी के लिए झोंकी पूरी ताकत
दरअसल संघ की आशंका बेवजह नहीं है। गुजरात दंगों के बाद चौतरफा राजनीतिक हमले के बावजूद बढ़े राजनीतिक कद के बाद मोदी ने न केवल अपने विरोधियों को हाशिए पर डाला, बल्कि संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों को भी कोई भाव नहीं दिया।
साथ ही राज्य का पार्टी संगठन भी मोदी के बढ़े राजनीतिक आभामंडल के आगे गौण होकर रह गया।
लोकसभा चुनाव में पार्टी को मुख्य मुकाबले में खड़ा करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने के लिए संघ ने मोदी के लिए सारी ताकत झोंक तो दी है। मगर अब उसकी चिंता सरकार के गठन के बाद की परिस्थितियों को लेकर है।
तीसरी पीढ़ी को संगठन की कमान देने की तैयारी
संघ भाजपा संगठन की कमान पार्टी की दूसरी पीढ़ी के किसी नेता को देने के बदले तीसरी पीढ़ी के युवा और अपने भरोसेमंद चेहरे को सौंपने की योजना बना रहा है।
माना जा रहा है कि संघ इस मामले में जेपी नड्डा, मुरलीधर राव, शिवराज सिंह चौहान और मनोहर पार्रिकर जैसे नेताओं पर दांव लगा सकता है।
युवाओं को आगे बढ़ाने के अपने फार्मूले पर संघ खुद अपनी ओर से पहल करेगा। इसके तहत अरसे से संघ-भाजपा का समन्वय का जिम्मा संभाल रहे सोनी की जगह नई जिम्मेदारी अपेक्षाकृत युवा सह सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल को दी जा सकती है। संघ संभवत: जुलाई महीने में होने वाली भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से पहले इस आशय का ब्लू प्रिंट तैयार कर लेगा।