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जानिए, क्या होगा राइट टू रिजेक्ट का असर

Sat, 28 Sep 2013 01:34 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Sat, 28 Sep 2013 01:34 PM IST
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right to reject and its impact

नकारात्मक मतदान से किसी भी चुनाव के प्रत्याशियों के चयन पर असर नहीं पड़ेगा।

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उदाहरण के तौर पर यदि कहीं कुल वोटिंग में 80 प्रतिशत मतदाताओं ने नापसंदगी जाहिर की तब भी प्रत्याशियों के पक्ष में पड़े शेष 20 फीसदी वोट तय करेंगे कि कौन चुना जाएगा। इसमें से सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार ही विजयी माना जाएगा।

यह कहना है नकारात्मक मतदान का अधिकार देने की मांग वाली याचिका दायर करने वाले एनजीओ पीयूसीएल के अधिवक्ता संजय पारिख का।

एनजीओ के अधिवक्ता के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक पहल है जो मतदाताओं को नापसंदगी का अधिकार प्रदान करती है। इससे राइट टू रिजेक्ट तक जाने का रास्ता भी साफ होता है।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्थिति यह होगी कि किसी भी चुनाव में यदि नकारात्मक वोट ज्यादा पड़ते हैं तो शेष मतदान में सर्वाधिक वोट पाने वाला प्रत्याशी ही चुना जाएगा।
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उन्होंने कहा कि यह पहला कदम था अब आगे नकारात्मक वोट की अधिकता और प्रत्याशियों को कम वोट मिलने की स्थिति पर अदालत में याचिका दायर की जाएगी क्योंकि चुनाव का आधार लोगों का विश्वास होता है।

मतदान के जरिए ही लोगों का विश्वास प्रत्याशी पर स्पष्ट होता है। यदि कोई प्रत्याशी कुल 20 प्रतिशत में सर्वाधिक वोट पाकर चुना जाता है तो यह लोगों के विश्वास की सही परख नहीं होगी।
right to reject
राइट टू रिजेक्ट
राइट टू रिजेक्ट का मतलब मतदाताओं को ईवीएम में वह सुविधा और अधिकार देना, जिसका इस्तेमाल करते हुए वे उम्मीदवारों को नापसंद कर सकें। यदि मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं हो तो वह इस विकल्प को चुन सकता है।

नियम-49-ओ
चुनाव आचार संहिता 1961 में नियम 49-ओ के नाम से जाना जाने वाला यह नियम मतदाता को यह अधिकार देता है कि अगर चुनाव मैदान में उतरे उम्मीदवारों में से उसे कोई भी पसंद नहीं है तो बेहिचक वह अपनी नापसंदगी जाहिर कर सकता है।

फिलहाल क्या है व्यवस्था
नियम 49-ओ के तहत नापसंदगी जाहिर करने के लिए कोई फार्म नहीं है। मतदाता को बूथ के अंदर जाकर सबसे पहले 17-ए रजिस्टर में हस्ताक्षर, उंगली में स्याही लगवाने जैसी सारी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं।

ईवीएम मशीन तक जाने के बाद अगर मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आता है तो बिना बटन दबाए वापस आकर पीठासीन अधिकारी से अपनी इच्छा जाहिर करनी होती है, फिर पीठासीन अधिकारी 17-ए रजिस्टर पर टिप्पणी करेगा कि मतदान से इंकार किया और मतदाता को दोबारा अपना हस्ताक्षर करना होता है। ज्यादातर मतदाताओं को अभी इस अधिकार की जानकारी ही नहीं है।


राइट टू रिजेक्ट की मांग
ईवीएम में राइट टू रिजेक्ट का विकल्प में शामिल करने मामला कानून मंत्रालय के पास 2001 से लटका पड़ा है। राइट टू रिजेक्ट की मांग सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने भी जोरशोर से उठाई थी।

14वां देश होगा भारत
नकारात्मक मतदान की व्यवस्था वाला भारत 14वां देश होगा। यह व्यवस्था फिलहाल 13 देशों में प्रचलित है। इनमें अमेरिका, फ्रांस, बेल्जियम, ब्राजील, यूनान, यूक्रेन, चिली, बांग्लादेश, फिनलैंड, स्वीडन शामिल हैं।

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