वोट बटोरने में नाकाम हो रहा आरक्षण का लॉलीपॉप
राजनीति के बदलते दौर और मायने के बीच वोट बटोरने के लिए ऐन चुनाव से पहले शुरू होने वाली लॉलीपॉप की राजनीति का दांव लगातार फेल हो रहा है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की ओर से चले गए मराठा आरक्षण के दांव का औंधे मुंह गिरना इसी ओर इशारा करता है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय मुस्लिम आरक्षण का दांव हो या फिर राजस्थान, दिल्ली या लोकसभा चुनाव के पूर्व जाट आरक्षण का लॉलीपॉप।
इन सभी चुनावों में मतदाताओं ने आरक्षण की राजनीति के सहारे वोट लूटने की सियासत को ठुकराया है। लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 में से 42 सीटें गंवाने वाली कांग्रेस-एनसीपी की सरकार ने राज्य में सत्ता बचाने के आखिरी तीर के रूप में प्रभावशाली मराठा समुदाय को तमाम विरोधों के बावजूद सरकारी नौकरियों में पांच फीसदी आरक्षण देने का फैसला लिया।
यूपीए ने चला था मुस्लिम आरक्षण का दांव
मगर चुनावी नतीजों में कांग्रेस का तीसरे तो एनसीपी का चौथे नंबर पर जाना स्पष्ट करता है कि चुनावी ऐलानों की हकीकत को वोटर बखूबी समझने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि आरक्षण के सहारे सियासत को सींचने का यह प्रयोग केवल राज्यों में नाकाम हुआ है बल्कि आम चुनाव से ऐन पहले तत्कालीन यूपीए सरकार ने जाट आरक्षण का दांव चला।
हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय को ध्यान में रखकर चले गए इस दांव के लिए हरियाणा के निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से लेकर रालोद नेता अजित सिंह ने इसकी सियासी फसल काटने के लिए जबरदस्त लॉबिंग की।
मगर लोकसभा चुनाव में अजित अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। वहीं हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तीसरे नंबर पर ऐसी खिसकी है कि हुड्डा विपक्ष के नेता भी नहीं बन पाएंगे।
पिछले कुछ सालों में रेवड़ियों और आरक्षण का दांव नाकाम होने का उदाहरण 2012 का उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भी है। तब राहुल गांधी के धुआंधार जनसंपर्क के सहारे कांग्रेस के गायब जनाधार को वापस लाने के लिए केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने मुस्लिम आरक्षण का दांव चला। चुनाव आचार संहिता लागू होने से एक दिन पहले फैसले की अधिसूचना जारी कर दी गई।
फिर भी कांग्रेस यूपी विधानसभा चुनाव में 28 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई। यह अलग बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के आधार पर आरक्षण के मसले पर रोक लगा दी थी।