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अखिलेश सरकार अल्पसंख्यकों को शिक्षा मुहैया कराने में फिसड्डी
बृजेश सिंह/अमर उजाला, दिल्ली
Updated Sun, 20 Oct 2013 12:52 PM IST
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अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को स्कूली शिक्षा देने के मामले में उत्तर प्रदेश देश में सबसे फिसड्डी है। यहां अभी भी स्कूलों में केवल 13.2 फीसदी मुस्लिम बच्चे हैं जबकि आबादी के लिहाज से इनकी भागीदारी 18.5 फीसदी बनती है।
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देश के किसी भी राज्य की तुलना में स्कूलों में मुस्लिम बच्चों की नामांकन का यह सर्वाधिक अंतर है। यही नहीं मुस्लिम साक्षरता के मामले में भी उत्तर प्रदेश गुजरात, मध्यप्रदेश तथा महाराष्ट्र जैसे राज्यों से काफी पीछे है।
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नेशनल मॉनीटरिंग कमेटी फॉर माइनरटीज एजुकेशन ने देश में मुस्लिमों की शिक्षा को लेकर 31 अक्टूबर को एक बैठक बुलाई है। कमेटी को विभिन्न स्रोतों से मिले आंकड़े यह दर्शाते हैं कि जिन राज्यों में मुस्लिम आबादी के कल्याण को लेकर ज्यादा हाय-तौबा मचाया जाता है उन्हीं राज्यों में उनकी शिक्षा की दशा एवं दिशा सबसे खराब है। इसमें उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों का नाम सबसे ऊपर आता है।
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डायस की वर्ष 2012-13 की रिपोर्ट के हवाले से मॉनीटरिंग कमेटी ने पाया है कि यूपी में मुस्लिम समुदाय का हर तीसरा बच्चा स्कूल में दाखिला पाने से वंचित है। यह स्थिति बिहार व पश्चिम बंगाल की भी है।
उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में मुस्लिम वर्ग में साक्षरता राज्य के औसत साक्षरता दर से भी कम है। जबकि, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु में राज्य के औसत से अधिक साक्षरता मुस्लिम वर्ग में है। यह आंकड़े राज्य सरकारों के दावों की पोल खोलते हैं।
नेशनल मॉनीटरिंग कमेटी के अनुसार अल्पसंख्यक छात्रों के लिए कुछ छात्रवृत्ति प्रदान किए जाने के अलावा शिक्षा में उनके लिए सरकारों की ओर से कुछ खास नहीं किया जा रहा है।
कमेटी ने एसएसए के तहत स्कूलों में मुस्लिम बच्चों की भागीदारी बढ़ाने के लिए कुछ उपायों के अमल पर जोर दिया है। इनमें मुस्लिम इलाकों में स्कूल खोलने, शिक्षकों के मुस्लिम संस्कृति एवं धार्मिक मामलों में संवेदनशील बनाने के लिए प्रशिक्षित किए जाने, पाठ्यक्रमों में मुस्लिम संस्कृति एवं त्यौहारों को शामिल करना आदि का सुझाव शामिल है।