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'अंग्रेजी हुकूमत की याद दिलाती है लाल बत्ती'
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Tue, 20 Aug 2013 12:02 AM IST
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कुछ लोगों के लालबत्ती का उपयोग करने का रवैया अंग्रेजी हुकूमत की याद दिलाती है।
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इस तल्ख टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले वीआईपी वाहनों से सायरन हटाए जाएं।
अदालत ने कहा कि कानून का दुरुपयोग करके सायरन और लाल बत्ती के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के लिए अदालत जल्द आदेश देगी। साथ ही राज्य सरकारों के उच्च पदों पर बैठे लोगों की लंबी सूची पर सवाल उठाया।
जस्टिस जीएस सिंघवी व जस्टिस वी गोपाल गौड़ा की पीठ ने उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की ओर से जारी की गई अधिसूचनाओं पर असंतोष जताते हुए कहा कि क्या सायरन और बत्ती के उपयोग से अधिकारियों का कार्य बेहतर होता है।
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दोनों राज्यों के अधिवक्ताओं की ओर से अधिसूचनाओं के बारे में जानकारी दिए जाने पर पीठ ने नाराजगी जताई। इन अधिसूचनाओं में राज्य सरकारों की ओर से विभिन्न स्तर के उच्च पदस्थों को लालबत्ती उपयोग करने की छूट प्रदान की गई है।
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पीठ ने कहा कि अदालत को क्यों नहीं सभी अधिसूचनाओं को निरस्त कर देना चाहिए। आप यह कैसे कह सकते हैं कि मेयर, पुलिस अधीक्षक, उपाधीक्षक, सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट, जिला परिषद चेयरमैन इत्यादि को लालबत्ती मुहैया कराया जाना न्यायोचित है।
पीठ ने पूर्व गृहमंत्री का उदाहरण पेश करते हुए कहा कि यह बहुत ही विडंबना की बात है कि उन्होंने कोई भी सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया था। जबकि दूसरी ओर अन्य हमेशा इस प्रतिस्पर्धा में लगे रहे।
वहीं पीठ के समक्ष अदालत के मित्र व वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि लालबत्ती राजशाही की याद दिलाती है और इससे संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है। यह बहुत आम राय है कि लालबत्ती गलत है। उच्च पदासीनों की परिभाषा को नीचे लाया जाना चाहिए।
साल्वे ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारी और मंत्री सभी जनता के सेवक हैं। इन्हें आम जनता की सेवा के लिए मौका दिया जाता है जिसके बदले उन्हें जनता की ओर से चुकाए गए टैक्स से वेतन मिलता है।
इस पर पीठ ने कहा कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है। वह टैक्स अदा करती है। वह टैक्स देती है और अपने प्रतिनिधि भी चुनती है। फिर जनसाधारण को लाल बत्ती से क्यों न नवाजा जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह गैरकानूनी अधिसूचना को निरस्त कर देगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना है कि वीआईपी गाड़ियों से लालबत्ती और सायरन हट जाए। यह अंग्रेजों के जमाने की चीजें हैं। इस संबंध में जारी अधिसूचनाओं को रद्द किया जाएगा।
गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत ने गाड़ियों से बत्तियों और सायरन को हटाने के मुद्दे पर आदेश सुरक्षित कर लिया है।
साथ ही स्पष्ट किया है कि लालबत्ती का उपयोग सीमित तौर पर होना चाहिए। वह सिर्फ संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों के लिए होना चाहिए।
यूपी की अधिसूचना पर असंतुष्ट अदालत
सर्वोच्च अदालत में उत्तर प्रदेश की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने जून में जारी की गई अधिसूचना की जानकारी दी। अदालत को उन पदों के बारे में बताया जिन्हें लालबत्ती मिलेगी। इस सूची में मुख्य चिकित्साधिकारी, चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, डीआईजी व अन्य शामिल हैं।
सर्वोच्च अदालत ने अधिवक्ता से पूछा कि इससे किस तरह आप जिला जज के प्रदर्शन को बढ़ा सकते हैं। जवाब में अधिवक्ता ने कहा कि उनके मुताबिक यह बहुत ही संवेदनशील मसला था कि किसे यह सुविधा न मुहैया कराई जाए।
सर्वोच्च अदालत उनकी दलील से हालांकि खुश नहीं हुई और कहा कि यह सुविधा किसी कि संवेदनशीलता को किस तरह प्रभावित करती है।
लालबत्ती के दुरुपयोग पर जुर्माना
केंद्र ने सर्वोच्च अदालत को सूचित किया कि अवैध तरीके से लालबत्ती के उपयोग पर सरकार जुर्माने की राशि को बढ़ाने जा रही है।
अब तक जुर्माने की राशि सौ से तीन सौ रुपये थी जिसे बढ़ाकर पांच सौ कर दिया गया है। पहली बार दुरुपयोग करने वाले को पांच सौ और कई बार करने वाले पर एक हजार से पंद्रह सौ रुपये का जुर्माना किया जाएगा।
सर्वोच्च अदालत ने हालांकि इस संबंध में नियमावली तैयार करने के लिए चार सप्ताह की मोहलत केंद्र को देने से इंकार करते हुए कहा कि सायरन, सुरक्षा वाहन और लाल बत्ती के दुरुपयोग पर अदालत अपना निर्णय सुनाएगी।
जस्टिस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सरकार अदालत के आदेश को सरकार गंभीरता से नहीं ले रही है। नियमावली तैयार करने के लिए सरकार को कई मौके दिए जा चुके हैं।
पर्याप्त समय देने के बावजूद इस दिशा में कदम नहीं बढ़ाए गए हैं। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 108 के खिलाफ जारी अधिसूचना को रद्द क्यों नहीं किया जाता।