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कांटे की टक्कर के तमाम राजनीतिक अनुमानों और एक्जिट पोल के 'मिक्स' नतीजों को खारिज करते हुए बिहार की जनता ने अपना एकतरफा जनादेश महागठबंधन को दिया। 243 सीटों में से महागठबंधन को 178 सीटें मिलीं। लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद 80 सीटें लेकर इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।
जेडीयू 71 सीटें लेकर दूसरे नंबर की पार्टी बनी। 58 सीटों के साथ बीजेपी इन चुनावों में नंबर तीन की पार्टी बन गई। कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए 27 सीटें जीतीं। बीजेपी की तरह इन चुनावों में बीजेपी के घटक दलों को भी हार मिली।
राम विलास पासवान की लोजपा महज दो सीटों में सिमट गई तो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी सिर्फ अपनी ही एक सीट जीत पाएं। दो सीटों से चुनाव लड़ने वाले मांझी को अपनी दो में से एक सीट गंवानी पड़ी।
चुनावी परिणामों में शुरुआत में जरूर बीजेपी बड़ी पार्टी के रुप में उभर रही थी। एक समय बीजेपी गठबंधन 94 सीटों पर आगे था और महागठबंधन महज 72 पर। मतगणना के बढ़ते चरण के साथ-साथ महागठबंधन की बढ़त का आंकड़ा बढ़ता गया।
यूं समझिए महागठबंधन की जीत के गणित को
हालांकि सीट जीतने के मामले में जदयू का भी स्ट्राइक रेट अच्छा रहा। 101 सीटों में लड़ने वाली नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने 71 सीटें जीतीं। चुनाव परिणामों में एंटी इनकंम्बेंसी इफेक्ट देखने को नहीं मिला। अपवाद को छोड़कर जदयू के सभी मंत्री चुनाव जीतने में सफल रहे।
महागठबंधन में सबसे ज्यादा चौंकाने वाले परिणाम कांग्रेस के रहे। महज 41 सीटों में चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस ने अपेक्षाओं से बहुत ज्यादा बढ़ते हुए 27 सीटें जीतीं। खुद कांग्रेसी नेता भी इतनी सीटें जीतने की उम्मीद नहीं कर रहे थे।
यूं बिगड़ा राजग का गणित
महागठबंधन में सीटों के तालमेल के उलट राजग में बीजेपी 160 सीटें लेकर चुनाव लड़ी थी। उसके सहयोगी अपेक्षाकृत छोटे थे। 160 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी को 53 सीटें मिलीं। 2010 के चुनावों में सबसे बड़ी हार बीजेपी की ही रही। 2010 के चुनावों में बीजेपी को 91 सीटें मिली थीं जोकि इस चुनाव में 38 सीटें कम हैं।
बीजेपी के बाद रामविलास पासवान की लोजपा बीजेपी के बाद इस गठबंधन में सबसे ज्यादा सीटें लड़ी थी। 60 सीटों में लड़ने वाली लोजपा को इस चुनाव में महज 2 सीटें मिलीं। मजे की बात यह है कि लोजपा को पिछले चुनाव में भी इतनी ही सीटें मिली थीं।
कुछ समय पहले तक नीतीश सरकार में मंत्री रहे और बाद में उनसे बगावत करके अलग पार्टी बनाने वाले जीतन राम मांझी भी इस गठबंधन का हिस्सा थे। 21 सीटों में चुनाव लड़ने वाली उनकी पार्टी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा को महज 1 सीटें मिलीं। यह सीट खुद उनकी ही थी।
दो सीटों से चुनाव लड़ रहे जीतनराम मांझी खुद भी अपनी एक सीट को हार गए। एनडीए की और सहयोगी में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी रही है। 25 सीटें लड़ने वाली इस पार्टी को महज दो सीटें मिलीं।
बाकियों का क्या रहा हश्र
बिहार के चुनाव परिणाम उसी के अनुरूप रहे। समाजवादी पार्टी की अगुवाई में बने मोर्चा को एक भी सीट हासिल नहीं हुई। 85 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली सपा को एक भी सीट नहीं मिली। न ही उनके सहयोगी नेशलिस्ट कांग्रेस पार्टी और पप्पू यादव की पार्टी को।
इन चुनावों में उवैसी की पार्टी एमआईएम चुनावी उठापटक का हिस्सा तो बनी लेकिन उसके खाते में एक भी सीट नहीं आ सकी। इस चुनाव में कम्यूनिस्ट पार्टी (लिबरेशन) को तीन सीटें मिलीं। बाकी चार सीटें निर्दलीय जीतने में सफल रहे। बसपा ने शुरुआती रुझानों में एक सीट पर बढ़त तो बनाई थी लेकिन वह उसे सीट में कन्वर्ट नहीं कर पाई।
किसका कैसा रहा वोट प्रतिशत
इन चुनावों में सभी पार्टियों का वोट प्रतिशत दिलचस्प रहा। गठबंधन में चुनाव लड़ने की वजह से जदयू का वोट प्रतिशत गिरा और पिछले चुनाव की तुलना में ज्यादा सीटें लड़ने की वजह से भाजपा के वोट प्रतिशत में बढोत्तरी हुई। भले ही बीजेपी की सीटें इस बार कम हो गईं हो।
2010 के चुनाव में जब बीजेपी 91 सीटें जीतने में सफल रही थी तब बीजेपी का वोट प्रतिशत 16.46% था। तब बीजेपी ने 102 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस बार बीजेपी ने 160 सीटें लड़ी और उसे 52 सीटें मिलीं। लेकिन 2010 की तुलना में बीजेपी के वोट प्रतिशत में इजाफा हुआ। इस बार बीजेपी को करीब 24 फीसदी वोट मिले।
पिछले चुनाव की तुलना में करीब 40 सीटें कम लड़ने वाली जेडीयू को इस बार मत प्रतिशत में नुकसान उठाना पड़ा। इस बार 101 सीटें लड़ने वाली जेडीयू को इस बार 71 सीटें मिलीं लेकिन 2010 के चुनावों में मिले उसे 22.61% की तुलना में उसे इस बार करीब 16 फीसदी वोट मिले।
अलग-अलग तरह के समीकरणों में चुनाव लड़ने वाली लालू की पार्टी आरजेडी के साथ खासियत यह रही कि 2010 में उसे 18.84% वोट मिले थे तो इस भी बार उसे लगभग उतने ही फीसदी वोट मिले। जबकि 2010 की तुलना में इस बार राजद ने करीब 40 सीटें कम लड़ी थीं।
इस चुनाव में आश्चर्यजनक ढंग से 26 सीटें जीतने वाले कांग्रेस को भी वोट प्रतिशत में पिछली बार की तुलना में नुकसान उठाना पड़ा। 2010 के चुनाव में कांग्रेस ने महज 4 सीटें जीती थीं लेकिन उसका वोट प्रतिशत इस बार की तुलना में ज्यादा था।
2010 में कांग्रेस को 8.38% वोट मिला था। इस बार वह वोट प्रतिशत घटकर 6.7% रह गया। इसकी सीधी वजह पिछले चुनाव में कांग्रेस का सभी 243 सीटों में अकेले चुनाव लड़ना था। महाठबंधन में कांग्रेस 41 सीटों में ही चुनाव लड़ रही थी।