'मोदी सरकार को और बहुत कुछ करना होगा'
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय रिजर्व बैंक ने मूल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है, लेकिन साथ ही आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती किए जाने की संभावनाओं से इनकार भी नहीं किया है।
इससे पहले कयास लगाए जा रहे थे कि सुस्त आर्थिक विकास की दर और मुद्रास्फीति में ताजा कमी को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक हस्तक्षेप कर सकता है।
रिजर्व बैंक कह चुका है कि केंद्र की मोदी सरकार ने निवेश को बढाने के लिए कई उपाय किए हैं, लेकिन आर्थिक विकास को गति देने के लिए और बहुत कुछ करना होगा। इस पर पेश है सरकार की अर्थनीति बारे में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन से खास बातचीत।
केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक विकास की दर का लक्ष्य 5.5 प्रतिशत निर्धारित किया है। क्या आर्थिक विकास को गति देने के लिए मोदी सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस सवाल पर रघुराम राजन का कहना था, "मुझे लगता है कि सरकार ने काफी कदम उठाए हैं और उठा रही है।"
वो कहते हैं, "आर्थिक विकास को और गति देने के लिए तीन या चार क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत है- ऊर्जा, खनन, भूमि अधिग्रहण और बडी निवेश परियोजनाएं जैसे रेलवे। इन चारों क्षेत्रों में सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं।"
"कुछ अन्य काम भी किए जा रहे हैं जिनका प्रभाव लंबे अंतराल में दिखेगा जैसे व्यवसाय के अनुकूल माहौल बनाना, श्रम कानूनों में बदलाव की कोशिश करना और कर प्रबंधन।"
मोदी सरकार की विकास दर
आने वाले समय में भारत के विकास के बारे में रघुराम राजन का कहना है, "मुझे लगता है कि 2017 तक हम हर वर्ष विकास दर में एक प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करेंगे। हम उम्मीद करते हैं कि अगले वित्त वर्ष में विकास दर 6.5 प्रतिशत और इसके अगले वित्त वर्ष में 7.5 प्रतिशत विकास दर होगी।"
वह कहते हैं, "इसके आगे विकास दर इस इस बात पर निर्भर करेगी कि जो आर्थिक सुधार होने हैं वो कैसे होते हैं और वैश्विक परिस्थितियां कैसी होती हैं।"
कुछ समय पहले रघुराम राजन ने विकसित देशों की मौद्रिक नीति की आलोचना की थी। आखिर इस नीति के क्या खतरे हो सकते हैं, इस पर वह कहते हैं, "पहला खतरा है कि इस तरह की नीति से मुद्रा प्रवाह का रुख एक अर्थव्यवस्था से दूसरे की ओर हो जाता है।"
उनका कहना है, "अगर दूसरे देश को इसे ठीक से इस्तेमाल करने की योजना बनानी होती है और यदि वह इसे ठीक तरह से संभाल नहीं पाया तो देश में कर्ज की बाढ आ जाती है और परिसंपत्तियां महंगी हो जाती हैं। भारत समेत कई विकासशील अर्थव्यवस्थाएं कर्ज की बाढ के संकट से पहले ही जूझ रही हैं।"