फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   raw officer famous in the world

दुनिया भर में थी इस भारतीय की धूम

Sun, 04 May 2014 02:52 PM IST
Updated Sun, 04 May 2014 02:52 PM IST
विज्ञापन
raw officer famous in the world

भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बगल में बंद गले के सूट में खड़े हैं रॉ के पहले निदेशक रामेश्वर नाथ काव। 1996 में पूरे भारत में बांगलादेश के जन्म की 25वीं सालगिरह का जश्न मनाया जा रहा था। इस अवसर पर कई बैठकें आयोजित की गई थीं। एक बैठक में एक बांगलादेशी पत्रकार ने हॉल की पिछली सीट पर एक लंबे, स्मार्ट और आकर्षक शख़्स को देखा। वो उनके पास आ कर बोला, "सर आपको तो वहाँ मंच पर बीच में होना चाहिए। आप ही की वजह से तो 1971 संभव हो सका।"

विज्ञापन


उस आकर्षक और शर्मीले इंसान ने जवाब दिया, "जी नहीं मैंने कुछ नहीं किया। मंच पर बैठे लोगों की तारीफ़ होनी चाहिए।" पहचान लिए जाने से परेशान वो शख़्स अपनी जगह से उठा और चुपचाप हॉल से बाहर निकल गया। इस शख़्स का नाम था रामेश्वरनाथ काव - भारत की बाहरी खुफ़िया एजेंसी रॉ (आरएडब्ल्यू) के जन्मदाता।
विज्ञापन


1982 में फ़्रांस की बाहरी ख़ुफ़िया एजेंसी एसडीईसीई के प्रमुख काउंट एलेक्ज़ांड्रे द मेरेंचे से जब कहा गया था कि वो सत्तर के दशक के दुनिया के पांच सर्वश्रेष्ठ ख़ुफ़िया प्रमुखों के नाम बताएं, तो उन्होंने उन पांच लोगों में काव का नाम भी लिया था।
विज्ञापन
विज्ञापन


तब उन्होंने काव के बारे में कहा था, "शारीरिक और मानसिक सुघड़पन का अदभुत सम्मिश्रण है ये इंसान! इसके बावजूद अपने बारे में, अपने दोस्तों के बारे में और अपनी उपलब्धियों के बारे में बात करने में इतना शर्मीला!"

रामेश्वरनाथ काव का जन्म 10, मई, 1918 को वाराणसी में हुआ था। 1940 में उन्होंने भारतीय पुलिस सेवा जिसे उस ज़माने मे आईपी कहा जाता था की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें उत्तर प्रदेश काडर दिया गया। 1948 में जब इंटेलिजेंस ब्यूरो की स्थापना हुई तो उन्हें उसका सहायक निदेशक बनाया गया और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंपी गई।

ख़ुफ़िया ऑपरेशन करने का मौका मिला

raw officer famous in the world

अपने करियर की शुरुआत में ही उन्हें एक बहुत बारीक ख़ुफ़िया ऑपरेशन करने का मौका मिला। 1955 में चीन की सरकार ने एयर इंडिया का एक विमान ‘कश्मीर प्रिंसेज़’ चार्टर किया जो हांगकांग से जकार्ता के लिए उड़ान भरने वाला था और जिसमें बैठ कर चीन के प्रधानमंत्री चू एन लाई बांडुंग सम्मेलन में भाग लेने जाने वाले थे।

चीन के पूर्व प्रधानमंत्री चू एन लाई, वियतनामी नेता हो ची मिन्ह के साथ। लेकिन अंतिम मौके पर एपेंडेसाइसटिस का दर्द उठने के कारण उन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी थी। वो विमान इंडोनेशिया के तट के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और इसमें बैठे अधिकतर चीनी अधिकारी और पत्रकार मारे गए थे।

रामनाथ काव को इस दुर्घटना की जांच की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। काव ने जांच कर पता लगाया था कि इस दुर्घटना के पीछे ताइवान की ख़ुफ़िया एजेंसी का हाथ था।

ख़ुफ़िया एजेंसी की शुरुआत

raw officer famous in the world

काव को नज़दीक से जानने वाले आरके यादव ने बीबीसी को बताया कि चीन के प्रधानमंत्री चू एन लाई उनकी जाँच से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने काव को अपने दफ़्तर बुलाया और यादगार के तौर पर उन्हें अपनी निजी सील भेंट की जो अंत तक काव की मेज़ की शोभा बनी रही।

1968 में इंदिरा गांधी ने सीआईए और एमआई 6 की तर्ज़ पर भारत में भी देश के बाहर के ख़ुफ़िया मामलों के लिए एक एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) बनाने का फ़ैसला किया और काव को इसका पहला निदेशक बनाया गया।

रॉ ने अपनी उपयोगिता 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में सिद्ध कर दी। काव और उनके साथियों की देखरेख में एक लाख से अधिक मुक्तिवाहिनी के जवानों को भारत में प्रशिक्षण दिया गया। काव का ख़ुफ़िया तंत्र इतना मज़बूत था कि उन्हें इस बात तक की जानकारी थी कि किस दिन पाकिस्तान भारत पर हमला करने वाला है।

रॉ के पूर्व निदेशक और काव को नज़दीक से जानने वाले आनंद कुमार वर्मा कहते हैं, "याहिया खाँ के दफ़्तर के हमारे एक सोर्स ने हमें पुख़्ता जानकारी दे दी थी कि किस दिन हमला होने वाला है। ये सूचना वायरलेस के ज़रिए आई थी। जब कोडेड सूचना को डिसाइफ़र किया गया तो ग़लती से तय तारीख से दो दिन पहले की सूचना दे दी गई।

वायुसेना को तैयार रहने के लिए कहा गया। दो दिन तक कुछ नहीं हुआ। ये लोग हाई अलर्ट पर थे। तब वायुसेनाध्यक्ष ने काव साहब से कहा कि इतने दिनों तक वायुसैनिकों को हाई अलर्ट पर नहीं रखा जा सकता।

काव ने जवाब दिया एक दिन और रुक जाइए। 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने हमला किया और भारतीय वायुसेना उस हमले के लिए पूरी तरह से तैयार थी। ये जो एजेंट था वो एक ह्यूमन एजेंट था। अच्छा लोकेशन था उसका और उसके पास सूचना भेजने के लिए वायरलेस भी था।"

सिक्किम विलय की योजना

raw officer famous in the world

भारत में सिक्किम के विलय में भी रामेश्वर काव की ज़बरदस्त भूमिका रही। उन्होंने इस काम को महज़ चार अफ़सरों के सहयोग से अंजाम दिया और इस पूरे मिशन में इतनी गोपनीयता बरती गई कि उनके नंबर दो शंकरन नायर को भी इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था।

आरके यादव कहते हैं, "सिक्किम की योजना आरएन काव की ज़रूर थी लेकिन तब तक इंदिरा गाँधी इस क्षेत्र की निर्विवाद नेता बन चुकी थीं। बांगलादेश की लड़ाई के बाद उनमें इतना आत्मविश्वास आ गया था कि वो सोचती थीं कि आसपास की समस्याओं को सुलझाने का ज़िम्मा उनका है। सिक्किम समस्या की शुरुआत तब हुई जब चोग्याल ने एक अमरीकी महिला से शादी कर ली थी और सीआईए का थोड़ा बहुत हस्तक्षेप वहाँ शुरू हो गया था।"

आरके यादव आगे बताते हैं, "काव साहब ने इंदिरा गाँधी को सुझाव दिया कि सिक्किम का भारत के साथ विलय कराया जा सकता है। ये एक तरह से रक्तविहीन तख़्तापलट था और इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी बात ये थी कि ये चीन की नाक के नीचे हुआ था। चीन की सेनाएं सीमा पर थीं लेकिन इंदिरा गाँधी ने चीन की कोई परवाह नहीं की। काव को ही श्रेय जाता है कि उन्होंने 3000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र का भारत में विलय कराया और सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बना।"

इंदिरा गांधी की सुरक्षा का जिम्मा था किसके पास?

raw officer famous in the world

इंदिरा गांधी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी काव के पास थी। इंदर मल्होत्रा एक दिलचस्प किस्सा याद करते हैं जो उन्हें रामेश्वर काव ने ही सुनाया था।

मल्होत्रा कहते हैं, "काव ने बताया कि हम राष्ट्रमंडल सम्मेलन में भाग लेने मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया गए थे। एक दिन मुझे पता चला कि ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा टीम का एक व्यक्ति मुझसे मिलना चाहता है। मेरे पास आकर उसने कहा कि मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ। आपकी प्रधानमंत्री एक महान देश की महान नेता हैं और यहाँ ऑस्ट्रेलिया की धरती पर उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मेरी है।"

मल्होत्रा ने किस्सा आगे बताते हुआ कहा, "आप लोगों के यहाँ पता नहीं क्या प्रचलन है। जब वो कार से उतरतीं हैं तो अपना बटुआ और छतरी मुझे पकड़ा देती हैं। उनसे से मैं नहीं कह सकता लेकिन आप से कह रहा हूँ कि जब कोई नेता कार से उतरता है या चढ़ता है तभी आतंकवादी के पास मौक़ा होता है उन पर गोली चलाने का।

ऐसी स्थिति में मेरे दोनों हाथ ख़ाली होने चाहिए उनकी हिफ़ाज़त के लिए चाहे इसके लिए हमें कार में एक अतिरिक्त व्यक्ति भी कार में क्यों न बैठाना पड़े। काव ने जब इंदिरा गाँधी को ये बात समझाई तो वो ये बात समझ गईं और उन्होंने उसे अपनी छतरी और बटुआ देना बंद कर दिया लेकिन जब वो भारत वापस आईं तो फिर से उन्होंने अपनी पुरानी आदत दोहरानी शुरू कर दी।"

बेहतरीन कपड़े पहनने का शौक

raw officer famous in the world

काव को बेहतरीन कपड़े पहनने का शौक था। आरके यादव कहते हैं, "मैंने उनको रिटायरमेंट के बाद भी हमेशा सूट टाई में देखा। लेकिन कभी कभी वो कुर्ता भी पहनते थे खादी का और वो बताया करते थे कि मैं इसे खादी भंडार से लाया हूँ और वो पोशाक उन पर फबती भी थी क्योंकि उनका शरीर ऐसा था।

पेट अंदर की तरफ़ था और उनका डीलडौल एक एथलीट की तरह था। वो जब युवा थे तब से ही घोड़ा रखते थे। वो मुझसे कहा करते थे कि मेरी तनख़्वाह का आधा हिस्सा तो घोड़े को खिलाने में चला जाता है। उनके शानदार कपड़े पहनने की वजह से कुछ अफ़सरों को उनसे रश्क भी होता था। इसमें कोई संदेह नहीं कि ही वाज़ द बेस्ट ड्रेस्ड मैन।"

रॉ के पूर्व अतिरिक्त निदेशक राणा बनर्जी भी काव को बेहद करीब से जानते थे। राणा ने बीबीसी को बताया, "वो एक ख़ास किस्म की बनियान पहनते थे। वो जाली वाली बनियान होती थी और उसकी आस्तीन में भी जाली होती थी।

ये बनियान सिर्फ़ कलकत्ते की गोपाल होज़री में बना करती थी। लेकिन फिर ये कंपनी बंद हो गई। लेकिन इसके बावजूद वो काव साब के लिए अलग से साल भर में जितनी उनकी ज़रूरत थी दस या बारह बनियान, वो उनके लिए बनाया करते थे।"

राणा आगे बताते हैं, "जब मेरी कलकत्ते में पोस्टिंग हुई तो मेरे सीनियर ने मुझसे कहा कि अब ये तुम्हारी ज़िम्मेदारी है कि काव साहब के पास गोपाल होज़री से बनियाने पहुंचती रहें। एक बार काव साहब का फ़ोन आया तो मैंने कहा कि मैंने बनियानें भिजवा दी हैं। इससे पहले कि वो बनियानें उन तक पहुँच पातीं, उनका दाम 25 रुपए मेरे पास पहुँच गए थे। इतना ध्यान रखते थे वो चीज़ों का।"

आपातकाल की ज्यादतियों में काव साहब का भी हाथ

raw officer famous in the world

1977 में जब इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं और मोराजी देसाई सत्ता में आए तो उन्हें इस बात का भ्रम हो गया कि आपातकाल की ज़्यादतियों में काव साहब का भी हाथ था। उन्होंने ये बात काव से खुल कर कही भी। काव ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि आप इसकी जांच करवा सकते हैं।

इसके बाद एक एसपी सिंह कमेटी बिठाई गई इसके लिए जो चरण सिंह के दामाद होते थे। उस कमेटी ने छह महीने के अंदर रिपोर्ट दी थी और न सिर्फ़ रॉ को बेदाग़ बताया बल्कि ये भी कहा कि इमरजेंसी से काव का कोई लेनादेना नहीं था।"

रॉ के लगभग सभी अधिकारी काव की दरियादिली को अभी तक याद करते हैं। ज्योति सिन्हा रॉ के अतिरिक्त सचिव रह चुके हैं।

वो कहते हैं, "क्या उनका सॉफ़िस्टिफ़िकेशन था! बात करने का ढ़ंग था। वो किसी से कोई ऐसी चीज़ नहीं कहते थे जो उसे दुख पहुँचाए। एक उनका जुमला मुझे बहुत अच्छा लगता था। वो कहा करते थे।।। अगर कोई तुम्हारा विरोध करता है तो उसे ज़हर दे कर क्यों मारना है।।। क्यों न उसे ख़ूब शहद दे कर मारा जाए। कहने का मतलब ये था कि क्यों न उसे मीठे तरीके से अपनी तरफ़ ले आया जाए। हम लोग उस ज़माने में बहुत युवा थे और हम सभी लोग उन्हें हीरो वर्शिप किया करते थे।"

भारत को कितना फ़ायदा हुआ

raw officer famous in the world

विदेशी ख़ुफ़िया प्रमुखों को साथ काव के निजी संबंधों के साथ भारत को कितना फ़ायदा हुआ, इसकी जानकारी शायद ही लोगों को कभी हो पाए।

एक बार अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति और सीआईए के प्रमुख रह चुके जार्ज बुश सीनियर ने उन्हें अमरीकी 'काऊ ब्वॉय' की छोटी सी मूर्ति भेंट में थी।

बाद में जब उनके अनुयायियों को 'काव बवॉएज़' कहा जाने लगा तो उन्होंने उस मूर्ति का फ़ाइबरग्लास प्रतिरूप बनवा कर रॉ के मुख्यालय के स्वागत कक्ष में लगवाया था।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed