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रिश्तेदारी के चक्कर में फंसे रशीद मसूद
विनोद अग्निहोत्री/नई दिल्ली
Updated Wed, 02 Oct 2013 01:00 AM IST
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दागी सांसदों पर सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के तहत अदालत से चार साल की सजा पाने के बाद अपनी ससंद सदस्यता खोने वाले देश के पहले सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रशीद मसूद का राजनीतिक इतिहास खासा दिलचस्प रहा है।
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मसूद भले ही मेडिकल कॉलेज में भर्ती घोटाले के लिए अदालत से दोषी करार होकर चार साल के लिए जेल भेज दिए गए हैं, लेकिन आम तौर पर उनकी छवि एक साफ सुथरे और उदार मुस्लिम राजनेता की रही है।
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इसके पहले उन पर कभी भी आर्थिक बेईमानी का आरोप नहीं लगा। 2007 में मसूद को समाजवादी पार्टी ने उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार भी बनाया था।
दोस्ती और संबंध निभाने के लिए मशहूर रशीद मसूद सहारनपुर के अपने बागानों के आम मंगाकर दिल्ली में अपने मित्रों को आम की दावत देने के शौकीन भी रहे हैं।
मसूद के करीबी कहते हैं कि रिश्तेदारी और सियासी दोस्ती निभाने के चक्कर में ही मसूद मेडिकल भर्ती घोटाले के चक्कर में फंस गए।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहने वाले रशीद मसूद ने अपना राजनीतिक सफर दिग्गज किसान नेता चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में शुरु किया था।
यह वह दौर था जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में जाट और मुस्लिम किसानों का मजबूत गठजोड़ बनाकर लोकदल एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन रहा था। रशीद मसूद उस समीकरण की एक मजबूत धुरी थे।
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चरण सिंह के करीबी होने के कारण उनकी सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, बिजनौर, मुरादाबाद आदि जिलों में अच्छी साख थी।
सहारनपुर जिले की राजनीति में मसूद का मुकाबला कांग्रेस के तत्कालीन दिग्गज नेता चौधरी यशपाल सिंह से होता था।
यशपाल सिंह को जिले के गूजर किसानों का एकछत्र नेता माना जाता था, जबकि मसूद को मुसलमानों के साथ जाटों और अन्य किसान जातियों का समर्थन मिलता था।
यशपाल और मसूद के बीच इस कदर छत्तीस का आंकडा रहा कि कभी भी दोनों एक दल में नहीं रहे।
उत्तर प्रदेश के पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव से पहले जब राहुल गांधी के रणनीतिकार रशीद मसूद को कांग्रेस में लेकर आए तो विरोध में यशपाल सिंह ने कांग्रेस छोड़कर सपा का दामन थाम लिया।
इसके पहले भी यशपाल और मसूद के बीच सियासी चूहे-बिल्ली का खेल चलता रहा है।
चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद जब उनकी विरासत की जंग अजीत सिंह और मुलायम सिंह यादव के बीच हुई तब रशीद मसूद ने अजित सिंह का जमकर साथ दिया।
1989 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में रशीद मसूद केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने तब वह अजित सिंह के कोटे से ही मंत्री बनाए गए थे।
उनके इसी कार्यकाल के दौरान हुई मेडिकल भर्ती को लेकर मसूद को सजा मिली है।
जानकार बताते हैं कि रशीद मसूद ने पूर्वोत्तर के कोटे से जो गलत भर्तियों के आदेश दिए थे, उनमें एक तो उनका खास रिश्तेदार था, जबकि दो उम्मीदवार तत्कालीन जनता दल के दो कद्दावर नेताओं की सिफारिश पर किए गए थे।
अपने राजनीतिक जीवन में रशीद मसूद ने अजित सिंह का साथ तब छोड़ा जब नरसिंह राव के जमाने में अजित सिंह ने लोकदल का विलय कांग्रेस में किया था, तब मसूद इस फैसले के विरोध में मुलायम सिंह के साथ सपा में चले गए थे।
बाद में अजित सिंह के कांग्रेस से अलग होते ही मसूद फिर उनके साथ आ गए।
लेकिन मसूद ने मुलायम सिंह से कभी भी अपने रिश्ते नहीं बिगाड़े और वह दूसरी बार सपा में तब शामिल हुए जब अजित सिंह ने 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा से गठबंधन किया। मसूद इसके भी खिलाफ थे।
2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में आने से पहले रशीद मसूद समाजवादी पार्टी में ही थे और राज्यसभा सदस्य थे।
लेकिन कांग्रेस में शामिल होते ही उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दिया। बाद में कांग्रेस ने उन्हें फिर राज्यसभा में भेजा।