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रेप व मर्डर में लोगों की घृणा नहीं हो सकती नजरअंदाज

Sun, 10 Feb 2013 08:42 PM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
नई दिल्ली/एजेंसी Updated Sun, 10 Feb 2013 08:42 PM IST
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rarest of rare test needs society approval

अपराध के जघन्यतम मामलों में न्याय सिर्फ न्यायाधीश के नजरिये से नहीं होता बल्कि इसे समाज के नजरिये से भी देखा जाता है। न्यायाधीश समाज की राय पर गौर करते हुए यह विचार करते हैं कि क्या विशेष किस्म के अपराध में दोषी को मौत की सजा ही दी जानी चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाते हुए यह बात कही है। कोर्ट ने कहा कि अपराध और अपराधी के प्रति समाज का गुस्सा, नफरत और घृणा को न्यायाधीश नजरअंदाज नहीं कर सकते। खास तौर पर बलात्कार और हत्या जैसे मामलों में। अगर ये कमउम्र लड़कियों और बुजुर्गों के खिलाफ हुए हों तो इन बातों का विशेष तौर पर ध्यान में आना सहज है।
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न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन और न्यायाधीश दीपक मिश्रा की पीठ ने कहा, ‘परिस्थितियों की मांग, संवैधानिक बाध्यता और नागरिकों की इच्छा को देखते हुए अदालतें मृत्युदंड की सजा सुनाती हैं। यह सजा सिर्फ न्यायाधीश के नजरिये से नहीं होतीं।’
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उन्होंने कहा, ‘अपराधी को मौत की सजा सुनाते वक्त उन परिस्थितियों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है, जिनमें अपराध हुआ। वे ऐसी परिस्थितियां ऐसी कतई नहीं होनी चाहिए जो अपराधी या अपराध की प्रकृति की गंभीरता को कम करती हों।’

न्यायाधीश के अनुसार इन कसौटियों को कसने के बाद न्यायाधीश को यह देखना होता है कि अपराध कितना दुर्लभ या दुर्लभतम है। यह जांचते वक्त वह समाज की ओर देखता है। ऐसे में फैसला केवल न्यायाधीश के नजरिये से नहीं होता। वह देखता है कि क्या इस मामले में मृत्युदंड की सजा को समाज मान्य करेगा।

पीठ ने पंजाब में संपत्ति के एक मामले में में दो युवकों (गुरवील और सतनाम सिंह) द्वारा एक परिवार के चार लोगों की हत्या के मामले में फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणियां की। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा अगस्त 2000 में इन दोनों को सुनाई सजा-ए-मौत को 30 वर्ष के आजीवन कारावास में बदल दिया। न्यायालय ने कहा कि जहां तक इस मामले का सवाल है मृत्युदंड की सजा जरूरी नहीं है। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 2005 में दोनों की सजा-ए-मौत पर रोक लगा दी थी।


कोर्ट ने कहा कि अपराध के वक्त गुरवील की उम्र 34 और सतनाम सिंह की उम्र 22 साल थी। न्यायालय के अनुसार, ‘हत्या के इस मामले में दोषियों की उम्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अपने जीवन में इनके सुधर जाने की गुंजाइश से इनकार नहीं किया जा सकता।’

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