मिलिए उस शख्स से जिसने पूरा किया बाल ठाकरे का सपना
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महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में शिवसेना की तूती बोलती है, फिर भी बाल ठाकरे जीतेजी नारायण राणे की हार नहीं देख पाए। राणे ने शिवसेना से ही राजनीति का ककहरा सीखा। उसी पार्टी ने उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री पद दिया।
राणे ने एक दशक पूर्व शिवसेना का साथ छोड़ दिया और कांग्रेस का दामन थाम लिया। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे के राजनीतिक जीवन का वह सबसे तगड़ा झटका था।
यही कारण था कि रविवार को राणे की हार की खबर पर उद्घव ठाकरे ने कहा कि जिन्होंने बाला साहब का दिल दुखाया था, उन्हें मतदाताओं ने सबक सिखा दिया।
24 सालों से विधायक थे नारायण राणे
नारायण राणे 24 सालों से विधायक थे। रविवार को उनकी हार की खबर ने सभी को चौंका दिया। आश्चर्यजनक ये रहा कि राणे के बेटे नीतेश राणे ने इन्हीं चुनावों से विधानसभा में कदम रखा, और इन्हीं चुनावों ने राणे के लिए महाराष्ट्र विधानसभा का दरवाजा बंद कर दिया।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को कुदाल सीट पर शिवसेना के वैभव नाइक ने 10 हजार वोटों से हरा दिया। राणे अपने जवानी के दिनों में नार्या नाम से मशहूर थे। 60 के दशक में वह शिवसेना से जुड़ गए।
90 के दशक में कोंकण क्षेत्र में राणे का प्रभाव बढ़ा, हालांकि उसी समय युवा कांग्रेस नेता श्रीधर नाइक की हत्या हो गई। श्रीधर नाइक राणे को हराने वाले वैभव नाइक के चाचा थे।
वैभव नाइक ने राणे को हराया
हत्या का आरोप राणे पर भी लगा। हालांकि हाई कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। राजनीतिक जानकारों की मानें तो कोंकण क्षेत्र के मतदाताओं को 2009 विधानसभा चुनावों के बाद ही राणे से मोहभंग होने लगा था।
2009 में वे अपने प्रतिद्वंद्वी वैभव नाइक से 24,255 वोटों से ही जीत पाए थे। 2005 में ये अंतर 63,372 वोटों का था। राणे 2005 में शिवसेना से अलग होने के बाद पहला विधानसभा चुनाव लड़ा था।
पिछले कुछ सालों से वे अपने दोनों बेटों को राजनीति में प्रवेश दिलाने के लिए प्रयासरत थे। लोकसभा चुनाव में उन्होंने एक पैंफ्लेट बंटवाया था, जिस पर उनके पूरे परिवार की तस्वीर छपी थी। वह अपने परिवार को अपने ही अन्य सहयोगियों से अधिक तवज्जो देने लगे थे। कार्यकर्ता भी राणे से नाराज थे।
पुराने सहयोगी राणे का साथ छोड़ रहे थे
पुराने सहयोगी एक के बाद एक राणे का साथ छोड़ रहे थे। भीतर ही भीतर वे राणे के विरोधियों का सहयोग करने लगे थे।
कई ने ऐन चुनाव पर उनका साथ छोड़ दिया था। वहीं, कोंकण क्षेत्र की बांध, खनन और कई अन्य परियोजनाओं के कारण मतदाता भी राणे से नाराज थे। ऐसी परियोजनाओं से कांग्रेस नेताओं को तो फायदा हो रहा था, लेनिक मतदाताओं को नुकसान।
हालांकि इन चुनावों में राणे के लिए राहत की बात ये रही है कि उनके बेटे नीतेश राणे कंकावली सीट से 25,000 वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे। नीतेश के बड़े भाई नीलेश लोकसभा चुनावों में शिवसेना के अनंत गीते के हाथों हार गए थे।