अस्तित्व की जंग लड़ रहे राम विलास पासवान
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बात ज्यादा पुरानी नहीं, 2005 के शुरुआती महीनों की है। बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम बस घोषित ही हुआ था। भाजपा-जद (यू) सबसे बड़े गठबंधन के रूप में उभरकर सामने आया था। उसे लालू-राबड़ी के 15 वर्षों के 'कुशासन' का फायदा मिला था। विधानसभा पहुंचे 18 में से कई निर्दलीय विधायकों ने भी इस गठबंधन को समर्थन देने की घोषणा की थी। बावजूद यह गठबंधन सत्ता से दूर था, क्योंकि जिस शख्स के पास 'सत्ता की चाबी' थी, उसने नीतीश कुमार को समर्थन देने की बात कही बशर्ते कि वह भाजपा को खुद से दूर करेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन था कि 29 सीट जीतकर बिहार में पहली बार एक ताकत के रूप में उभरे इस शख्स को 'अक्लमंद' होना चाहिए, और अगर राज्य में दोबारा चुनाव हुए, तो उस शख्स को नुकसान हो सकता है। बावजूद उस व्यक्ति ने तमाम विश्लेषणों को दरकिनार कर अपनी शर्तें कायम रखीं। नतीजतन सरकार न बन पाने की सूरत में राज्य में पहले राष्ट्रपति शासन लगा, और फिर करीब आठ महीने बाद चुनाव हुए, जिसमें उसे मुंह की खानी पड़ी। यह शख्स कोई और नहीं दलित और पिछड़ों के नेता रामविलास पासवान थे, जिनके राजनीतिक स्वर्णिम काल का गवाह गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स भी है।
लेकिन राजनीति में एक गलत कदम कितना नुकसान कर सकता है, यह रामविलास पासवान की राजनीतिक यात्रा को देखकर समझा जा सकता है। आज सबसे अहम लोकसभा चुनाव की बेला में वह न सिर्फ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, बल्कि कभी राजनीति के पथ पर हमसफर माने जाने वाले लालू प्रसाद यादव के साथ भी गठजोड़ की सूरत में 'समझौता' करने को मजबूर हैं।
गिनीज बुक में नाम
रामविलास पासवान का राजनीतिक गढ़ बिहार का हाजीपुर रहा है। यहीं से वह आठ बार संसद में पहुंचे हैं। हालांकि पंद्रहवीं यानी मौजूदा लोकसभा में वह अपनी सीट नहीं बचा सके, लेकिन अब भी वह सांसद हैं। बस फर्क यह है कि फिलहाल उनकी उपस्थिति राज्यसभा में है। गिनीज वर्ल्ड ऑफ बुक रिकॉर्ड्स में पहली बार उनका नाम 1977 में दर्ज हुआ। उस वर्ष लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी को 4,24,824 वोटों से हराया था। इससे पहले दुनिया के तमाम देशों में इतने वोटों से कोई भी राजनेता नहीं जीत सका था।
लेकिन पासवान की यह यात्रा मात्र यहीं नहीं रुकी। 1989 के संसदीय चुनाव में उन्होंने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ा और 5,04,389 वोटों से जीत हासिल की। यह दलितों और पिछड़ो को लेकर उनकी सोच और नजरिये का ही प्रतिफल है कि उनका नाम आज भी राजनीतिक हस्तियों में गिना जाता है। लेकिन इसमें उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि का भी योगदान है, क्योंकि वह पढ़े-लिखे दलित नेताओं में गिने जाते हैं और राजनीति के मैदान में बल्लेबाजी करने से पहले उन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की परीक्षा भी पास की थी।
जयप्रकाश आंदोलन और लोकदल
रामविलास ने राजनीतिक यात्रा पिता जमुन पासवान से बगावत कर शुरू की। पिता का सपना था कि बेटा बीपीएससी परीक्षा पास करने के बाद बड़ा अधिकारी बनेगा, लेकिन रामविलास किसी के अधीन नहीं, बल्कि खुद का शासन चलाना चाहते थे। नतीजतन वह मुख्य धारा की राजनीति में उतर गए। वर्ष 1969 में पहली बार वह विधायक बने और खगड़िया जिले के अलौली विधानसभा क्षेत्र से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (अब मौजूद नहीं) के टिकट पर बिहार विधानसभा पहुंचे। यह वही वक्त था, जब देश भर में नक्सलवादी आंदोलन की तपिश बढ़ रही थी, लिहाजा रामविलास पासवान ने भी टकराव की रणनीति अपनाई। नतीजतन 1970 में सात महीने उन्हें भागलपुर जेल में भी बिताने पड़े।
रामविलास पासवान ने जेपी आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी निभाई है। 1974 में वह बतौर अनुयायी और सहयोगी जयप्रकाश से जुड़े और लोकदल के महासचिव बने। कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण सिन्हा जैसे आपातकाल के दौर के प्रमुख नेताओं से भी उनका व्यक्तिगत संबंध रहा है। चूंकि वह विधायक भी थे और बिहार के प्रमुख हरिजन नेता भी, इसलिए आंदोलन के दौरान उन्हें कई जिम्मेदारियां मिलीं।
वर्ष 1975 में जब देश में आपातकाल लगा, तो पासवान भी गिरफ्तार किए गए। आपातकाल शुरू होते ही उन्हें कालकोठरी में डाल दिया गया था, जहां उन्होंने करीब दो वर्ष बिताए। 1977 में उन्हें जेल से रिहा किया गया। इसके बाद वह जनता पार्टी में शामिल हो गए।
महज एक वोट की कीमत
वर्ष 1977 में पासवान पहली बार संसद पहुंचे। जनता पार्टी के टिकट पर उन्होंने हाजीपुर सुरक्षित क्षेत्र से पर्चा भरा था और छठी लोकसभा में पहुंचे। तब से लेकर चौदहवीं लोकसभा तक (सिवाय आठवीं लोकसभा (1984-89) छोड़कर) रामविलास संसद में मौजूद रहें। वह उस समय सुर्खियों में आए, जब 1999 में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार को बहुमत साबित करने के लिए एक वोट की जरूरत थी। सांप्रदायिकता के सवाल पर पासवान ने वाजपेयी की सरकार का विरोध किया और उसे वोट नहीं दिया था। नतीजतन वह सरकार गिर गई।
हालांकि इन तीन दशकों में वह जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल जैसी पार्टियों के सदस्य रहे, और देश की राजनीति बदलने के बाद वह दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी दोनों तरह की सरकारों में रहे। वह विश्वनाथ प्रताप सिंह, अटल बिहार वाजपेयी और मनमोहन सिंह की अगुआई वाली सरकारों में मंत्री रहे। उन्होंने केंद्र में श्रम एवं कल्याण मंत्री, केंद्रीय रेल मंत्री, केंद्रीय संचार मंत्री, केंद्रीय कोयला एवं खनन मंत्री, केंद्रीय रसायन, खाद एवं स्टील मंत्री के रूप में अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।
राष्ट्रीय स्तर पर दलित नेता के रूप में वह 1983 में पहचाने गए, जब उन्होंने दलित सेना का गठन किया। इसी कड़ी में उन्होंने संसद भवन के मुख्य भवन में भीमराव अंबेडकर की प्रोर्ट्रेट तस्वीर भी स्थापित कराई, जिसकी मांग दलितों द्वारा लंबे समय से की जा रही थी। नौकरियों में आरक्षण के तहत अनुसूचित जाति का दायरा बढ़ाकर उसमें बौद्ध को भी शामिल करने संबंधी सरकारी फैसले में भी रामविलास पासवान का योगदान माना जाता है।
रा्ष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता का अभाव
पासवान अभी कई मोर्चों पर जूझ रहे हैं। पहली चुनौती उन्हें लोकसभा में लोजपा का अस्तित्व बचाने रखने की है। वर्ष 2000 में जनता दल (यू) से अलग होकर उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी की नींव रखी थी और 2005 में चार सांसदों के साथ संसद पहुंचे थे, लेकिन 2009 के चुनाव में पार्टी उनकी सीट भी नहीं जीत पाई। रामविलास पासवान को समाजवादी नेता रामसुंदर दास ने उसी हाजीपुर से पराजित कर दिया, जो उनका पारंपरिक गढ़ रहा है।
इतना ही नहीं, आज भी भले ही वह खुद को गैर-सवर्ण तबके का 'सबसे बड़ा' क्षेत्रीय नेता मानें, लेकिन उनके वोट बैंक में नीतीश कुमार ने जबर्दस्त सेंध लगाई है। महादलित का कार्ड खेलकर उन्होंने पासवान के किले को कमजोर किया है। ले-देकर इस बार पासवान की उम्मीद अब उसी पासवान जाति पर टिक गई है, जिसकी गिनती बिहार में दूसरी सबसे बड़ी अस्पृश्य जातियों में होती है, क्योंकि इस जाति को महादलित में अब तक शामिल नहीं किया गया है और जिसे लेकर राज्य की राजनीति गर्म है।
लालू के साथ भी उनके रिश्ते ठीक नहीं चल रहे हैं, जिसकी बड़ी वजह नीतीश कुमार ही हैं। हालांकि इस बार राजद और कांग्रेस के साथ संभावित गठजोड़ की चर्चा है, लेकिन लालू अपनी सीटों को लेकर कोई समझौते के मूड में नहीं हैं, लिहाजा गठजोड़ होने की सूरत में लोजपा की स्थिति 'पिछलग्गू' पार्टी जैसी ही होगी।
हालांकि उन्होंने दलित और अन्य सामाजिक तबकों को लेकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश फिर से शुरू कर दी है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस गैर-सवर्ण युवा दलित नेता के रूप में वह कभी मतदाता के दिलों में बसा करते थे, वहां अब उनकी छवि ऐसे समझौतावादी नेता की हो चली है, जो यूपीए और एनडीए, दोनों से हाथ मिलाने से परहेज नहीं करता। इसलिए नीतीश और लालू की तुलना में सामाजिक स्तर पर उनकी स्वीकार्यता का अभाव अब भी कायम है।
विवादों से नाता
रामविलास पासवान का विवादों से भी खूब नाता रहा है। राज्यसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक पासवान की जन्मतिथि 5 फरवरी, 1946 है और 9 फरवरी, 1969 को वह पहली बार विधायक बन गए थे। इस तरह वह मात्र 22 वर्ष, 7 महीने और 4 दिन में ही विधायक बन गए, जबकि विधानसभा चुनाव लड़ने की न्यूनतम आयु 25 वर्ष है।
विवाद उनकी शैक्षणिक योग्यता पर भी है। रामविलास पासवान ने मात्र तीन वर्ष की अवधि में एक ही विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी की डिग्री हासिल की है। उन्होंने कोशी कॉलेज से 1967 में एमए और 1968 में एलएलबी की परीक्षाएं उत्तीर्ण की है। उन्हें यह दोनों डिग्रियां पटना विश्वविद्यालय से मिली हैं। शिक्षाविदों का मानना है कि एक ही अवधि में दो रेगुलर कोर्स करना अवैध है।
इसी तरह रामविलास का व्यक्तिगत जीवन भी कटघरे में रहा है। पंजाबी ब्राह्मण रीना शर्मा से उनकी दूसरी शादी है। उनकी पहली पत्नी राजकुमारी देवी से उनकी दो बेटियां हैं। पासवान ऐसे नेता है, जिनका लगभग पूरा परिवार ही राजनीति में है। भाई पशुपति कुमार पारस लंबे समय तक विधायक रहे हैं, तो तीसरे भाई राममचंद्र पासवान सांसद रह चुके हैं। उनके समधि और दामाद भी लोजपा की सेवा कर रहे हैं। और अब उनके बेटे चिराग पासवान भी फिल्मी दुनिया में विफल होने के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में राजनीति में उतर चुके हैं। पासवान पर फाइव स्टार दलित नेता होने के आरोप भी लगते रहे हैं।
राजनीति को करीब से समझने वाले 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार को शायद ही भूले होंगे, जब चुनाव में 'ओसामा बिन लादेन' प्रचार कर रहा था! स्वाभाविक है कि वह असली ओसामा नहीं, बल्कि उनकी भेष में सहरसा के मेराज खालिद नूर थे, जो लोजपा के पक्ष में प्रचार कर रहे थे। यह राजनीतिक विवाद तब तेज हो गया, जब वह बाकायदा रामविलास पासवान के साथ मंच पर बैठने लगे और चुनावी भाषण देने लगे। उस समय उनकी इस बात के लिए जोरदार आलोचना भी हुई। कहा गया था कि एक समुदाय विशेष का वोट हासिल करने के लिए आतंकी ओसामा की नकल करने की कोई जरूरत नहीं है।
टाइम लाइन
1969 में बिहार विधानसभा सदस्य
1977-79 छठी लोकसभा सदस्य
1980-84 सातवीं लोकसभा सदस्य
1982-84 नेता, लोकदल (के)
1989-91 नौवीं लोकसभा सदस्य (इस दौरान केंद्रीय श्रम और कल्याण मंत्री रहे)
1991-96 दसवीं लोकसभा सदस्य
1996-97 ग्यारहवीं लोकसभा सदस्य
1996-98 केंद्रीय रेल मंत्री
1 जून, 1996-29 जून, 1996 तक संसदीय कार्य मंत्री
1998-99 बारहवीं लोकसभा सदस्य
1999-2004 तेरहवीं लोकसभा सदस्य
13 अक्टूबर, 1999 से 1 सितंबर, 2001 केंद्रीय संचार मंत्री
1 सितंबर, 2001 से 29 अप्रैल, 2002 केंद्रीय कोयला और खनन मंत्री
2004-2009 चौदहवीं लोकसभा सदस्य
23 मई, 2004-22 मई, 2009 केंद्रीय रसायन, खाद एवं स्टील मंत्री
जुलाई, 2010 से अब तक - राज्यसभा सदस्य