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विजय पर राजनाथ की पहली ‘हार’

Thu, 24 Oct 2013 12:59 AM IST
हरीश लखेड़ा/दिल्ली
हरीश लखेड़ा/दिल्ली Updated Thu, 24 Oct 2013 12:59 AM IST
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rajnath's first defeat at vijay goyal

भाजपा के पितामह लालकृष्ण आडवाणी को भी आंखें दिखा चुके पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को दिल्ली में विजय गोयल के मामले में आखिरकार पीछे हटना पड़ा है।

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राजनाथ ने दिल्ली प्रदेश की कमान सौंपकर गोयल को विधानसभा चुनाव के लिए अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा के चेहरे के तौर पर सामने कर दिया था, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नरेंद्र मोदी के रुख के चलते राजनाथ को दिल्ली में ‘विजय’ पर ‘हार’ देखनी पड़ी है।
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डॉ. हर्षवर्धन को दिल्ली में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से एक बार फिर साबित हो गया है कि मोदी अब भाजपा में सभी पर भारी पड़ने लगे हैं और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी मोदी की सुननी पड़ी है।
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शुरू से ही उठती रही उंगली
दिल्ली में कांग्रेस से शीला दीक्षित जैसी अनुभवी नेता के मुकाबले अपने करीबी गोयल को भाजपा की कमान सौंपने के फैसले को लेकर राजनाथ पर शुरू से ही उंगली उठती रही हैं।

वैसे यह पहला मामला नहीं है जब भाजपा की दोबारा कमान थामने के बाद राजनाथ के फैसले की पार्टी के भीतर व बाहर जमकर आलोचना हुई हो।

नौ माह के कार्यकाल में पहला सियासी झटका
नरेंद्र मोदी को लेकर जिस अंदाज में उन्होंने फैसले किए, उसी का नतीजा था कि वरिष्ठ नेता आडवाणी को कोपभवन जाने पर विवश होना पड़ा। राजनाथ के इन नौ माह के कार्यकाल के दौरान इसे पार्टी की अंदरूनी राजनीति में उनके लिए पहला सियासी झटका माना जा रहा है।


वैसे भाजपा में राजनाथ को लेकर अब यह भी सवाल उठने लगे हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद वे मोदी के सामने ‘नतमस्तक’ क्यों हैं।

भाजपा में संगठन की असली ताकत मोदी के पास
खास बात यह है कि भाजपा प्रधानमंत्री की इस बात की आलोचना करती है कि सरकार की असली ताकत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास है। दूसरी तरफ भाजपा में संगठन की असली ताकत अब अध्यक्ष की बजाए मोदी के पास है।

बहरहाल, गोयल को राजनाथ का करीबी माना जाता है। गडकरी के कार्यकाल में लगभग तय था कि दिल्ली संगठन की कमान गोयल की बजाए डॉ. हर्षवर्धन को सौंपी जाएगी, क्योंकि संघ ऐसा चाहता था, लेकिन राजनाथ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद गोयल की लॉटरी खुल गई थी।

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