फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   Rajapaksa With the help of the army wanted to capture power

'सेना की मदद से सत्ता पर कब्जा करना चाहते थे राजपक्षे'

Sun, 11 Jan 2015 08:22 PM IST
Updated Sun, 11 Jan 2015 08:22 PM IST
विज्ञापन
Rajapaksa With the help of the army wanted to capture power

हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के बाद श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपक्षे ने सत्ता में बने रहने के लिए सेना से मदद मांगी थी। सेना के सहारे वह चुनाव परिणामों को धताते हुए सत्ता में बने रहना चाहते थे। लेकिन सेना प्रमुख द्वारा मदद से इंकार करने पर राजपक्षे ने हार स्वीकार करते हुए पद छोड़ दिया था।

विज्ञापन


यह सनसनीखेज आरोप लगाए हैं श्रीलंका के नवनियुक्त राष्ट्रपति मैत्रीपाला श्रीसेना के मुख्य प्रवक्ता ने। बीबीसी के अनुसार कोलंबों में पत्रकारों को संबोधित करते हुए मुख्य प्रवक्ता रजिथा सेनरत्ने ने आरोप लगाया कि पूर्व राष्ट्रपति ने चुनावों के नतीजे आने से पहले सेना के हाईकमान पर इसके लिए दबाव बनाने का प्रयास किया था।
विज्ञापन


यहां तक की चुनाव परिणाम से एक घंटे पहले तक भी वह इसी प्रयास में रहे और सेना प्रमुख जनरल दया रत्नायके पर हस्तक्षेप करने के लिए दबाव बनाया। लेकिन उन्होंने (सेना प्रमुख) ने किसी तरह के असवैंधानिक कार्य या चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप से इंकार कर दिया था।
विज्ञापन
विज्ञापन


सेनरत्ने के अनुसार पूर्व राष्ट्रपति राजपक्षे पद दोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद उनके पास कोई चारा नहीं रहा। सेनरत्ने ने आरोप लगाया कि पूर्व राष्ट्रपति ने अपने छोटे भाई और रक्षा सचिव गोटभाया के सहारे अपने मंसूबों को परवान चढ़ाने का प्रयास किया था, वह तीसरी बार भी हर हाल में सत्ता में बने रहना चाहते थे।

सेना प्रमुख ने कर दिया था हस्तक्षेप से इंकार

Rajapaksa With the help of the army wanted to capture power

इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति के लिए अधिकतम दो अवधि के संविधान में बदलाव कर दोबारा सत्ता पर बैठने की कवायद शुरू कर दी थी। हालांकि श्रीलंका सेना की ओर से इस संबंध में कोई बयान नहीं दिया गया है।

लेकिन पूर्व राष्ट्रपति के प्रवक्‍ता ने इन आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि चुनाव के बाद जब वोटिंग चल रही थी तो संभावित परिणामों को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने सुगम तरीके से सत्ता के हस्तातरंण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। इसलिए इस तरह के आरोपों का कोई मतलब नहीं है।

वहीं, श्रीलंका में सेना का कोई बड़ा हस्तक्षेप नहीं रहा है केवल 1962 को छोड़कर जब सेना ने तख्तापलट में भूमिका निभाई ‌थी। उसके बाद से श्रीलंका में राजकीय हस्तक्षेप से सेना को पूरी तरह अलग कर दिया गया है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed