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मास्टर स्ट्रोक: खत्म हुआ लालू-नीतीश का गतिरोध

Tue, 09 Jun 2015 07:54 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 09 Jun 2015 07:54 AM IST
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Rahul master strock ended deadlock between Lalu and Nitish

बिहार के विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को एक साथ लाने का श्रेय भले ही जनता परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव लेते दिख रहे हों।

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मगर दोनों दिग्गजों के बीच गठबंधन को लेकर चल रही खींचतान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के मास्टर स्ट्रोक से ही खत्म हो पाई है।

दरअसल, कांग्रेस के खुलकर नीतीश के समर्थन में आने से लालू के पास विकल्प कम होते चले गए। भाजपा विरोधी अन्य दलों में भी नीतीश को लेकर बनी सहमति के बाद लालू के लिए गठबंधन से अलग होना मुमकिन नहीं था।

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लालू के पास नहीं था कोई विकल्प

Rahul master strock ended deadlock between Lalu and Nitish

कई दिनों की ना-नुकुर के बाद राजद सुप्रीमो के सोमवार को अचानक नीतीश की उम्मीदवारी कबूलने के पीछे रविवार को नीतीश और राहुल की मुलाकात को सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। इसके बाद ही लालू को आभास हो गया कि अगर उन्होंने अपनी हठ नहीं छोड़ी तो नीतीश कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव में उतर सकते हैं। ऐसे में वामपंथी और एनसीपी जैसे दल भी उनका साथ दे सकते हैं।

तब लालू के लिए केवल जीतन राम मांझी ही बचते। उन्हें साथ लाने का मतलब था कि उनके साथ खड़े नेताओं को एक साथ लाना, जो लालू के लिए आसान नहीं था। मुख्यमंत्री के पद की दावेदारी को लेकर राजद के विकल्प अब्दुल बारी सिद्दिकी के उस बयान के बाद ही खत्म हो गए जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर मांझी मुख्यमंत्री बन सकते हैं तो मैं क्यों नहीं। मतलब, राजद के अंदर भी सीएम पद के लिए केवल नीतीश ही स्वीकार हैं।

लालू को नीतीश का हाथ थामने की सलाह

Rahul master strock ended deadlock between Lalu and Nitish

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि लालू भले ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का भरोसा जीतने में कामयाब रहे हों, मगर राहुल से उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा है। पार्टी में हर छोटे बड़े निर्णयों में राहुल की भूमिका अहम होने का अहसास भी लालू को अच्छी तरह था। सोमवार को उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष से भी मुलाकात की।

माना जा रहा है कि सोनिया ने भी उन्हें बिहार में सभी धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को एकजुट रखने के लिए नीतीश का हाथ थामने की सलाह दी। उधर, भाजपा भी दबी जुबान में यही मानती है कि बिहार में नीतीश से बड़ा चेहरा अभी कोई नहीं है। ऐसे में लालू के पास उन्हें नेता स्वीकार करने के अलावा जो दूसरा विकल्प था वह राजद के भविष्य को दांव पर लगाने जैसा था।

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