राहुल ने अफवाहों पर लगाया विराम, बताया कैसे बनाएंगे सरकार
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मोदी के प्रचार और अभियान को हौव्वा करार देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा मार्केटिंग पर जोर दे रही है जबकि कांग्रेस लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं को परवान चढ़ाने का काम कर रही है।
राहुल ने चुनाव प्रचार के चरम दौर में अमर उजाला के एमके वेणु और सुजय मेहदूदिया को ईमेल इंटरव्यू में कई मुद्दों पर जवाब दिए
यूपीए-2 के सेनापतियों ने हथियार डाल दिए हैं?
सवाल- देश के कई चुनाव क्षेत्रों में यह संदेश गया है कि राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर चुनाव अभियान का पूरा बोझ है। देश के वोटरों को यूपीए-2 सरकार की उपलब्धियां बताने के लिए न तो वरिष्ठ मंत्री सामने आए हैं और न यूपीए के जाने-माने चेहरे। क्या लड़ाई शुरू होने से पहले ही यूपीए-2 के सेनापतियों ने हथियार डाल दिए हैं?
जवाब- चुनाव अभियान की योजना बनाने और इसे जमीन पर उतारने में पार्टी के शीर्ष नेता अग्रिम मोर्चे पर रहे हैं। हमारे कई वरिष्ठ नेता तो चुनाव भी लड़ रहे हैं।
आजाद जी, मिस्त्री जी, अमरिंदर सिंह जी, अंबिका सोनी जी, जाखड़ जी चुनाव मैदान में उतरे हुए हैं। उत्तर प्रदेश में सभी केंद्रीय मंत्री चुनाव लड़ रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में हमारा शीर्ष नेतृत्व चुनाव मैदान में है। हर चुनाव में पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता अगली पीढ़ी को नेतृत्व सौंपते हैं। हम उनके इस फैसले का सम्मान करते हैं।
सवाल तो यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर भाजपा का प्रचार एक आदमी का अभियान क्यों बन गया है। श्री आडवाणी, श्री मुरली मनोहर जोशी और श्री जसवंत सिंह भाजपा के अभियान से गायब क्यों हैं? कांग्रेस इस बार कड़ी टक्कर देने जा रही है। पार्टी, भाजपा को लगातार तीसरी बार हरा रही है।
क्या कार्यकर्ताओं को मिला अधिकार?
सवाल- आपने एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस लेबल पर बदलाव की शुरुआत की थी और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को अधिकार देने की बात की थी। क्या आपके इस फॉर्म्यूले का कुछ असर हुआ है? आम धारणा यह है कि इसका असर नहीं हुआ है क्योंकि देश भर में पार्टी के ताकतवर नेताओं ने अपने भाई-भतीजों और पसंदीदा समर्थकों को पार्टी में अहम पद दिलवा दिए। इससे पार्टी ऊपर से नीचे तक दो फाड़ हो गई। आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब- यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई में हम सांगठनिक चुनाव के जरिये हम विकेंद्रीकृत राजनीतिक शक्ति स्थापित करना चाहते हैं। हमने मौजूदा व्यवस्था को खत्म कर दिया है जो कुछ लोगों की ओर से नाम सुझाने पर आधारित था।
अब एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई है, जिसमें देश भर के लाखों युवा संगठन का भविष्य तय करते हैं। यही वजह है कि यूथ कांग्रेस में आज छह लाख पदाधिकारी हैं।
इस व्यवस्था को बनाने के लिए हमने देश के अनुभवी पूर्व चनाव आयुक्तों की मदद ली ताकि पारदर्शी और निष्पक्ष निर्वाचन प्रक्रिया बन सके।
हमने राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी ही प्रक्रिया अपनाई। पंद्रह लोकसभा क्षेत्रों में जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं ने उम्मीदवार चुने। इन सीटों के लिए मुट्ठी भर वरिष्ठ नेताओं की सिफारिश पर टिकट देने के बजाय पारदर्शी और खुली प्रक्रिया अपनाई गई।
लगभग बारह हजार कार्यकर्ताओं का फैसला लेने में बराबर भागीदारी रही। ये बड़े दमदार विचार हैं। आपके मुताबिक पार्टी में ऊपर से नीचे दो फाड़ होने के बजाय इन तरीकों ने कार्यकर्ताओं खास कर युवाओं में जोश भर दिया है।
यह सही है कि जब भी यथास्थितिवाद को चुनौती देने के लिए कोई नया विचार पैदा होता है उसका विरोध होता है। खास कर उन लोगों की ओर से जिनका इस पुरानी व्यवस्था से हित जुड़ा होता है।
हमें यह समझने की जरूरत है विकेंद्रीकरण मंजिल नहीं है। यह एक प्रक्रिया है। यह कोई एक कानून, एक काम या एक चुनाव नहीं है। यह हमारी कवायदों की एक श्रृंखला है, जिससे धीरे-धीरे पक्के तौर पर ताकत केंद्र से निकल कर इस देश के लोगों के हाथ में चली आएगी।
तीसरे मोर्चे की सरकार का समर्थन करेगी?
सवाल- कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ मंत्रियों का कहना है कि पार्टी तीसरे मोर्चे की सरकार का समर्थन करेगी? आप क्या कहेंगे?
जवाब- यूपीए अपने दम पर सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल कर लेगा। किसी मोर्चे को समर्थन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
सवाल- कांग्रेस का कहना है कि गुजरात मॉडल पर मोदी का दावा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। कांग्रेस इसे लोगों को समझाने में नाकाम क्यों है? वह अपनी उपलब्धियों को भी लोगों को बताने में सफल नहीं हो रही है, क्यों?
जवाब- गुजरात के मुख्यमंत्री को बड़े फंड का समर्थन मिल रहा है। उनके जनसंपर्क कवायद में बड़ा पैसा लगा है और यह पिछले एक दशक से हो रहा है। देखा जाए तो 2002 से ही।
इस पीएआर एक्सरसाइज के जरिये जो शोर-शराबा हो रहा है वह अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और संचार के ज्यादातर माध्यमों पर छा गया है।
सचाई यही है कि मोदी जिस गुजरात मॉडल की पैरवी कर रहे हैं उसने राज्य के किसानों और गरीबों की कीमत पर सिर्फ कुछ उद्योगपतियों को ही फायदा पहुंचाया है।
इससे न छोटे कारोबार पनप पा रहे हैं या और न ही आम आदमी की जरूरतें पूरी हो रही हैं। यह मॉडल सिर्फ जमीन हड़पने, भ्रष्टाचार और लोगों को बड़े तरीके से अधिकार विहीन करने का नाम है।
कुछ कारोबारी घरानों को सैकड़ों एकड़ जमीन कौड़ियों के दाम दे दी गई। इन बड़े उद्योग घरानों ने शायद ही रोजगार का कोई अवसर पैदा किया है। इससे गुजरात की रीढ़ रहे छोटे कारोबार बाजार से बाहर हो गए हैं।
ये छोटे कारोबार गुजराती उद्यमिता के प्रतीक रहे हैं। राज्य के श्रमिकों में भारी असंतोष है। वर्ष, 2011 में देश भर में गुजरात में सबसे ज्यादा हड़तालें और तालाबंदी हुई। क्या हमें ऐसे ही मॉडल की जरूरत है।
गुजरात के आर्थिक विकास का भी वहां के लोगों को फायदा नहीं हुआ है। वहां हर दूसरा बच्चा बुरी तरह कुपोषित है। स्वास्थ्य और शिक्षा संकेतक बुरी तरह गिरे हुए हैं। गुजरात सरकार की खुद की रिपोर्ट इसकी तसदीक करती है।
इसके अलावा गुजरात में 2003 से लोकायुक्त काम ही नहीं कर रहा है। संसद में मजबूत लोकपाल और लोकायुक्त के लिए मजबूत लोकपाल कानून पारित हुआ। लेकिन गुजरात ने बेहद कमजोर लोकायुक्त आयोग कानून लागू किया।
गुजरात सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे मंत्री शामिल हैं। यह कथित मोदी मॉडल की सच्चाई है। इसी मॉडल का देश में प्रचार हो रहा है। मैं पहले ही कह चुका हूं कि गुजरात सरकार जमीनी स्तर पर काम करने में अपना पूरा ध्यान लगाए हुए है।
हम अपनी मार्केटिंग करने में बहुत अच्छे नहीं हैं। सौभाग्य से भारतीय मतदाता इतना समझदार है कि वह मोदी की ओर से किए जा रहे दावों को परख सकता है।
चुनावों में हो रहा ध्रुवीकरण
सवाल- भाजपा कह रही है कि इस चुनाव में विकास मुद्दा है और लोग इस आधार पर एक विकल्प चाहते हैं। लेकिन यूपी और बिहार जैसे अहम राजनीतिक राज्यों में चुनाव में पूरी तरह जाति और संप्रदायों का ध्रुवीकरण हो रहा है। ऐसे हालात से कांग्रेस कैसे निपट रही है?
उत्तर- भाजपा की अब तक रणनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रही है। भाजपा के चुनाव घोषणा पत्र और पार्टी और संघ परिवार के वरिष्ठ नेताओं के बयानों से साफ है कि वह इस ओर बढ़ रहे हैं। वह हमें बांटना चाहते हैं जबकि कांग्रेस पार्टी जोड़ना चाहती है।
वह चाहते हैं कि सत्ता की ताकत कि सी एक व्यक्ति के हाथ में सिमट जाए। जबकि हम अधिकार और ताकत लोगों के बीच बांटना चाहते हैं। इसलिए मैं कहता हूं कि भाजपा की विचारधारा भारत के मूल विचार के खिलाफ है।
भारत में यह विचारधारा कभी सफल नहीं हो सकती है और न आगे सफल होगी। कांग्रेस हमेशा की तरह इस बार भी सांप्रदायिक एजेंडे के विरोध में कदम उठा कर पहल कर रही है। वह हर धर्म, जाति और आर्थिक स्थिति के लोगों के लिए समान अधिकार सुनिश्चित कराने की अथक कोशिश में लगी है।
मोदी का असरदार प्रभाव!
सवाल- आप कहते हैं कि एक आदमी बड़े बदलाव नहीं ला सकता। इसके लिए सबको मिल कर काम करना होगा। यह सही है। लेकिन राजनीति में सपने भी बेचने पड़ते हैं। क्या मोदी इस काम को असरदार तरीके से कर रहे हैं?
जवाब- न तो मोदी और न ही भाजपा ने इसे पूरे अभियान के तहत देश के सामने कोई दृष्टि पेश की है। कोई बड़ा विचार नहीं और न उन्होंने कोई बड़ा सपना पेश किया है।
श्री मोदी का इस पूरे अभियान के दौरान यही कोशिश रही है कि लोगों को सारी ताकत एक व्यक्ति के हाथ में देकर उसे देश का चौकीदार बना देना चाहिए। यह सपना बेचना नहीं है।
उन्हें बड़े तरीके भाजपा के सभी वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर दिया चाहे वह आडवाणी जी हों या सुषमा स्वराज जी हों या फिर मुरली मनोहर जीशी जी। जसवंत सिंह जी जैसे जो नेता नहीं झुके उन्हें निकाल बाहर किया गया।
जब से गुजरात मॉडल का पर्दाफाश होने लगा है उन्होंने इसके बारे में बात करना बंद कर दिया है। सच्चाई यह है कि 2004 और 2009 की तरह ही इस बार भी विज्ञापन पर करोड़ों खर्च किए गए। वोटर इसे जानता हैं और प्रपोगंडा के झांसे में नहीं आने वाला।
क्या सचमुच मोदी की लहर है?
सवाल- क्या देश भर में भाजपा और मोदी की लहर चल रही है? मोदी कह रहे हैं कि कांग्रेस इस चुनाव में दोहरे अंक तक सिमट कर रह जाएगी। आपका क्या कहना है?
जवाब- नतीजे खुद बता देंगे। विपक्ष तो पिछले चुनाव से ही कांग्रेस के पतन की बात कर रहा है। 2004 हो या 2009 का चुनाव भाजपा का चुनाव पूरी तरह शोरशराबे और बड़े फंड के समर्थन से चला है। और हर बार नतीजे कुछ और आए हैं।
भाजपा अपनी पूरी ताकत मार्केटिंग पर केंद्रित करती है जबकि कांग्रेस पार्टी लोगों की तकलीफ समझने का काम करती है । वह लोगों में उम्मीद पैदा करती हैं। उनकी आकांक्षाओं को परवान चढ़ाती है।
पिछले दस साल में यूपीए सरकार ने 15 करोड़ लोगों को गरीबी से निकाला है। इसन देश को साढ़े सात फीसदी की वार्षिक विकास दर दी है। और यह सब हमने ग्लोबल आर्थिक संकट के दौर में किया है।
सशक्तिकरण पर आधारित कार्यक्रम लागू कर हमने ऐसा सुरक्षा जाल और बुनियाद मुहैया कराई है जिससे समाज के सबसे कमजोर और वंचित वर्ग को फायदा हुआ है। उन्हें सामाजिक सुरक्षा की बुनियाद हासिल हुई है।
हम लोकपाल को अस्तित्व में लेकर आए। हम आरटीआई लेकर आए। जो भ्रष्टाचार से लड़ने का एक अहम हथियार है। नए भूमि अधिग्रहण कानून बनाया गया और सौ साल पुराना औपनिवेशिक कानून हटा।
इससे जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पारदर्शी हुई। मनरेगा ने देश के ग्रामीण इलाकों में जीविका कमाने के तरीके में क्रांति कर दी। इसने देश में पहली बार न्यूनतम मजदूरी को पक्का किया। इसने देश के सबसे वंचितों को एक आधार दिया।
हमने मुफ्त में बच्चों को शिक्षा का अधिकार मुहैया कराया। ये संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल हुआ। हमने केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तादाद 17 से बढ़ा कर 44 कर दी।
स्वास्थ्य सुविधाओं, हाउसिंग और सामाजिक इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में यूपीए, एनडीए के पिछले शासन से काफी आगे निकल चुका है। पिछले दस साल दलितों, अल्पसंख्यकों समेत कोई भी वर्ग ऐसा नहीं रहा, जिसे हमने अपने कार्यक्रमों के दायरे में नहीं समेटा।
कांग्रेस की सेंट्रल लेफ्ट पोजीशन?
सवाल- आपके घोषणा पत्र से ऐसा लगता है कि आप सेंट्रल लेफ्ट पोजीशन ले रहे हैं। नए सकशक्तिकरण कानूनों के जरिये आप कल्याणकारी योजनाओं का दायरा बढ़ा रहे हैं। क्या आप संपत्ति बनाने के साथ-साथ इसका पुनर्वितरण चाहते हैं। या आप मानते हैं कि ग्रोथ के बाद ही संपत्ति का वितरण होना चाहिए?
जवाब- मुझे नहीं लगता कि आर्थिक विकास के लिए सोशल सेक्टर में निवेश को दककिनार किया जाना चाहिए। यह गलत विकल्प है। आप जिस ट्रिकल डाउन यानी ऊपर से नीचे की ओर से विकास की नीति की बात कर रहे हैं वह हर जगह काम नहीं करता।
यहां तक कि अमेरिका में लोग यह मान चुके हैं कि यह नीति असफल साबित हुई है। मेरा पक्का मानना है कि आर्थिक समृद्धि में सबको हिस्सा मिलना चाहिए। और यह भी कि आर्थिक विकास दर को बढ़ाए बगैर भी गरीबी से नहीं लड़ा जा सकता।
भारत तरक्की के रास्ते एक ही तरीके से बढ़ सकता है। वह यह कि कारोबार के साथ गरीबों के भी हितों का ध्यान रखा जाए। यह कांग्रेस की विचारधारा के मुताबिक है। यह कांग्रेस और भाजपा में बुनियादी अंतर है।
पिछले 10 साल से हमने सबसे तेज 7.5 प्रतिशत की दर से सालाना आर्थिक विकास दर हासिल की है। एनडीए शासन की तुलना में हमने तीन गुना सड़कें तैयार की हैं और हमने बिजली बनाने की क्षमता को भी दोगुना किया है।
मगर इसी दौरान हमने 15 करोड़ लोगों को गरीबी से उबारा। हमारे एजेंडे और सामाजिक सेक्टर में शुरुआत के दम पर ही हमने जरूरतमंदों को मदद पहुंचाई।
देश के लोगों की असीमित योग्यता ही भारत का भविष्य है। हम जिस मानव संसाधन की बात कर रहे हैं, वह सिर्फ मेट्रो सिटी और चमकते सॉफ्टवेयर पार्कों में ही नहीं है बल्कि लाखों लोग गांवों व छोटे शहरों से हैं।
हमें इन्हें सिस्टम में लाना होगा और इन्हें भारत की सफल कहानी में जोड़ना होगा। आगे बढ़ने के लिए यही एक रास्ता है।
अमेठी पर मची घमासान
सवाल- आम आदमी पार्टी और भाजपा ने अमेठी में आपके खिलाफ तीखा अभियान चलाया और वहां विकास की कमी का मुद्दा उठाया। क्या इसका असर पड़ा है?
जवाब- जहां तक अमेठी के विकास का सवाल है हमने रेल और नेटवर्क की कनेक्टिविटी का काफी विस्तार किया है। सात नेशनल हाईवे अमेठी से होकर गुजरते हैं। कई नई ट्रेनें अमेठी से जोड़ी गई हैं। सलोन तहसील में नई रेल पटरी बिछाई गई है।
काफी दिनों से इसकी मांग थी। हमने जगदीशपुर औद्योगिक इलाके को पुनर्जीवित करने का जिम्मा उठाया है। यहां भेल, सेल, हिंदुस्तान पेपर और इंडो गल्फ जैसी कंपनियां अपनी यूनिटों का विस्तार कर रही हैं। मेगा फूड पार्क बन रहा है।
इससे जगदीशपुर के 40,000 किसानों को फायदा होगा। एनडीडीबी की पार्टनरशिप में दूध प्रशीतन प्लांट खोले गए हैं। कभी अमेठी में दूध की कमी रहती थी लेकिन अब यहां यह सरप्लस हो गया है।
यहां तक कि यह दिल्ली की मदर डेयरी को भी दूध सप्लाई कर रहा है। मैं अमेठी को आने वाले साल में यूपी का सर्वश्रेष्ठ और जीवंत एजुकेशन कोरिडोर बनाना चाहता हूं।
यहां देश का पहला नेशनल एविएशन यूनिवर्सिटी खोली गई। फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट सैकड़ों युवाओं को ट्रेनिंग दे रहा है। जॉब प्लेसमेंट रेट दो सौ फीसदी है। हर स्टूडेंट के पास दो जॉब ऑफर हैं।
इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी आईआईटी लेवल का इंस्टीट्यूट है। अमेठी कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश में नियोजकों का पसंदीदा जगह हो जाएगा।
मेरा मानना है कि बगैर महिलाओं के आगे लाए समाज में विकास हो सकता है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र जैसे तेजी से आगे बढ़े रहे राज्यों से यही सबक निकला है। अमेठी की डेढ़ लाख महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ा गया है।
उन्हें वित्तीय सुविधा और जीविका हासिल हो रही है। जब भी मैं उनसे मिलता हूं वो मुझे प्रेरित करती हैं। हालांकि अमेठी में बहुत कुछ करना है। मुझे उम्मीद है कि यूपी में कांग्रेस का शासन आएगा और वह यहां की समस्याएं सुलझाएगी।
देश में सत्ता विरोध लहर
सवाल- कांग्रेस को साफ तौर सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है। विपक्ष भी एकजुट नहीं दिख रहा है। कई क्षेत्रीय दल भी मोदी का विरोध कर रहे हैं। इसे आप किस नजरिए से देखते हैं?
जवाब- भाजपा के भारी जोरशोर वाले प्रचार अभियान के बावजूद मुझे लगता है कि लोग कांग्रेस को उसके जमीन पर किए गए काम के आधार पर वोट देंगे।
उसकी भाईचारे की और सभी को साथ लेकर चलने वाली विचारधारा के आधार पर वोट देंगे। हमारी मुख्य विपक्षी पार्टी की विचारधारा लोगों को बांटने वाली है, जिससे देश को आगे नहीं ले जाया जा सकता है।
देश की जनता ने भी इस बात को समझा है और हमेशा इस विचारधारा को खारिज किया है। लोग इस बार भी ऐसा ही करेंगे।
इसके अलावा आप भाजपा के सहयोगी दलों पर भी गौर करें तो पाएंगे कि उनमें से दो तिहाई का तो मौजूदा संसद में एक भी सदस्य नहीं है। भाजपा के पास कभी तृणमूल कांग्रेस, बीजद और जदयू जैसे सहयोगी थे।
लेकिन आज ये दल मोदी के सबसे बड़े आलोचक हैं और वे उनके नेतृत्व वाली सरकार का कभी समर्थन नहीं करेंगे। भाजपा के मौजूदा सहयोगियों में टीडीपी अब आंध्र प्रदेश में कोई बड़ी ताकत नहीं रह गई है।
लोजपा का भी पिछले लोकसभा चुनाव और पिछले दो विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। भाजपा का सिर्फ एक सहयोगी दल ही ऐसा है, जिसके सांसदों की संख्या दोहरे अंकों में है।